बांध लबालब और बारिश अभी शेष, यह वक्त है सबसे ज्यादा सावधानी का

इस बार मध्यप्रदेश पर मानसून कुछ ज्यादा ही मेहरबान है. प्रदेश के 14 जिलों में ज्यादा और 23 जिलों में सामान्य बारिश दर्ज की जा चुकी है. भारी बारिश के साथ प्रदेश खतरे के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है. हम धार जिले में कारम बांध को टूटते देख चुके हैं. वक्त पर सचेत होकर ही खतरों को टाला जा सकता है. यह बहुत समझदारी और समन्वय से आपदा को टालने का समय है.

Source: News18Hindi Last updated on: August 17, 2022, 4:54 pm IST
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बांध लबालब और बारिश अभी शेष, यह सबसे ज्यादा सावधानी का वक्त
मध्‍य प्रदेश में भारी बारिश

यह बात है 1999 में सितम्बर महीने की. बारिश विदा पर थी, भरपूर पानी बरस चुका था, बांध गले-गले भर चुके थे, ऐसे मौसम में अचानक नर्मदा में बाढ़ आ गयी, पांच छ दिन खूब नर्मदा और उसकी सहायक नदियों में खूब पानी भरा रहा और जब यह उतरा तो काफी नुकसान हो चुका था, इस बाढ़ को 1973 की बाढ़ के बाद दूसरी बड़ी बाढ़ बताया गया, 1973 में आपदा का कारण ज्यादा बरसात होना था, लेकिन इस बार जो बाढ़ थी उसका कारण बांधों से एक के बाद निरंतर पानी छोड़ देना, यह सारा पानी नर्मदा के निचले हिस्सों में एक साथ पहुंचा और उसने भारी नुकसान पहुंचाया. जानकारों ने बताया कि इसका कारण प्राकृतिक कम और ‘मानव जनित कुप्रबंधन’ अधिक था.


हालात एक बार फिर वैसे ही हैं, देश में इस बार मध्यप्रदेश पर मानसून कुछ ज्यादा ही मेहरबान है, प्रदेश के 14 जिलों में ज्यादा और 23 जिलों में सामान्य बारिश दर्ज की जा चुकी है. ज्यादा बारिश के मामले में यह अब तक देश में पांचवे नंबर पर है. बारिश के दो माह में ही तकरीबन छोटे-बड़े ताल तलैया, नदी-नाले, जलाशय, बांध लबालब भर चुके हैं, अब हालत यह हैं कि थोड़ी भी बारिश भी हो रही है तो जलाशयों के गेट खोल कर पानी निकालना पड़ रहा है, ऐसे में सबसे ज्यादा जरुरी यह हो जाता है कि किस समन्वय के साथ बांधों से पानी छोड़ा जाए ताकि, निचले इलाकों में डूब न आए !


नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवन रेखा है. कुल तेरह सौ किलोमीटर के हिस्से में से इसका बड़ा भाग मध्य प्रदेश में मौजूद है. सरकार ने नर्मदा घाटी विकास परियोजना के जरिए नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर तकरीबन 29 बड़े, 135 मंझोले और तीन हजार छोटे बांध बनाने की परियोजना बनाई है. एक के बाद एक बांध को कहीं बिजली, कहीं सिंचाई के मकसद से बनाया आया है, नर्मदा का सबसे पहले बड़ा बांध रानी अवन्ती बाई सागर जबलपुर के पास बरगी में बनाया गया है, इसके बाद बारना और फिर नर्मदा की सहायक नदी तवा पर एक बड़ा बांध है, आगे चलकर इंदिरा सागर बांध पुनासा, ओमकारेश्वर, महेश्वर और फिर सरदार सरोवर. यह सारे बड़े बांध हैं, और सभी लगभग पूरे भी हो चुके हैं. इनमें पानी भी पर्याप्त भर चुका है. इन सभी बांधों के गेट खोलकर पानी निकाला जा चुका है. यहाँ तक कि सरदार सरोवर से भी, जो कि नर्मदा पर सबसे बड़ा बांध है. ऐसे में आने वाला एक महीना बड़ा चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि बारिश बाकी है.


देश में बांधों के रखरखाव, सुरक्षा, संचालन के लिए वर्ष 2021 में बांध सुरक्षा अधिनियम बनाया गया है. यह अधिनियम पिछले साल दिसंबर महीने से अधिनियमित किया गया है. देश में 2022 में 5334 डेम हैं, महाराष्ट्र 2,394 बांधों के साथ पहले स्थान पर है, जबकि मध्य प्रदेश और गुजरात बांधों की संख्या के मामले में दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। इस नजरिये से यह बहुत जरूरी भी हो जाता है, तीनों ही राज्य सटे हुए हैं, इससे यह एक संवेदनशील क्षेत्र भी बन जाता है.


बांधों के लिए तय प्रोटोकाल के हिसाब से उसमें पानी भरकर रखा या छोड़ा जाता है, यह बारिश और अवधि पर निर्भर करता है, इसी अनुसार बांध प्रबंधन निर्णय लेता है, इसमें कोई दिक्कत नहीं है, दिक्कत तब होती है जबकि एक साथ ही कई बांध वाले इलाकों में बारिश हो जाये और गाइड लाइन यह कहने लगे कि गेट खोलो और पानी निकालो, ऐसे में निचले इलाकों में तबाही से कोई इनकार नहीं कर सकता, पानी भी बहुत मंद गति से उतरता है क्योंकि सहायक नदियों में भी भरपूर पानी होता है और मुख्य नदी का पानी उसे आगे बढ़ने का रास्ता नहीं देता जिससे बैक वाटर ऐसे इलाकों को भी चपेट में ले लेता है जहाँ पर कि बाढ़ का खतरा नहीं होता है.


हालांकि प्रशासन मुस्तैद है, जल संसाधन विभाग एसएमएस बेस्ड सिस्टम के जरिए प्रदेश के सभी बांधों की पल-पल की निगरानी करते हुए उचित प्रबंधन कर रहा है, बाढ़ की स्थिति पर भी उसकी नजर है ही, लेकिन कोई भी सिस्टम प्रकृति के सिस्टम को चुनौती नहीं दे सका है, जब विभीषिका आती है तो वह किसी से रोके नहीं रूकती, आजादी के बाद से अब तक 40 बांध विफल होकर टूट भी चुके हैं, हाल ही में मध्यप्रदेश के धार जिले में कारम बांध को टूटते हमने देखा है, इसलिए वक्त पर सचेत होकर ही खतरों को टाला जा सकता है.


मध्यप्रदेश भारी बारिश के साथ खतरे के उसी मुहाने पर आ खड़ा हुआ है जहांं पर कि बहुत समझदारी और समन्वय ही उसे ऐसे किसी ऐसी स्थिति से बचा सकते हैं, इसके साथ ही डेम की सुरक्षा पर भी पर्याप्त ध्यान देने की आवश्यकता होगी. हम प्रकृति से प्रार्थना करेंगे कि ऐसी कोई अनहोनी न हो.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: August 17, 2022, 4:54 pm IST