ऐसा किसान दिवस तो कभी नहीं आया!

किसान आन्दोलन के बाद समाज का एक हिस्सा उसे अब भी उसी तरह इमेजिन करता है. दिल्ली की सीमा पर बैठे किसानों को उसे किसान मानने से ही इंकार करने का ट्रेंड चलने लगा. उस पर तमाम सवाल उठाए जाने लगे !

Source: News18Hindi Last updated on: December 23, 2020, 10:29 AM IST
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ऐसा किसान दिवस तो कभी नहीं आया!
दिल्ली में किसानों का आंदोलन जारी है.
'किसानों को उनकी योग्य स्थिति मिलनी ही चाहिए और देश में उनकी आवाज सबसे ऊपर होनी चाहिए. अगर विधानसभाएं किसानों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ सिदध सिद्ध होती हैं तो किसानों के पास सविनय अवज्ञा और असहयोग का अचूक इलाज तो हमेशा होगा ही.'

महात्मा गांधी की आजादी के पहले 1945 में बाम्बे क्रोनिकल में लिखी इस बात को हम 2020 में किसान दिवस के रोज कैसे देखते हैं ? 23 दिसंबर को जब देश के पांचवे प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन को ‘किसान दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा होगा तब निश्चित रूप से देश की आत्मा दुखी होगी, क्योंकि देश के लाखों किसान सर्दियों के सबसे कठिन दिनों में भी दिल्ली की सड़कों पर बैठे हैं! बातचीत किसी नतीजे पर फिलहाल पहुंचती नहीं दिखाई दे रही है. दोनों ही पक्ष अपनी—अपनी बात पर अड़े हैं. ऐसे किसान दिवस को इतिहास अपने पन्ने में दर्ज करना चाहेगा भी या नहीं.

गांधी कहते हैं, 'यदि हमें लोकतांत्रिक स्वराज्य हासिल करना हो और यदि हमने अपनी स्वतंत्रता अहिंसा से पायी हो तो जरुर ऐसा ही होगा, तो उसमें किसानों के पास राजनीतिक सत्ता के साथ हर किस्म की सत्ता होगी.'


चौधरी चरण सिंह की ताजपोशी ने किसानों के मन में उम्मीदें जगाई थीं. उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने किसानों के लिए जरूरी काम किए भी थे. वह भारतीय कृषि में जमींदारी को वह एक बड़े दोष के रूप में देखते थे और इससे मुक्ति उनका सपना रही, लेकिन उनका कार्यकाल लंबा न चल सका. यहां तक कि एक प्रधानमंत्री के रूप में वह संसद को संबोधित भी नहीं कर सके. चरण सिंह यदि देश में कुछ ज्यादा समय तक इस भूमिका में रहते तो शायद परिस्थितियां कुछ बेहतर हो सकती थीं, लेकिन भारतीय खेती को मुंशी प्रेमचंद के किस्से—कहानियों वाला ही रहना था.
सरदार पटेल ने आजादी के पहले 1935 में एक किसान सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए अपने भाषण में भारतीय किसान का यूँ वर्णन किया था.. 'हमारे अस्सी प्रतिशत लोग किसान हैं. भारत के किसान सर्वाधिक गरीब लोग हैं और उनकी स्थिति संसार के अन्य भागों के किसानों की स्थिति से अधिक कष्टप्रद है. उनमें से करोड़ों लोग दो समय का भरपेट भोजन प्राप्त करने में भी असमर्थ हैं और वे भी न्यूनतम पोषाहार के रूप में. आधे खाली पेट के साथ काम पर जाना भारतीय किसान के लिए एक आम बात हो गई है. उसकी चमड़ी और उसकी हड्डियाँ के बीच बहुत कम मांस और रक्त होता है. उसकी मलिन कांतिहीन आंखें खोपड़ी के अगले भाग में दो छिद्रों के समान होती है. उसके मुख पर जीवन की कोई चमक नहीं होती और उसके हृदय में जीने की कोई ललक नहीं होती. उसे वर्णमाला के अक्षरों की पहचान करने के अवसर से भी वंचित कर दिया जाता है.'


किसान आन्दोलन के बाद समाज का एक हिस्सा उसे अब भी उसी तरह इमेजिन करता है. दिल्ली की सीमा पर बैठे किसानों को उसे किसान मानने से ही इंकार करने का ट्रेंड चलने लगा. उस पर तमाम सवाल उठाए जाने लगे !

यह सही बात है कि इस भाषण और 2020 में खेती की तस्वीरों में फर्क नजर आएगा. अब बैल—बक्खर वाला किसान ट्रेक्टर और हारवेस्टरों पर दिखाई देगा, लेकिन उत्पादन बढ़ने से, मशीनें बढ़ने से, या झोपड़ों से पक्के मकानों तक आ जाने के इस सफर के बाद भी लाभ का आंकड़ा वैसा नहीं बढ़ता जैसा दूसरे उद्योग धंधों का. और यह स्थिति सभी की भी नहीं है. पंजाब के किसान की तुलना छत्तीसगढ़ या बिहार या दक्षिण भारत के किसान से ठीक वैसी नहीं हो सकती, लेकिन सभी जगह एक बात बहुत सामान्य है कि फसलों की लागत इतनी ज्यादा बढ़ गई है, कि किसान न्यूनतम मूल्य दिए जाने की मांग कर रहा है, न्यूनतम मूल्य होने के बावजूद बिना सरकार के सहारे के उसे वह भी हासिल नहीं है, जमींदारी भले ही उस रूप में न हो, लेकिन बाजार के गणित में वह असफल है.सरदार पटेल ने उसी भाषण में यह भी कहा था कि ‘किसानों की दुर्दशा के लिए सरकार की प्रशासनिक नीतियां जिम्मेदार हैं. यह एक अधूरा दृटिकोण है जो लोगों को यह विश्वास दिलाता है कि किसानों की इस दर्दशा के लिए जमींदारी प्रणाली जिम्मेदार है.‘

यदि आजाद भारत में अब सरकार के किन्हीं सुधारों पर हजारों किसानों को संशय हो तो इस संशय को दूर करना जरूरी है, क्योंकि यह उनकी अपनी निर्वाचित सरकार है, और वह किस भारी भरोसे और उम्मीदों से चुनी गई है, इस पर भी कोई आंकड़ा देने की जरुरत नहीं है. पर विचित्र बात है कि एक तरफ तो संवाद की प्रक्रिया चलाई जाती है दूसरी तरफ किसानों के लिए झूठे प्रचार भी मुस्तैदी से किए जाते हैं.


गांधी के शब्दों में ‘यदि भारतीय समाज को शांतिपूर्ण मार्ग पर सच्ची प्रगति करनी है तो धनिक वर्ग को निश्चित रूप से स्वीकार कर लेना होगा कि किसान के पास भी वैसी आत्मा है जैसी उनके पास है और अपनी दौलत के कारण वे गरीब से श्रेष्ठ नहीं है. उनके पास जो धन है उसे यह समझकर रखना चाहिए कि उसका उपयोग उन्हें अपने संरक्षित किसानों की भलाई के लिए करना है.‘
आगे गांधी लिखते हैं कि ‘यदि पूंजीपति वर्ग काल का संकेत समझकर संपत्ति के बारे में अपने इस विचार को बदल डालें कि उस पर उनका ईश्वर प्रदत्त अधिकार है तो जो सात लाख घूरे आज गांव कहलाते हैं उन्हें आनन—फानन में शांति, स्वास्थ्य और सुख के धाम बनाया जा सकता है.' यदि वास्तव में आपको लगता है किसान इस देश का अन्नदाता है और उसने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आपके देश को खादयान्न में आत्मनिर्भर बना दिया है, इतना अनाज पैदा कर दिया है कि कोरोना काल में लॉकडाउन जैसे कड़े फैसलों की हिम्मत कर पाए तो हमें यह सोचना होगा कि जो किसान देश के लिए यह सब कर रहा है देश उसके लिए क्या कर रहा है ?

हाल यह है कि न तो दौलत किसानों के लिए आ पाई, तमाम स्तरों पर किसानों का शोषण जारी रहा और जारी है, इतना कि पिछले दो दशकों में तकरीबन तीन लाख किसानों ने आत्महत्या करने पर मजबूर हुए हैं, वहीं किसानों के गांवों में भी विकास आधा—अधूरा पहुंचा. किसानों के लिए योजनाएं आईं, सम्मान की बात भी की गई, पर इससे उनकी औसत आय में आमूलचूल इजाफा न हो सका. मौसम की मार से टक्कर लेता किसान अब कानून और नीतियों से भी दो—दो हाथ कर रहा है. हालात यह है कि गांव—देहात के किसानपुत्रों को बहू मिलना मुश्किल हो रहा है, और किसान अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता.

किसान दिवस के दिन सरदार पटेल की यह बात भी किसानों को याद रखनी चाहिए.. ‘किसान अपनी शक्तियों के बारे में अनजान है. जब मैं यह कहते हुए सुनता हूं कि किसान जो संसार को खिलाता है, कमजोर है, दरिद्र है और निराश है तो मैं उसके लिए दुखी हो जाता हूं. लेकिन जब मैं यह देखता हूं कि किसान स्वयं यह विश्वास करने लगा है कि वह निर्बल है तो मुझे अधिक दुख होता है. '

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: December 23, 2020, 10:29 AM IST
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