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राजनीति कहीं अपना ही नुकसान तो नहीं कर रही

"हमारी राजनीति का पूरा विमर्श इन दिनों इन्हीं शब्दों बेशर्मी, निर्लज्जता, दंभ, स्वार्थ, धोखाधड़ी, षडयंत्र, गुलामी, लोलुपता, पतन आदि के इर्द-गिर्द बड़ी बेशर्मी किसी क्रिकेटिया रोमांच की तरह चल रहा है."

Source: News18Hindi Last updated on: April 13, 2020, 3:03 PM IST
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राजनीति कहीं अपना ही नुकसान तो नहीं कर रही
(News18 क्रिएटिव) तस्वीर का इस्तेमाल केवल संदर्भ के लिए किया गया है.
लेखक चिन्मय मिश्र आज अपने साप्ताहिक कॉलम में एक दिलचस्प विश्लेषण लेकर आए हैं. उन्होंने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए अरविंद कुमार और कुसुम कुमार के समांतर कोष पर नजर डालते हुए कुछ शब्दों को निकाला है. इसके मुताबिक इस कोष में बेशर्मी, बेशर्म और नग्नता के लिए 47, निर्लज्जा के लिए 13, दंभी या घमंडी के लिए 106, स्वार्थ या स्वार्थी के लिए 22, धोखाधड़ी या षडयंत्र के लिए 123, गुलामी दासता व विभिन्न प्रकार की गुलामी के लिए 52, लोलुपता के लिए 14, पतन के 42, असभ्य या असभ्यता के लिए 82, धृष्टता के लिए 36 पर्यायवाची शब्द लिखे हैं.

लेखक के मुताबिक जब वह यह शब्द खोज रहे थे तो हर शब्द के आगे उन्हें किसी न किसी राजनेता, उदयोगपति या नौकरशाह का चेहरा नजर आ रहा था. हाल—फिलहाल एक और लेख पढ़ा था जिसमें लेखक ने यह बताया है कि वह 2020 को याद ही नहीं करना चाहते हैं. सवाल है कि क्या सचमुच हम इतने बुरे दौर में पहुंच गए हैं जहां केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं, उन आधारभूत मानवीय मूल्यों, सामाजिक स्थापनाओं, सांस्कृतिक व्यवहारों के लिए ही कंगाली की दशा में जा पहुंचे हैं, जिनके लिए कोई खर्च नहीं करना पड़ता ! वह गरीबी सी गरीबी की दशाओं और बुरी से बुरी अवस्थाओं में भी थोड़े से मानवीय प्रयासों से किए जा सकते हैं, पर नहीं. हमारी राजनीति का पूरा विमर्श इन दिनों इन्हीं शब्दों बेशर्मी, निर्लज्जता, दंभ, स्वार्थ, धोखाधड़ी, षडयंत्र, गुलामी,  लोलुपता, पतन आदि के इर्द—गिर्द बड़ी बेशर्मी किसी क्रिकेटिया रोमांच की तरह चल रहा है.

बीती शाम मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री निवास से कुछ मीटर की दूरी पर स्थित रवीन्द्र भवन में हरिशंकर परसाई के व्यंग्यों पर आधारित नाटक निठल्ले की डायरी को देखते हुए भी यह महसूस किया कि तीस सालों में आठ सौ प्रस्तुतियों के बाद भी यह नाटक क्यों इतना प्रासंगिक बना हुआ है, इसलिए क्योंकि हरिशंकर परसाई को पढ़ते हुए भी या यह नाटक बार—बार देखते हुए भी हमें कभी यह ख्याल नहीं आया कि इसे बदला जाए. इस व्यवस्था को बदला जाए. कुछ सबक लिया जाए. मुद्दों की बात की जाए. शिक्षा पर ध्यान दिया जाए. स्वास्थ्य संस्थाओं को ठीक ​किया जाए. पर ऐसा होता नहीं है, चुनाव के वायदे सालों—साल उसी तरह से बस वायदे बने रहते हैं और परसाई के नाटक की तरह तबादलों का सिलसिला वास्तविक दुनिया में भी हूबहू चलने लगता है. हैरान जनता कभी अपने वोट को कोसती है, कभी नेताओं को.

तो हमने आजाद भारत में विकास के सत्तर साल बाद मानवीय मूल्यों का क्या विकास किया. हमारी राजनीति ने किन मानकों को अपनाया और नैतिकताओं को स्थापित किया. बीते साल—दो साल, महीने—दो महीनों में गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट, दिल्ली में दंगों और अब मध्यप्रदेश में सत्ता के खेल और नेताओं के दल—बदल को एक बच्चे के नजरिए से देखा जाए तो सोचिए कि भारतीय राजनीति के लिए और जननेताओं के लिए उसके मन में क्या छवि बन रही होगी, क्या आज कोई दावे के साथ इस बात को कह सकता है कि आने वाली पीढ़ी उनके बारे में, उनके काम के बारे में अच्छा नजरिया बना रही होगी.
आज जब हम इन बच्चों से बात करते हैं तो वह उसे हेय दृष्टि से देखते हैं. वह अखबार में पढ़ते हैं तो सवाल करते हैं कि यह क्या हो रहा है ? वह देखते हैं कि इस स्वतंत्र देश में भी हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधि कहीं होटलों में बंद हैं. वह इस बात को भी बहुत बारीकी से देखते हैं कि जो नेता कल तक किसी नेता की बुराई करता था, वह आज उसी के साथ खड़ा है, और बुराई सुनने वाला भी उसे अपनों में शामिल कर लेता है, क्यों. और हमसे जवाब देते नहीं बनता.


परिवारों में भी इससे दूर रहने की, उस पर ध्यान न देने की ताकीद दी जाती है, क्या इससे एक स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना हो पाएगी, वह आगे बढ़ पाएगा, और क्या वास्तव में इससे राजनीतिज्ञों की प्रतिष्ठा भी स्थापित हो पाएगी, और यह केवल एक दल की, एक राजनीतिज्ञ की बात नहीं है. हम इस बात को बखूबी जानते हैं कि हमारा लोकतंत्र आदर्श लोकनेताओं से ही आगे बढ़ सकता है. ऐसे आदर्श स्थापित करने वाले नेताओं की इस वक्त बेहद जरूरत है, जो संविधान के मूल्यों को समाज में खड़ा कर सकें, उसके लिए वास्तवित संघर्ष कर सकें, लेकिन अभी जो कुछ भी समाज में चल रहा है, उससे यह बहुत दूर का ढोल लगता है.
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First published: March 13, 2020, 5:24 PM IST
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