समाज का प्रोजेक्ट है सेफ सिटी बनाना

इन दिनों हर शहर को सेफ सिटी बनाने की मुहिम चल पड़ी है. सबकी चिंता है कि हमारे शहर सुरक्षित कैसे हों. हालांकि बात तो यह होना चाहिए कि पूरा समाज कैसे सुरक्षित हो. महिलाओं और बच्‍चों को ही नहीं पूरे समाज को सुरक्षित बनाने के लिए छोटे-छोटे सांचों में बेहतर काम करने की जरूरत है. यह छोटी पहल ही समाज को समृद्ध और मूल्यवान बनाएंगी. सभागार में बड़ी संख्या में लोग मौजूद हैं, ज्यादा संख्या महिलाओं की है. जाहिर है असुरक्षा का सबसे बड़ा शिकार यही वर्ग है. एनजीओ के लोग हैं, सरकारी महकमों पुलिस, पर्यटन, स्वास्थ्य शिक्षा और महिला आयोग से भी. इरादा है यह विमर्श करना कि वाकई समाज में सुरक्षा के लिहाज से क्या स्थिति है, चुनौतियां क्या हैं और उसके लिए क्या किया जाना चाहिए?

Source: News18Hindi Last updated on: December 4, 2022, 10:01 am IST
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समाज का प्रोजेक्ट है सेफ सिटी बनाना
सुरक्षा के लिहाज से समाज की स्थिति पर विमर्श आवश्‍यक है.

मैं एक कार्यक्रम में हूं जिसमें बात हो रही है सेफ सिटी पर. हमारे शहर सुरक्षित कैसे हों. हालांकि बात तो यह होना चाहिए कि पूरा समाज कैसे सुरक्षित हो, लेकिन यह आलोचना इसलिए नहीं की जानी चाहिए कि लगातार बदहाल होती जा रही स्थितियों और व्यवस्थाओं के बीच छोटे-छोटे सांचों में बेहतर काम करने की जरूरत है. यह छोटी पहल ही समाज को समृद्ध और मूल्यवान बनाएंगी.


सभागार में बड़ी संख्या में लोग मौजूद हैं, ज्यादा संख्या महिलाओं की है. जाहिर है असुरक्षा का सबसे बड़ा शिकार यही वर्ग है. एनजीओ के लोग हैं, सरकारी महकमों पुलिस, पर्यटन, स्वास्थ्य शिक्षा और महिला आयोग से भी. इरादा है यह विमर्श करना कि वाकई समाज में सुरक्षा के लिहाज से क्या स्थिति है, चुनौतियां क्या हैं और उसके लिए क्या किया जाना चाहिए?


हालांकि, मैं जिस भोपाल शहर की फिजा में बैठकर इस बैठक में शरीक हो रहा हूं अपराधों के नजरिए से उसकी स्थिति उतनी खराब नहीं लगती है जितना कि देश के दूसरे कई शहरों में घूमते हुए लगती है. यदाकदा की घटनाओं को छोड़कर ऐसा फील भी नहीं आता कि इस शहर में अपराध एक बहुत बड़ी समस्या है. यहां रात ग्यारह-बारह बजे भी महिलाएं स्कूटी दौड़ाते हुए दिख जाती हैं, लेकिन यह समस्या इतनी गहरी बैठी है कि यदि दूसरे शहरों में भी कोई खौफनाक अपराध होता है तो उसका असर भौगोलिक स्थिति से तय नहीं होता. डर तो सभी को लगता है. मप्र के बारे में भी ऐसा कहा जा सकता है कि वह एक शांत प्रदेश है, लेकिन 2006 से 2016 के बीच इस प्रदेश में महिला अपराधों में अस्सी प्रतिशत की बढ़ोत्तरी बताती है कि स्थितियां बहुत अच्छी नहीं हैं.


बात केवल सड़कों की तो नहीं हैं, यह ऐसा विषय है जिसके तार कई जगह जाकर जुड़ते हैं. घर की चाहरदिवारी के अंदर, कार्यस्थल पर, पब्लिक ट्रांसपोर्ट के अंदर इन सभी स्थानों में जब तक सुरक्षा का भाव नहीं होगा तब तक स्थितियों को ठीक नहीं माना जा सकेगा, यह एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है जो किसी सरकारी विभाग, किसी एनजीओ से ज्यादा पूरे समाज से काम किए जाने की मांग करता है. और इसमें सबसे जरूरी बातें हैं संवेदना, मानवीय मूल्यों का होना और एक सपना सुरक्षित समाज का. दिक्कत यह है कि हम खुद तो सुरक्षित होना चाहते हैं, लेकिन समाज की जहां बात आती है वहां अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं या फिर अनदेखी करना ठीक लगता है.


हममें से ज्यादातर लोग उन कहानियों को सुनाने में ही अपना समय निकाल देते हैं जो सभी को पता हैं. या उनके अपने निजी अनुभव. बहुत लोगों को यह पता होता है कि यह होना चाहिए, और वह उसी तरह से उसे कहने में पूरा जोर लगा देते हैं, लेकिन जोर इस बात पर भी होना चाहिए कि उन स्थितियों को कैसे साकार किया जाएगा, समस्याओं से लड़ने के फार्मूले क्या होंगे, क्या वह छोटी-छोटी कोशिशें होंगी अपने तई जिनसे कुछ बुनियादी किया जा सकेगा. क्या वर्तमान व्यवस्थाओं की समीक्षा की जाएगी और उन्हें परखा जाएगा कि वे सही से काम कर रही हैं अथवा नहीं. कई बार मुझे यह भी लगता है कि जो फिलहाल है क्या वह पर्याप्त नहीं है और यदि वह ठीक से काम करने लग जाए तो क्या समस्याएं रातों-रात आधी नहीं हो सकतीं.


होता नहीं है, पुलिस का जितना जोर हेलमेट चेंकिंग कर चालान बनाने में होता है उतना यह देखने में नहीं कि किसी मनचले ने ठीक बाजू से जोरदार हॉर्न बजाया या कट मारकर निकल ही गया, लड़की गिरते-गिरते बची. सड़क पर दारू पीकर वाहन चलाने वाले कितने लोगों पर जुर्माना किया गया, पता कर लीजिए. एक बस में, ई-रिक्शे में कितने लोगों के बैठने की व्यवस्था है, और कितने बैठे हैं, और इसी बैठने के बीच लड़कियों के साथ क्या होता है, उसकी कहानियां भी सामने हैं. ऐसे में कोई लड़की अपने साथ हुई बदतमीजी की शिकायत लेकर पुलिस थाने जाए तो उसके अनुभव पर बातचीत कर लीजिए. हेल्प लाइन को घनघना कर देख लीजिए कितनी तत्परता से कार्रवाई हुई. तो पहला निचोड़ तो यह है कि सुरक्षा के लिए जो कुछ भी है उसे ठीक से सक्रिय किया जाए.


आजकल हर समस्या का हल तकनीक से निकालने की अजीब से आदत हो गई है. मोबाइल में लोकेशन शेयरिंग की सुरक्षा, सीसीटीवी कैमरे, आथिंटिकेशन कोड आदि-आदि के भी खूब आइडिया साझा किए जा रहे हैं पर यह सब अपराध होने के बाद काम आने वाले आइडिया हैं, ठीक है कि पकड़े जाने के भय से अपराध कुछ कम हो सकते हैं, लेकिन नहीं हो रहे. तो क्या इसका कोई और भी सिरा है जब कोई अपराध किया जा रहा हो, तो क्या ऐसा सपोर्ट सिस्टम है जिससे उसे रोके जाने की भी पहल हो सके. इसके भी अनुभव बहुत खराब रहे हैं, इसलिए हमारे समाज में लोग मदद करने से भी आगे आने से डरते हैं. दूसरी बात यह फिर केवल तकनीक के भरोसे समाज को नहीं छोड़ें.


यहां तक कि खुद के साथ हो रहे अपराधों को भी दर्ज कराने के लिए सोर्स का सहारा लेना पड़ता है. गौर कीजिए कि आखिर क्या ऐसी स्थितियां हैं जिनके चलते महिलाएं अपने साथ हुए अत्याचार पर चुप रह जाती हैं वह भले ही घरों में हुए हों या सड़क पर. तो तीसरी बात कि चुप न रहें.


यह वह सारे सवाल हैं जिन्हें रातों-रात कोई प्रोजेक्ट से हल नहीं किया जा सकता है. एक लंबी अवधि में निर्मित हुई परिस्थितियां हल करने के लिए भी एक लंबे वक्त और ईमानदार कोशिशों की मांग करती हैं. चौथी बात सभी लोग इसमें शामिल हों.


कुछ लड़कियां कहानियां सुना रही हैं, खुद के हौसले की. उन्होंने खुद को मजबूत किया, घर से बाहर निकलीं, रात तीन बजे किसी सुनसान स्टेशन पर खुद आटो करके अपने गंतव्य तक पहुंचने की खुद्दार कहानी. अच्छी बात है, यह सबसे बेहतर और सबसे टिकाउ रास्ता है. पांचवीं बात खुद मजबूत बने और दूसरों को बनाएं.


हमारे यहां महिलाओं की इज्जत को भी इतना उपर रखा गया है कि किसी अपराध के बाद मानो उसकी जिंदगी उसका वजूद खत्म ही हो जाता हो. छठी बात हम उतना स्पेस क्रिएट करें कि किसी अत्याचार का शिकार हुई निरपराध और निर्दोष महिला समाज में उनते ही सम्मान से जी पाए. आधी आबादी के लिए सभ्य समाज बनाने की मंजिल बहुत दूर है, रास्ता बहुत लंबा है, सब मिलकर चले तो ही कुछ हो पाएगा. बातें और भी हो सकती हैं, मैंने शुरू कर दी हैं आप इसे आगे बढाएं.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: December 4, 2022, 10:01 am IST

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