मन की बात और दोगुनी आय का सपना

यह बात बिलकुल सही है कि अपनी आय को बढ़ाने के लिए नवाचार करने की जरूरत होगी, यह तीन किसान ही नहीं, देश के जिस भी इलाके में उत्साही, जागरूक और आर्थिक रूप से क्षमतावान किसानों ने कुछ अलग किया है, वह सफल हुए हैं, लेकिन देश के सभी किसानों के लिए सरकार की सहायता, बेहतरीन योजनाओं और उनके उचित जमीनी क्रियान्वयन के बिना नहीं हो सकता है.

Source: News18Hindi Last updated on: November 30, 2020, 1:03 PM IST
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मन की बात और दोगुनी आय का सपना
मन की बात कार्यक्रम में पीएम मोदी ने किसानों पर की चर्चा.
‘मन की बात’ में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन किसानों के काम की मिसाल पेश की जिनमें महाराष्ट्र के धुले ज़िले के किसान जितेन्द्र भोइजी ने नए कृषि कानून के प्रकाश में मक्का की फसल का अटका भुगतान प्राप्त कर लिया, जानकारी को हथियार बनाया.

राजस्थान के बारां जिले के दूसरे किसान मोहम्मद असलम ने एक उत्पादक संघ बनाया. वह उस संघ के सीईओ हैं. व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से किसानों को आपस में कनेक्ट करके फसलों की जानकारी देने की प्रक्रिया चलाकर किसानों को फायदा पहुंचाया है. उनका खुद का एफपीओ भी किसानों से फसल खरीदता है. तीसरा उदाहरण एक और किसान हरियाणा के वीरेन्द्र कैथल का दिया, जिन्होंने आस्ट्रेलिया से लौटकर पराली से गठठे बेचकर डेढ़ करोड़ का व्यापार किया और उससे उन्हें पचास लाख का फायदा ही हुआ. पर्यावरण का नुकसान होने से भी बचा.

इनमें पहले को छोड़ दें तो दूसरा और तीसरा किसान वैसा नहीं है जिसकी तस्वीर हमारे जेहन में सबसे पहले आती है. यह वह ‘बदहाल किसान’ नहीं है जिनकी आय बढ़ाने के लिए 2016 में दोगुनी आय करने किए जाने का भरोसा देना पड़ा था. हम जब दोगुनी आय के बारे में सुनते हैं तो हमें सबसे पहले गांव का सबसे गरीब, मजबूर और आत्महत्या के जोखिम तक पहुंच जाने वाला किसान याद आता है. प्रधानमंत्री की मन की बात को सुनते हुए पिछले सत्तर साल से निराश जिन भारत के लाखों गरीब और मध्यवर्गीय किसानों ने अपनी तुलना की होगी तो पता नहीं अपने को कितना संतुष्ट पाया होगा! अपने लिए ख्वाब माना होगा या हकीकत? पर इतना तो तय है कि इस स्तर पर आने के लिए उन्हें एक लंबा संघर्ष तय करना पड़ेगा.

यह भी तय बात है कि यदि देश के सभी किसान इन तीन किसानों के स्तर तक जिस दिन पहुंच जाएंगे देश में रोजी—रोटी की तमाम समस्याएं ही दूर हो जाएंगी, परंतु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है. देश में किसान और किसानी की हालत बदहाल है और नए कृषि कानूनों को लेकर तो किसानों का एक धड़ा आशंकित हो सड़कों पर उतर ही गया है, जिस पर किसान होने या नहीं होने की बड़ी बहस चल रही है.
एक सप्ताह पहले मैं कृषि प्रधान देश के एक कृषि प्रधान गांव में किसानों से बात कर रहा था. मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के बनखेड़ी नाम का यह गांव कृषि विज्ञान केन्द्र के नजदीक है. कृषि विज्ञान केन्द्र ने इस गांव को ‘डबलिंग फार्मर्स इंकम विलेज’ के लिए एक मॉडल के रूप में चुना है, गांव के कुछ किसानों को यहां पर उनकी आय दोगुनी करने के लिए मार्गदर्शन दिया जा रहा है. मेरी रुचि इस बात को जानने में थी कि उनको अगले दो साल में दोगुनी आय होने का कितना भरोसा है?

यहां किसानों से बात करते हुए मेरी एक ही जिज्ञासा थी कि क्या उन्हें इस बात पर कितना भरोसा है कि 2022 तक उनकी आय दोगुनी हो जाएगी और यदि हां तो उसका क्या तरीका होगा? किसानों ने कहा कि ‘पिछले कुछ सालों में उत्पादन में तो जरूरी बढ़ोत्तरी हुई है. पहले से लगभग दोगुना उत्पादन होने लगा है, लेकिन उसी अनुपात में लागत भी बढ़ी है. इसलिए लाभ का आंकड़ा तो वहीं का वहीं है!’ सरपंच कल्याण सिंह लोधी ने तो खुद को पेवर बीजेपी कार्यकर्ता बताया फिर कहा कि ‘हमें सम्मान निधि के छह हजार रुपए मिले, बहुत अच्छा लगा. पर डीजल के दाम भी बढ़ा दिए. बात तो बराबर हो गई. एक हाथ से दिया दूसरे से वापस ले भी लिया.’ उन्हें आय दोगुनी होने का भरोसा नहीं है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के प्रति उनकी राजनैतिक आस्था वैसी ही बरकरार है. सवाल यह है कि पार्टी के प्रति ऐसे आस्थावान किसान भी क्या इस नारे को हकीकत में बदलते देखेंगे या नहीं ?

बात तो यह है कि बहुत सामान्य बुद्धि और क्षमता वाले किसानों के मन में तो एक ही बात आती है कि जब तक उन्हें फसल का सही दाम नहीं मिल जाता और खाद, बीज और डीजल के दाम में घटौती नहीं होती तब तक उनकी आय दोगुनी नहीं हो सकती. अलबत्ता वह यह जरूर देखते हैं कि उनके आसपास का व्यापारी जरूर हमेशा फायदे में रहता है, उसे कभी घाटा नहीं होता. यह सारे वे किसान हैं जिनके पास एक दो एकड़ से लेकर आठ नौ तक एकड़ की जमीन है.
यदि इसी गांव में चालीस पचास एकड़ जोत वाले किसान से बात करें तो हो सकता है वह भी अपनी खेती को लाभकारी बताए क्योंकि उसके पास एक निश्चित पूंजी है और पूंजी की दम पर वह दस तरह के और भी काम कर सकता है. इसी गांव में आस्ट्रेलिया से लौटने वाला भी कोई युवा नवाचार करके लाखों कमा सकता है, लेकिन जिस किसान के पास पूंजी का संकट हो, जिस किसान के पास अपनी फसल को उचित दाम मिलने तक रोके रखने की क्षमता नहीं हो, जिस किसान के पास दूसरी मंडियों तक अपना अनाज ले आने और ले जाने की क्षमता नहीं हो, जिस किसान के पास अपना कर्ज तुरंत पटाने की मजबूरी हो, जिस किसान के पास अगली फसल के इंतजाम के लिए तुरंत ही उपज बेचकर व्यवस्था करने की मजबूरी हो, जो किसान साल दर साल मौसम की मार खाता हो, जिस किसान के पास अपनी फसल को उचित दाम मिलने तक के लिए भंडारण क्षमता नहीं हो, उन किसानों के लिए यह उदाहरण किसी दूसरी दुनिया के उदाहरण है.

यह बात बिलकुल सही है कि अपनी आय को बढ़ाने के लिए नवाचार करने की जरुरत होगी, यह तीन किसान ही नहीं, देश के जिस भी इलाके में उत्साही, जागरुक और आर्थिक रूप से क्षमतावान किसानों ने कुछ अलग किया है, वह सफल हुए हैं, लेकिन देश के सभी किसानों के लिए सरकार की सहायता, बेहतरीन योजनाओं और उनके उचित जमीनी क्रियान्वयन के बिना नहीं हो सकता है. उसके लिए उन खाईयों को पाटने की जरुरत होगी जो अब भी कई दशकों की तरह भारतीय सिस्टम में जमे बैठे हैं. यदि कृषि विज्ञान केन्द्र को बिना बजट के किसानों की आय को दोगुनी करने का लक्ष्य दे दिया जाएगा तो वह केवल आदेश का पालन करेगा, मिशन मोड में तो जा ही नहीं पाएगा. कृषि की ज्यादातर योजनाओं का लाभ भी गांव के संपन्न और बड़े किसानों को ही सबसे पहले मिल रहे हैं, यह किसी भी गांव में जाकर देखा जा सकता है. ऐसे में गांव के उन सबसे छोटे, मझोले किसानों और किराये पर खेती लेकर करने वाले किसानों के लिए भी दोगुनी आय की राह कठिन बनी हुई है. उनका भरोसा तभी बन पाएगा जबकि उनके बीच के ऐसे उदाहरण मन की बात में जगह बना पाएंगे.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: November 30, 2020, 1:03 PM IST
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