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    अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस: नमक-रोटी खाने की मजबूरी, जब सब्जी बनी सपना

    आज अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस है. कोरोनाकाल ने हमें बताया है कि यदि यह साथ नहीं होता तो हालात और कितने खराब होते. हालांकि योजनाएं जमीन तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है.

    Source: News18Hindi Last updated on: November 20, 2020, 1:08 PM IST
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    अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस: नमक-रोटी खाने की मजबूरी, जब सब्जी बनी सपना
    आज अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस है.
    आज अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस है. आज उस अंतरराष्ट्रीय समझौते को 31 साल पूरे हो गए, जिसमें बच्चों के अधिकारों को पूरा करने के लिए सरकार ने हस्ताक्षर किए थे. इस दौर के बच्चों ने एक वैश्विक महामारी को सीधे अपनी आंखों से देखा है. इसने उनकी जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया है. सबसे भयानक तो यही है कि तमाम इंतजामों और राहतों के बावजूद कई बच्चों को कई रात भूखों सोना पड़ा है.

    पन्ना जिले के एलम आदिवासी और उसके परिवार को कोरोनाकाल में कई बार नमक के साथ रोटी खाकर सोना पड़ा. बकौल एलम ‘काम बंद, वाहन बंद, घर से निकलना बंद, स्कूल भी बंद. ऐसा लगा कि सबकुछ खत्म हो गया. मुश्किल दौर तो इसके बाद शुरू हुआ जब पापा को मजदूरी नहीं मिली और फसल भी नहीं हुई. ग्राम पंचायत से भी काम नहीं मिला. जो कुछ घर में रखा हुआ था, उससे गुजारा किया. यह भी ज्यादा दिन नहीं चल सका. राशन की दुकान से नमक और कुछ अनाज मिल जाता था, जिसे खाकर दिन गुजार रहे थे. सब्जियां तो हमारे लिए सपना बनकर रह गई थी. काफी समय बाद काम मिलना शुरू हुआ तब राशन खरीद पाए. कई बार उधार लेकर काम चलाया.’

    कल्पना धाकड़ शिवपुरी जिले की पोहरी तहसील के रामपुरा गांव में रहती है. पिता हरिशंकर खेती करते हैं. कल्पना के तीन भाई-बहन और हैं. 13 साल की कल्पना 8वीं में पढ़ती है. कल्पना ने बताया कि ‘लॉकडाउन के समय हमें हरी सब्जी खाने को नहीं मिल पाई. जबकि, टीवी पर तो यह बताया जा रहा है कि कोरोना से बचने के लिए अच्छा भोजन और फल आदि खाना जरूरी है.’ कल्पना ने बताया कि ‘हमारे घर में खाने में सब्जी के नाम पर आलू या दाल ही था.’

    निवाड़ी जिले के पिपरा गांव की माया अहिरवार का कहना था कि ‘उसके पिता दिनेश मजदूरी करने पहले की तरह ग्वालियर नहीं जा सके. इससे आर्थिक स्थिति बिगड़ गई, जिससे कभी रूखी-सूखी रोटी खाकर तो कभी भूखे ही सोना पड़ा. राशन की दुकान पर जाओ तो खाली हाथ लौटना पड़ता था. भूखे पेट खाली हाथ लौटने में कितना बुरा लगता है, इसका अंदाजा हर किसी को नहीं हो सकता.’
    इन बच्चों के जेहन में कोरोनाकाल ने भूख शब्द को टांक दिया है. रोटी कितनी मुश्किल है, यह सबक दे दिया है. चुनौतियां अभी सामने हैं, और संघर्ष लंबा है. अमूमन समाज बच्चों की अभिव्यक्ति पर गौर नहीं करता, लेकिन इन बच्चों की बातें हमें उनके बारे में सोचने पर मजबूर करती हैं. साथ ही यह भी बताती हैं कि भारत जैसे देश में एक अच्छी सरकार, और उनके लिए योजनाएं होना अब भी कितना जरूरी है. एक समाज जरूर उन्हें खैरात शब्द से नवाज देता है, लेकिन कोरोनाकाल ने हमें बताया है कि यदि यह साथ नहीं होता तो हालात और कितने खराब होते.


    हालांकि योजनाएं जमीन तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है. सबका साथ, सबका विकास केवल नारा नहीं होना चाहिए. निवाड़ी जिले की मुस्कान बताती है ‘हम तो पहाड़ी पर रहते हैं. ऐसे में हमें पता ही नहीं चल पाता कि पीडीएस (लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली) की दुकान पर राशन कब आया था और कब बंट गया! पहाड़ी पर बसने वालों को भी समय पर राशन मिलना चाहिए.’

    इसी जिले की संतोषी ने कहा ‘मैं राशन लेने के लिए दिनभर लाइन में लगी रही. जब मेरी बारी आई तो राशन नहीं दिया गया, क्योंकि फिंगर प्रिंट नहीं आ रहे थे. मैं बहुत उदास थी. एक सोशल वर्कर की समझाइश के बाद मुझे अनाज दिया गया. यह राशन भी एक ही बार फ्री दिया गया. इतनी मशक्कत के बाद भी केवल एक माह का राशन फ्री मिला था. बाद में वजन कराया तो राशन कम निकला.’ राखी ने कहा ‘हमें एक महीने राशन नहीं मिलता है, फिर दो महीने का राशन एक साथ दिया जाता है. ऐसे में जिस महीने राशन नहीं मिलता, उसमें संकट खड़ा हो जाता है.सरकार को हर महीने राशन वितरण करवाना चाहिए.’पन्ना जिले के कल्याणपुर गांव के 17 वर्षीय जगन्नाथ गौंड ने बताया कि ‘एक समय ऐसा भी आया जब गांव के लोगों से खाने के लिए गेहूं मांगना पड़ा. यह जीवन का सबसे मुश्किल वक्त था.’ जगन्नाथ ने बताया कि ‘लोगों को पीडीएस की दुकान से राशन मिल रहा था, लेकिन हमारे परिवार को नहीं मिला. इससे हमारे सामने भूखे मरने की नौबत आ गई. कई बार ऐसा भी हुआ कि रात का खाना खाए बिना यानी भूखे ही सोना पड़ा. कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसे दिन देखना पड़ेगा. गांव के लोगों से गेहूं मांगकर खाया. जब किसी से गेहूं मांगने जाते थे तो बहुत बुरा लगता था. हम तो मजदूर हैं. रोज कमाते और रोज खाया करते हैं. हम लोगों के पैसे इसलिए भी नहीं बच पाते थे क्योंकि, पापा बीमार हैं. इलाज में भी खर्च होता है.’

    जगन्नाथ ने यह भी बताया कि ‘कुछ समय बाद पंचायत में मनरेगा का काम शुरू हुआ, लेकिन उसकी उम्र कम होने के कारण उसे काम पर नहीं रखा गया. लोगों से उधार लेकर भी काम चलाया, लेकिन हम आदिवासियों में कोई बड़ा आदमी नहीं है जो ज्यादा उधार दे सके. इसलिए, एक समय के बाद उधार मिलना भी बंद हो गया.’

    जरधोबा निवासी बाबूराजा गौंड ने बताया कि ‘सबसे ज्यादा दुख तो तब हुआ जब पापा को बीज का गेहूं बेचकर काम चलाना पड़ा. अब अगले साल के बीज की चिंता अभी से सताने लगी है, क्योंकि सीजन में बीज बहुत महंगा मिलता है.’ पंद्रह वर्षीय राम विश्वास गौंड ने कहा कि ‘ईश्वर इतने बुरे दिन किसी को न दिखाए. भगवान करे सबकुछ पहले जैसा सामान्य हो जाए.’ रीवा जिले के दीपक ने बताया कि ‘कोरोनाकाल में उसे मध्याह्न भोजन के बदले एक बार सूखा राशन दिया गया था. इसमें चार किलो चावल थे. इसके अलावा कुछ नहीं दिया गया.’ पंकज ने कहा कि ‘पहले जब स्कूल जाते थे तो पापा कुछ पैसे दे दिया करते थे, जिससे हम कुछ न कुछ अलग खरीदकर खाया करते थे. अब खाने के सिवाय कुछ नहीं मिलता है.’
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    First published: November 20, 2020, 1:06 PM IST
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