साबरमती आश्रम के ‘विकास’ का क्यों हो रहा है विरोध?

सरकार ने साबरमती आश्रम को पर्यटन स्थल के रूप में तब्दील करने के लिए एक योजना बनाई है, और इस पर 1200 करोड़ की भारी भरकम रकम खर्च होने का अनुमान है. हालांकि आश्रम के कायाकल्प का पूरा खाका सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह से जलियांवाला बाग का विकास किया गया है, और सेवाग्राम आश्रम के आसपास भी निर्माण कार्य कराए गए हैं, उसे देखते हुए लोग यह मांग कर रहे हैं कि साबरमती आश्रम और उसके आसपास के क्षेत्र को उसके मूल स्वरूप में ही रखा जाए.

Source: News18Hindi Last updated on: October 20, 2021, 12:10 PM IST
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साबरमती आश्रम के ‘विकास’ का क्यों हो रहा है विरोध?

बापू के सेवाग्राम से साबरमती तक की एक संदेश यात्रा शुरू हुई. इस यात्रा में पचास गांधी विचारों के अनुयायी शामिल हैं. इस यात्रा का मकसद है साबरमती आश्रम को उसके मूल स्वरूप में बचाए रखने का संदेश देना और  इस स्थान के एक तरह के आधुनिकीकरण को रोकना. हाल ही में सरकार ने साबरमती आश्रम को पर्यटन स्थल के रूप में तब्दील करने के लिए एक योजना बनाई है, और इस पर 1200 करोड़ की भारी भरकम रकम खर्च होने का अनुमान है.


हालांकि, आश्रम के कायाकल्प का पूरा खाका सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह से जलियांवाला बाग का विकास किया गया है, और सेवाग्राम आश्रम के आसपास भी निर्माण कार्य कराए गए हैं, उसे देखते हुए लोग यह मांग कर रहे हैं कि साबरमती आश्रम और उसके आसपास के क्षेत्र को उसके मूल स्वरूप में ही रखा जाए.


गुजरात के अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे स्थित है उस भारतीय व्यक्तित्व का आश्रम जिसे दुनिया भर में महात्मा के नाम से जाना जाता है. जो पूरी दुनिया के लिए अब भी अंधेरे में एक रोशनी है. जिसके सत्य और अहिंसा के प्रयोग आज भी कारगर हैं, बल्कि और अधिक प्रासंगिक हैं. जिस प्रयोगशाला में महात्मा ने इन प्रयोगों को अंजाम दिया है, उसके मूल स्वरूप को बचाए रखना हम सभी के जिम्मेदारी है.


महात्मा जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्होंने साबरमती के इसी आश्रम को अपना ठिकाना बनाया था, और दांडी यात्रा के पहले तक वही उनकी राजधानी रही. आश्रम के लिए इस जगह का चुनाव दिलचस्प इसलिए है, क्योंकि साबरमती आश्रम के एक ओर जेल है और दूसरी ओर श्मशान घाट है. और बापू ने कहा भी कि एक सत्याग्रही के दो ही ठिकाने होना चाहिए, सत्याग्रह करते हुए जेल जाना या लड़ते हुए शहादत पाना.

इसके बाद, आखिरी समय तक महाराष्ट्र के सेवाग्राम को अपनी मुख्य कार्यस्थली बनाए रखा. यह वह दो स्थान हैं जहां पर गांधी ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिताया, रचनात्मक कार्य किए. साबरमती और सेवाग्राम आजादी के संघर्ष के साक्षी हैं.


अब सवाल इस बात का है कि बीते सौ सालों से साबरमती आश्रम हर भारतीय व्यक्ति की आस्था का केंद्र है, जो आजादी की लड़ाई का ऐतिहासिक स्मारक है, क्या उसे एक विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में तब्दील कर दिया जाएगा या उस पूरे स्थान को उसके मूल स्वरूप में ही रहना चाहिए.


जाहिर सी बात है कि जब 1200 करोड़ रुपए की रकम से इस आश्रम का विकास होगा और इस पूरे विकास का मतलब यदि ठीक उसी तरह हुआ जैसा कि हम बाकी स्थानों के बारे में देखते हैं, तो निश्चित रूप से गांधीवादियों की चिंता जायज है. कोई भी ऐतिहासिक महत्व के स्थान पर उतनी ही न्यूनतम सुविधाएं ठीक लगती हैं, जहां पर कोई व्यक्ति न्यूनतम इंतजामों में रह सके.

जिस गांधी ने अपना पूरा जीवन सादगीपूर्ण जिया हो, और श्रम की गरिमा को स्थापित किया हो, वहां पर कोई भी व्यक्ति फाइव स्टार सुविधाओं जैसी मानसिकता के साथ नहीं जाता. यहां तक कि सेवाग्राम आश्रम में भी कई सुविधाभोगी लोगों को भी आश्रम के अंदर खाना खाने के बाद अपने बर्तन खुद राख से धोते हुए अब भी देखा जा सकता है. इस प्रक्रिया से गुजरने के दौरान किसी के माथे पर शिकन भी नहीं आती है.


यह काम वहां एक विचार के साथ किया जाता है. लेकिन इन ऐतिहासिक महत्त्व के स्थानों को यदि उसे गोवा या शिमला की तरह के पर्यटन स्थलों की कतार में खड़ा कर दिया जाएगा तो यह गांधी बाबा की विरासत के साथ अन्याय होगा, उनके विचारों से यह मेल नहीं खाएगा, क्या इस बात की गारंटी होगी कि उन महंगी इमारतों में मांस और शराब नहीं परोसी जाएगी ?


गांधी ने सेवाग्राम आश्रम में अपनी कुटी बनवाते हुए यह शर्त रखी थी कि उसमें सौ से एक भी ज्यादा रुपया खर्च नहीं होना चाहिए, साथ ही उसके उपयोग के लिए जो भी सामग्री का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, वह सामग्री भी सेगांव के आसपास के क्षेत्र से ही ली जानी चाहिए. यह गांधी की सादगी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है. यदि वह आज जीवित होते तो क्या किसी 1200 करोड़ रुपए की भारी भरकम लागत वाली ऐसी परियोजना को मंजूरी देते.

वह भी तब जब देश कोविड जैसी त्रासदी को भुगत रहा हो और यह घोषित नहीं किया गया हो कि कोविड महामारी देश और दुनिया से समाप्त हो चुकी है. जिस देश ने अस्पतालों में आधारभूत सुविधाओं की भारी कमी झेली हो, हजारों लोग पर्याप्त इलाज और आक्सीजन नहीं मिलने के कारण असमय ही मौत के आगोश में चले गए हों, उस देश में संसाधनों के इस्तेमाल की प्राथमिकता तय की जानी चाहिए.


दो चार साल देश में पर्यटन स्थल या ऐसी इमारतें या ऐसा विकास नहीं होगा तो उससे बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला है, लेकिन यदि तीसरी लहर आई और हालात दूसरी लहर जैसे ही रहे तो इस देश में विकास की प्राथमिकताओं पर कई सवाल उठाए जाते रहेंगे.



(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: October 20, 2021, 12:10 PM IST
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