MP Budget 2022: बेरोजगारों को क्या मिला?

Madhya Pradesh Budget 2022: मध्यप्रदेश विधानसभा में पक्ष और विपक्ष की रार पर जनता को यह फायदा जरूर मिला कि कोई नया कर नहीं लगा और कोविड-19 के असर का रोना भी नहीं रोया गया.

Source: News18Hindi Last updated on: March 10, 2022, 2:51 pm IST
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MP Budget 2022: बेरोजगारों को क्या मिला?
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विधानसभा में जवाब देते हुए. (PTI)

मध्यप्रदेश विधानसभा में 9 मार्च को बजट पेश करने के दौरान अजब हाल था. वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा अपने बजट भाषण में कई मानकों पर प्रदेश के विकास को संपूर्ण देश के विकास से ज्यादा बता रहे थे वहीं पूरा विपक्ष बजट पेश करने के दौरान भरपूर हल्ला मचाए थे. कांग्रेस यह लगभग तय करके आई थी कि बजट पेश करने के दौरान हंगामा करना ही है और पक्ष ने भी यह ठान कर ही बैठा था कि कितना ही हल्ला मचा लो, बजट पेश होना ही है.


मध्यप्रदेश विधानसभा में पक्ष और विपक्ष की रार पर जनता को यह फायदा जरूर मिला कि कोई नया कर नहीं लगा और कोविड-19 के असर का रोना भी नहीं रोया गया. हालांकि महंगाई से त्रस्त और देश में तकरीबन सबसे महंगे पेट्रोल पदार्थ खरीद रही जनता यह भली भांति समझ गई कि यह बजट अगले साल होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए लोकलुभावन बनाया गया है. लेकिन सबसे जरूरी और अहम मुद्दा रोजगार का जिक्र तो बजट में आया, पर सचमुच युवाओं के हिस्से में रोजगार की रोशनी आई?


पूरे देश की तरह ही मध्यप्रदेश में रोजगार की हालत बहुत ज्यादा खराब है. देवड़ा ने अपने बजट भाषण में इसका जिक्र भी उतना ही किया जितना कि लगे सरकार रोजगार को लेकर गंभीर है. सरकार ने जिस तरह से एक दिन पहले पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण में रोजगार के हालात को चिंताजनक बताया है, उससे निपटने के लिए कोई खास बंदोबस्त नहीं हो पाया है.


मप्र में इस वक्त तकरीबन तीस लाख बेरोजगार युवा नौकरी की तलाश में हैं. इनमें से तकरीबन साढ़े पांच लाख युवा पिछले एक साल में बढ़ गए हैं. यह आंकड़ा उन बेरोजगार शिक्षित युवाओं का है, जिन्होंने अपना पंजीयन करवाया हुआ है. केन्द्र सरकार के ई श्रम पोर्टल की मानें तो प्रदेश में रजिस्टर्ड बेरोजगारों की 1.30 करोड़ के आसपास जाकर ठहरती है. यह वे लोग हैं जिन्होंने किसी भी माध्यम से अपना पंजीयन करवाया हुआ है, लेकिन गैर पंजीयन वाले और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की हालत तो निश्चित तौर पर और ज्यादा खराब है.


वित्तमंत्री ने रोजगार के बारे में बात करते हुए कहा तो कि उन्हें प्रदेश के हर नागरिक को उनकी क्षमता के अनुरूप सहज, सुलभ अवसर उपलब्ध कराना है, लेकिन आगे जिन लक्ष्य तय किए गए हैं वे बेहद निराशा भरे हैं. वित्तमंत्री ने कहा कि अगले वित्तीय वर्ष में 13 हजार शिक्षकों और छह हजार आरक्षकों की भर्ती की जाएगी. यानी कुल 19 हजार. रोजगार के नाम पर गैर सरकारी निवेशकों को सरकार भारी रियायतें देती है, इससे अपेक्षा यह होती है कि वह लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाएंगी, लेकिन अगले वित्तीय वर्ष में जिन 381 परियोजनाओं में 21 हजार करोड़ के निवेश की बात की गई है वह कुल मिलाकर साठ हजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध करवाने वाली बात हैं. इस वक्त जबकि तीस लाख युवा बेरोजगार टकटकी लगाकर सरकार की ओर से कुछ बुनियादी करने की अपेक्षा रखते हैं तब रोजगार देने के आश्चवासन का आंकड़ा एक लाख भी पार नहीं कर पा रहा है.


पिछले साल मप्र सरकार ने अपने बजट को आत्मनिर्भर मप्र पर केन्द्रित रखा था और इसमें एक स्तंभ रोजगार को बताया था, विपक्ष को यह पूछना चाहिए था कि पिछले साल उसने जो वायदा किया था, उसका हुआ क्या ? आखिर कितना रोजगार प्रदेश के युवाओं को दिया गया है. पिछले साल भी सरकार ने 24 हजार 200 शिक्षकों की भर्ती करने की घोषणा अपने बजट भाषण में की थी, लेकिन इस साल बजट भाषण के ही मुताबिक नियुक्ति पत्र दिए गए केवल चार हजार के आसपास, इस साल तो उससे आधे की ही घोषणा करके हाथ झाड़ लिए हैं, जबकि प्रदेश के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है.

अगला साल भी नौकरी की लालसा रखने वाले युवा बेरोजगारों के लिए चुनौतीपूर्ण है, इस मुद्दे को अच्छे से सोचा—समझा जाता और बजट भाषण ठीक से सुनकर हंगामा किया जाता तो विपक्ष की अच्छी साख बन सकती थी, लेकिन वह तो सदन में पहले मिनट से बजट को खारिज किए जाने का मन बनाए बैठा था, इसलिए जनता की बात उठाते हुए भी युवाओं के मन में विपक्ष के लिए कितनी जगह बन पाई वह तो वही अच्छे से बता सकता है. होना यह चाहिए कि बजट पर लगातार बहस हो और गहराई से अध्ययन करके तथ्यात्मक स्थिति को सामने लाया जाए, लेकिन इतनी फुर्सत माननीयों के पास होती कहां है?


ग्रामीण क्षेत्रों के लिए और मजदूर वर्ग के लिए मनरेगा योजना हमेशा से उपयोगी रही है, लेकिन जाने क्यों उसे योजना को बजट में कभी तवज्जो नहीं दी जाती है. कोरोना काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए और ग्रामीण विकास के नजरिए से भी योजना का संचालन बहुत जरूरी है, आवश्यकता इस बात की है कि मजदूरों के नजरिए से इसके भुगतान में देरी होने या समय पर काम नहीं मिल पाने की दिक्कतों को दूर करना चाहिए. पंचायतों को सशक्त बनाया जाना चाहिए, लेकिन प्रदेश में पंचायतों के चुनाव ही नहीं हो पा रहे हैं, ऐसे में पंचायतें उत्साह से काम नहीं कर रही हैं. आवश्यक है कि गतिरोध को दूर करके उत्साही युवा जनप्रतिनिधियों को सामने लाया जाए जो योजनाओं को बेहतरी के साथ जमीन पर पहुंचा पाएं.


वैसे रोजगार देना भाषण देना जितना आसान नहीं है. जिस तरह के विकास के मॉडल को अपना लिया गया है, और तकनीक को बेहतर बनाकर खुद की क्षमता बढ़ाती मशीनें लोगों के हाथ का काम छीन रही हैं, उसमें कहां रातोंरात आंकड़े बेहतर हो जाएंगे.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: March 10, 2022, 2:51 pm IST