प्रवासी की बात: ऐसा लग रहा है कि दुनिया में अब हमारा कोई नहीं!

मनीराम को चिंता है कि ‘आगे अब कैसे हमारा घर चलेगा? यह सोच कर नींद भी नहीं आती. अब हम लोगों का क्या होगा? गांव में काम नहीं मिलता और अगर मिल भी जाए तो समय पर मजदूरी नहीं. अब घर में आए दिन लड़ाई होने लगी है. बच्चे कुछ मांगते हैं तो उनकी जरूरतें पूरी नहीं कर पाते.

Source: News18Hindi Last updated on: June 7, 2020, 10:14 AM IST
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प्रवासी की बात: ऐसा लग रहा है कि दुनिया में अब हमारा कोई नहीं!
ये पीड़ा है मध्यप्रदेश के निवाड़ी जिले में रहने वाले मनीराम अहिरवार की
‘हमारे गांव में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं हुआ और न ही हमें कोई समस्या हुई, इस बार जब हम आए तो पहली बार गांव के सभी लोगों ने हमें हेय दृष्टि से देखा, किसी ने भी हमसे बात नहीं की. लोग कहते हैं कि बीमारी लेकर आए हो कहीं निकलना मत, यह सुनकर हम अकेले में रो लेते हैं. एक बार तो मन में आया कि अब यहां रह नहीं पाएंगे. हम खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि अब हमारा कोई इस दुनिया में है ही नहीं.’

यह पीड़ा है मनीराम अहिरवार की. वह मध्यप्रदेश के निवाड़ी जिले के प्रवासी मजदूर हैं. वैसे वह हर साल ही पलायन पर जाते हैं, लेकिन इस साल जब कोविड-19 के चलते वह गांव वापस आए तो उन्हें बहिष्कार का सामना करना पड़ा. मनीराम मध्यप्रदेश के निवाड़ी जिले की ग्राम पंचायत टीला के निवासी हैं. उनके तीन बच्चे हैं, शिवानी सोनम और पंकज. वह पत्नी पूनम के साथ काम करने कापासेड़ा बॉर्डर हरियाणा गए थे. बच्चे घर ही छोड़ गए.

मनीराम ने बताया कि ‘हम लॉकडाउन में फंस गए. खुलने की तारीख बढ़ती जा रही थीं. ऐसे में हमने वापस जाने का सोचा. कृपालु नामक ठेकेदार से जब हमने 22, 000 रुपए मजदूरी मांगी तो उसने कहा कि ‘हमारे पास पैसे नहीं हैं. जाना हो तो जाओ. हमने तुम्हारा ठेका थोड़ी न ले रखा है. जब हमें पैसे मिल जाएंगे तो हम आप लोगों के पैसे दे देंगे.‘ परिस्थितियां मनीराम को वापसी के लिए मजबूर कर रही थीं, घर पर बच्चों की चिंता हो रही थी.

मनीराम ने बताया कि ‘हमारे पास 900 रुपए भर बचे थे. उसे ही लेकर चल पड़े. परवल तक 60 किलोमीटर पैदल चले, मन में डर था कि कोई अनहोनी न हो जाए. फिर एक ट्रेक्टर मिला जिसने 15 किलोमीटर बाद रास्ते में छोड़ दिया. फिर एक ट्रक मिला उसमें चार सौ रुपए लेकर हम दोनों ग्वालियर तक आए. ग्वालियर से डबरा तक दूसरा ट्रक मिला. दो दिन से हमें कुछ खाने-पीने को नहीं मिला. हमारे पास पैसे भी नहीं बचे थे कि हम लोग कुछ खा पी सकें. मन में यह डर था कि कहीं हम लोग भूख से न मर जाएं.‘
गांव पहुंचे, कर्ज लिया 

गांव पहुंचे तो जांच की गई. 14 दिन के लिए हमें घर में रहने को कहा गया. मजदूरी की इजाजत भी नहीं. हमें 25 किलो सरकारी राशन मिला, जबकि हर महीने 60 किलो राशन लगता है. गांव में मजदूरी पर रखता नहीं, जिससे खाने-पीने की समस्या हो गई. हमने गांव के एक व्यक्ति से 10,000 रुपए कर्ज लिया जिसे भारी ब्याज सहित चुकाना पड़ेगा.

आगे अब कैसे हमारा घर चलेगा?मनीराम को चिंता है कि ‘आगे अब कैसे हमारा घर चलेगा? यह सोच कर नींद भी नहीं आती. अब हम लोगों का क्या होगा?  गांव में काम नहीं मिलता और अगर मिल भी जाए तो समय पर मजदूरी नहीं. अब घर में आए दिन लड़ाई होने लगी है. बच्चे कुछ मांगते हैं तो उनकी जरूरतें पूरी नहीं कर पाते. हमारी पत्नी हम और हमारे बच्चे चिड़चिड़े होते जा रहे हैं. बात-बात पर कहासुनी होने लगती है. जो कि पहले कभी नहीं होती थी.‘

पलायन पर नहीं जाएंगे

मनीराम बताते हैं कि फिलहाल तो वह पलायन पर नहीं जाएंगे क्योंकि बीमारी का खतरा है और गए तो बचेंगे यह भी निश्चित नहीं है. यदि यहीं आसपास कुछ काम मिलता है तो हम काम करेंगे फिर जैसा भी होगा देखा जाएगा. जो भी कर्ज लिया था उससे 20 दिन का राशन ले आए. इसके बाद फिर कर्ज लेना पड़ेगा तभी हम अपने बच्चों को बचा पाएंगे नहीं तो बच्चे भूखे मरने की स्थिति में आ जाएंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

( कोविड ने प्रवासी मजदूरों की जिंदगी में दोहरा संघर्ष पैदा कर दिया है. शहर से निकलकर गांव तो पहुंच गए, लेकिन मुश्किलें अभी थमी नहीं हैं. सरकार से राहत मिली है, पर अभी और राहत की जरूरत है. भारत के ऐसे ही मजबूर इंसानों की कहानी पढ़िए इस सीरीज में.)
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First published: June 7, 2020, 5:48 AM IST
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