इको निवास: 80 साल बाद भी क्यों प्रासंगिक है बापू कुटी

भारत सरकार ने 2018 में इको निवास संहिता (Eco Niwas Samhita) का मॉडल बिल्डिंग कोड बनाया है. इस की तीन बातें महत्वपूर्ण हैं- प्राकृतिक वेंटीलेशन, बिजली की बचत और पर्याप्त प्रकाश की उपलब्धता. अनुमान है कि इस कोड को लागू करने से 2030 तक 125 अरब यूनिट की बिजली की बचत होने की संभावना है जो करीब 100 मिलियन टन कॉर्बन डाइ आक्‍साइड के उत्‍सर्जन के बराबर है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 14, 2020, 10:31 PM IST
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इको निवास: 80 साल बाद भी क्यों प्रासंगिक है बापू कुटी
भोपाल की स्वयंसेवी संस्था मुस्कान ने अपने कार्यालय के लिए कच्चा मकान बनाया है.
महात्मा गांधी ने जब साबरमती का अपना अच्छा खासा आश्रम छोड़कर सेवाग्राम को अपना ठिकाना बनाने का निर्णय लिया तो उन्होंने अपने लिए बनने वाले आवास के लिए दो शर्तें सामने रखी थीं. पहली शर्त यह कि भवन की लागत सौ रुपए से अधिक नहीं होनी चाहिए. दूसरी शर्त यह कि इसमें जो भी सामग्री लगे, वह आश्रम के आसपास से ही आनी चाहिए. इन दोनों शर्तों को पूरा किया गया. बापू कुटी महात्मा गांधी के पर्यावरण की चिंता का एक अनुपम उदाहरण है.

सेवाग्राम में साल में औसतन छह से सात लाख लोगों के कदम पड़ते हैं. इसके बाद भी आज मिटटी, बांस—बल्लियों का खपरैल वाला यह घर समाज के लिए संदेश देता है. वास्तुकार हिमांशु सोनी ने सेवाग्राम की बापू कुटी पर हाल ही में अध्ययन कर बताया है कि बापू कुटी किसी भी दूसरी इमारत से 125% ज्यादा पर्यावरण अनुकूल है. अस्सी साल बाद आज भी यह कच्ची इमारत बहुत कम रखरखाव के बावजूद अच्छी स्थिति में है. ऐसे में कच्चे—पक्के की बहस भी बेमानी हो जाती है.

बीते चार—पांच दशक में हर तरह की तकनीक ने तेजी से तरक्की की है. निर्माण पहले से ज्यादा मजबूत हैं. निर्माण सामग्री में भी कई प्रकार के परिवर्तन आए हैं. लेकिन यह परिवर्तन टिकाऊ और पर्यावरण हितैषी नहीं बन पाया. यही कारण है सीमेंट की इमारतों से शहर कांक्रीट के जंगलों में बन गए. इन इमारतों में बिना एयरकंडीशन के रहना मुश्किल हो गया. यह मनुष्य के लिए तो बड़ा खतरा है ही, प्रकृति के लिए भी भयंकर संकट बनकर खड़ा हो गया है. दुनिया ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से जूझ रही है. लेकिन क्या छोटी—छोटी कोशिशों से हम दिनों—दिन भयावह होते जा रहे इस खतरे को कम कर सकते हैं. निश्चित रूप से हमें कुछ टिकाऊ मॉडल के जरिए गंभीर काम करने की जरुरत है, जो दूसरों के लिए प्रेरणा बनकर सामने आएं.

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हाल ही में एक इमारत बनकर तैयार हुई है. एक स्वयंसेवी संस्था एकलव्य ने अपने आफिस के निर्माण में जिन बारीक चीजों का ध्यान रखा है, वह काबिले तारीफ है. इस इमारत में आप बिना एयरकंडीशन के आराम से काम कर सकते हैं. इसकी बड़ी खिड़कियां, रोशनी की व्यवस्था और क्रॉस वेंटिलेशन ने यह काम आसान बनाया है. एकलव्य के इस काम से नजदीक से जुड़े मनोज निगम बताते हैं कि इस इमारत के निर्माण में निज ईंटों का प्रयोग किया गया है वह चूने, मिट्टी और राख से बनाकर धूप में पकाया गया है.
भोपाल.


इस इमारत में कहीं सीमेंट का प्लास्टर नहीं किया गया है. फर्श को भी परम्परागत शैली में बनाया गया है, जिसमें पत्थरों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. रेल कोच के रियूज्ड खिड़कियों का प्रयोग किया गया है. पानी का सिस्टम इस तरह बनाया गया है कि एक भी बूंद पानी इमारत के बाहर नहीं जाता है, चार रिचार्ज वेल के जरिए पूरा पानी जमीन के अंदर चला जाता है जिससे यह पूरे इलाके का ग्राउंड वाटर बेहतर बना रहे. वास्तुकार चित्रा विश्वनाथन ने इस ग्रीन ​बिल्डिंग को साकार किया है.

भोपाल की ही एक दूसरी इमारत मिट्टी का घर का जिक्र करना भी यहां उचित होगा. यह घर भी एक स्वयंसेवी संस्था मुस्कान का है. मुस्कान भोपाल शहर की झुग्गी बस्ती में काम करती है. संस्था ने जब अपने कार्यालय के निर्माण के लिए सोचा तो उनके सामने यह सवाल था कि कैसा निर्माण होना चाहिए जिससे इन समुदाय के लोगों को वह अपना सा लगे. बहुत चिंतन के बाद जो तस्वीर निकलकर सामने आई वह था मिट्टी का घर. यह निर्माण जहां लोगों के अपने परिवेश पर आधारित था. स्थानीय स्तर पर मिलने वाली सामग्री से इसका निर्माण हुआ. इसमें स्थानीय समुदाय के लोगों ने श्रमदान करके अपनी मेहनत से सींचा है.भारत में अधोसंरचना निर्माण की गति बहुत तेज है. इनमें आवास और कार्यालयों की इमारत का एक बड़ा हिस्सा है. भारत में आवासहीनों की आबादी को देखते हुए सरकार ने आवास की योजना पर खासा ध्यान दिया है. प्रधानमंत्री आवास योजना के जरिए जहां छोटे घरों के निर्माण किए जा रहे हैं. वहीं प्राइवेट सेक्टर भी मध्यमवर्गीय और उच्चवर्गीय परिवारों को केन्द्र में रखकर आगे बढ़ रहे हैं. ऐसा माना जा रहा है कि 2030 तक आवासीय क्षेत्र 2017 की तुलना में दोगुना हो जाएगा. इसके साथ ही आवासीय प्रयोजन की बिजली का हिस्सा भी 25% की तुलना में 37% तक बढ़ जाएगा. बिजली उत्पादन केवल पूर्ति का मसला नहीं है इसके बदले में हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना पड़ता है, और इसका एक सिरा जलवायु परिवर्तन से भी जाकर जुड़ता है, तो इसको किफायत से खर्च करना समझदार सोच लगती है.

भारत सरकार ने इसी सोच के साथ 2018 में इको निवास संहिता का एक मॉडल बिल्डिंग कोड दिया है. इस कोड की तीन बातें महत्वपूर्ण हैं ये हैं प्राकृतिक वेंटीलेशन, बिजली की बचत और पर्याप्त प्रकाश की उपलब्धता. अब ज​बकि भारत में भवन निर्माण अनवरत रूप से जारी है तो हमें इको निवास संहिता के पालन के बारे में समग्रता से सोचना चाहिए. खासकर सरकारी आवास योजनाओं में तो इसे कड़ाई से पालन करवाया ही जा सकता है. अनुमान लगाया जा रहा है कि इस कोड को लागू करने से 2030 तक 125 अरब यूनिट की बिजली की बचत होने की संभावना है जो करीब 100 मिलियन टन कॉर्बन डाइ आक्‍साइड के उत्‍सर्जन के बराबर है.

यह शहरों के कांक्रीट के जंगल हो जाने के खतरों को भी कम करता है. कम ही सही पर ऐसी इमारतों को देखकर सुकून मिलता है, जरूरत इस बात की है कि ऐसे प्रयोग बड़े पैमानों पर हों, प्रयोग, प्रयोग न रहें, वह लोगों के अभ्यास में आ जाएं. इसके लिए सस्ती तकनीकों पर भी लगातार काम किए जाने की जरूरत बनी रहेगी. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.) 
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First published: October 14, 2020, 10:31 PM IST
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