गोडसे का हर समर्थक गांधी की राह पर लौटे!

कांग्रेस पार्टी की अपनी कमजोरियां हैं, जो दूर होने का नाम ही नहीं ले रही हैं, यह घटना भी उनमें से एक है. यही मामला यदि भारतीय जनता पार्टी के साथ हो रहा होता तो संभव था कि ऐसे हालात नहीं बनते! इसे पार्टी के अंदर का लोकतंंत्र कहकर दिल को तसल्ली दी जा सकती है, लेकिन लोकतंत्र छवि की कीमत पर नहीं हो सकता है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 26, 2021, 8:48 PM IST
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गोडसे का हर समर्थक गांधी की राह पर लौटे!
भारतीय जनता पार्टी या अन्य दलों को भी इतना अधिकार है कि वह इस परिवर्तन को नैतिकता के तकाजे पर तौलकर रख पाए.

सेवाग्राम के गांधी आश्रम में बापू की ‘आखिरी निवास’ है. इस कुटी पर एक लाइन अंकित है, जिसमें नाथूराम गोडसे को ‘एक सिरफिरा’ बताया है, उसे हत्यारा नहीं लिखा गया है. यह गांधीवाद की एक झलक है. महात्मा गांधी अपने जीवन में जितने प्रयोगधर्मी और नवाचारी हैं, जिस सीमा तक अपने शत्रुओं को जगह देते हैं, यह पंक्ति उनके उसी आयाम का विस्तार करती है. अब जबकि मध्यप्रदेश में गोडसे की पूजा करने वाले हिंदू महासभा के एक कार्यकर्ता को कांग्रेस ने अपने दल में शामिल कर लिया है, इस बात पर बड़ी चर्चा हो रही है कि कांग्रेस ने यह सही किया है या नहीं ?


जो इस प्रहसन से वाकिफ नहीं हैं उनको बता दें कि ग्वालियर में पिछले दिनों एक राजनैतिक कार्यकर्ता बाबूलाल चौरसिया को पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कांग्रेस में शामिल करवाया. दिलचस्प यह है कि बाबूलाल खुद उस वार्ड से पार्षद हैं जहां पर नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाया जाना था. बाबूलाल चौरसिया इससे पहले कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता रहे हैं और उन्हें टिकट नहीं दिए जाने पर उन्होंने हिंदू महासभा से चुनाव लड़ लिया था. अब वे दोबारा कांग्रेस में लौट आए हैं. उनकी इस एंट्री पर मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव ने खुलकर विरोध किया है. अपने टिवटर हैंडल के माध्यम से उन्होंने पहले तो बापू हम शर्मिंदा हैं, लिखकर खुलेआम आलोचना की, फिर एक पत्र लिखकर तमाम सवाल उठाए और कहा कि इस मसले पर वह खामोश नहीं बैठ सकते. इस मामले पर भारतीय जनता पार्टी के नेता भी कांग्रेस को घेरने में लगे हैं


इस बात के तीन सिरे हैं. क्या बाबूलाल चौरसिया को वाकई प्रायश्चित है कि उन्होंने हिंदू महासभा की सदस्यता ली और वह एक गलत राह पर चले गए थे, जैसा कि वह कह भी रहे हैं कि उन्हें महासभा के सदस्यों ने अंधेरे में रखकर गोडसे की पूजा करवाई और उन्होंने पिछले कुछ समय से उससे किनारा भी कर लिया था. यदि वह वाकई इतने भोले हैं कि उनसे ऐसा करवाया जा सकता है, क्या यह राजनैतिक परिपक्ता की निशानी है ? क्या कांग्रेस उन्हें दोबारा अपने परिवार में वापस लाने के लिए इतनी परिपक्व है कि वह गांधीवाद को इतनी गहराई से अपना रही है जहां कि एक हत्यारे को सिरफिरा कहने की परम्परा रही है. क्या इतना चिंतन किया गया है, और यदि वाकई ऐसा है तो क्या उनकी अपनी पार्टी में इस बात को लेकर चिंतन-मनन किया गया, कि इस परिवर्तन के क्या परिणाम होने वाले हैं ? यदि पार्टी में इसको लेकर रजामंदी की गई है, यदि की गई है तो पार्टी के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव इतने खफा क्यों हैं ? क्या इसके लिए पार्टी हाईकमान से भी कोई रायशुमारी की गई है ?


तीसरा क्या भारतीय जनता पार्टी या अन्य दलों को भी इतना अधिकार है कि वह इस परिवर्तन को नैतिकता के तकाजे पर तौलकर रख पाए. ठीक एक साल पहले मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार के गिरने और भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बीच दलबदल का सबसे रोमांचकारी प्रहसन इसी मध्यप्रदेश में देखा गया है. कल तक सेकुलर विचाधारा के प्रबल समर्थक और कांग्रेस पार्टी के पूर्व अग्रणी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को जो भारतीय जनता पार्टी ‘माफ करो महाराज’ कहती रही है, वही सिंधिया शिवराज सिंह चौहान के दोबारा सरकार बनवाने में प्रमुख भूमिका में रहे हैं. ऐसे में दलबदल की नैतिकता के मापदंडों पर वह खुद भी खरे नहीं उतरते हैं. पार्टी के विस्तारवाद के तर्क पर उनके घर भी विपक्षी पार्टी के असंतुष्ट नेताओं के लिए खुले ही हैं.


कांग्रेस पार्टी की अपनी कमजोरियां हैं, जो दूर होने का नाम ही नहीं ले रही हैं, यह घटना भी उनमें से एक है. यही मामला यदि भारतीय जनता पार्टी के साथ हो रहा होता तो संभव था कि ऐसे हालात नहीं बनते! इसे पार्टी के अंदर का लोकतंंत्र कहकर दिल को तसल्ली दी जा सकती है, लेकिन लोकतंत्र छवि की कीमत पर नहीं हो सकता है.


कोई भी व्यक्ति कभी भी प्रायश्चित कर सकता है और उसे इसका मौका दिया ही जाना चाहिए. यदि कोई गोडसे का समर्थक, उसके नजदीक जाकर, उसकी सच्चाई को समझ लेता है और वापस गांधी की ही राह पर लौट आता है तो इससे बढ़ी गांधीवाद की जीत कोई और हो नहीं सकती, लेकिन तय यह करना होगा कि यह गांधीवाद है या गांधीवाद ओढ़कर उनके नाम से की गई राजनीति है. क्या आज की राजनीति गांधीवाद को समझ रही है और उनके समग्र चिंतन को उनके अनुरूप अपनाए जाने की कोशिश कर रही है, या फिर यह केवल एक राजनैतिक प्रहसन है.

गांधी ने अपने संवाद को इतना विस्तार दिया था, सहज और प्रभावी बनाया था कि अंग्रेज वायसराय ने उनसे बात करने के लिए सेवाग्राम आश्रम में एक टेलीफोन की हॉटलाइन लगवाई थी, वह अंग्रेज अफसर जिससे गांधी स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे थे, उनके आश्रम के आंगन में खाट पर सो जाता था, और उसी पार्टी के उनके वंशज आज संचार क्रांति होने के बाद भी एक महत्वपूर्ण बात पर एकमत होकर निर्णय नहीं कर पाते हैं ! हम आशा और उम्मीद करते हैं कि गोडसे की विचारधारा का हर समर्थक गांधी की तरफ लौटे, सोचविचार कर लौटे, अहिंसा और सत्य की राह पर लौटे. लौटे, सोचसमझ कर लौटे.


(ये लेखक के निजी विचार हैं.)



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: February 26, 2021, 8:47 PM IST
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