प्रवासी की बात: बिन मां-बाप के त्रासदी झेलते बच्चे

यह कहानी मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) के पन्ना (Panna) जिले के कल्याण पुर गांव की है. यहां 221 परिवारों में 936 लोग रहते हैं. गांव में 80 फीसदी लोग हीरा व पत्थर की खदानों मे काम करने वाले मजदूर हैं. 20 प्रतिशत लोग लोग कृषि और पशु पालन में अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं. महिलाएं खदानों में काम करने के साथ साथ जलाउ लकड़ी भी बेचा करती हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: July 4, 2020, 2:51 PM IST
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प्रवासी की बात: बिन मां-बाप के त्रासदी झेलते बच्चे
मध्यप्रदेश स्थित पन्ना के कल्याणपुर गांव निवासी नरेंद्र और उसके भाई बहन
यह कहानी मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) के पन्ना (Panna) जिले के कल्याणपुर गांव की है. यहां 221 परिवारों में 936 लोग रहते हैं. गांव में 80 फीसदी लोग हीरा व पत्थर की खदानों मे काम करने वाले मजदूर हैं. 20 प्रतिशत लोग लोग कृषि और पशु पालन में अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं. महिलाएं खदानों में काम करने के साथ-साथ जलाउ लकड़ी भी बेचा करती हैं.

इस गांव में पहले 3 परिवार ही रहते थे. पंचम सिंह यादव का परिवार जो गांव के मुखिया हैं, मजबूत सिंह यादव और तीसरे संतोष आदिवासी का परिवार झोपड़ी बना कर रहते थे. इसलिए इनके मोहल्ला का नाम मड़ैयन कहा जाता है. बाकी के परिवार किसी अन्य गांव से आए. गांव के जितेंद्र यादव और संतोष गोंड कहते हैं इस प्रकार की बीमारी पहले भी आई थी, जिसे हम लोग हुलकी कहते थे. तब गांव में 3 ही परिवार बचे थे, बाकी के घरों में ताले (टटोवा) लग गए थे.

खदान बंद हुई और पलायन बढ़ गया...
इस कहानी को लिखते समय गांव से 22 परिवार पलायन पर थे. जिनमें 15 ऐसे परिवार हैं जो अधिकतर पलायन में रहते हैं. 25 परिवार के युवा जाते-आते रहते हैं. जब से पत्थर की खदान बंद हुई तब से पलायन बढ़ गया है. पहले 5 या 6 परिवार ही पलायन करते थे.
इसी गांव के निवासी हैं नरेंद्र गोंड. उम्र की परिभाषाओं में बात करेंगे तो वह अभी बच्चे हैं. उनकी उम्र महज 15 साल है, लेकिन जिंदगी की क्रूरताओं ने उनका बचपन छीनकर हाथों में काम पकड़ा दिया.


नरेंद्र ने बताया कि हमारे पिता सुरेन्द्र गोंड की तबीयत हमेशा से खराब रहती थी. मेरी मां (भारत बाई) अकेले काम करती रहती थी, इसीलिए पांचवी के बाद पढ़ाई छोड़ दी और अपनी मां के साथ काम करने लगा. मैं और मां दोनों हीरा खदानों मे काम करने जाया करते थे, मां चाल मचाती और मैं पानी ढोता रहता था.

नरेंद्र ने कहा कि पिता जी की मृत्यु के बाद 1 साल तक हमने छोटे-भाई बहनों को पिता जी की कमी महसूस नहीं होने दी. इसके बाद मां ने भी काम करना बंद कर दिया और हम सभी को छोड़ कर रिश्तेदारों के यहां कई दिनों तक रहती थी. फिर एक दिन हम सब को छोड़ कर चली गई. दूसरे गांव में किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने लगी. तब मेरे छोटे भाई बहनों को लगने लगा कि हमारा कोई नहीं है. मैं गांव वालों के खेतों और हीरा खदानों में बहुत ज्यादा काम करने लगा ताकि मेरे छोटे भाई बहन भूखे न रहे. लॉकडाउन में खाने की बहुत दिक्कत हो रही थी, कभी हमारे दादा जी 2 वक्त का खाना दे जाते, तो कभी पिता जी के चाचा (महेश गोंड) आटा और चावल दे जाते, और नमक के लिए तो कोई मना नहीं करता.नरेंद्र बहुत संघर्षशील है जिसने बचपन में अपने पिता की बीमारी के लिए पढ़ाई छोड़ दी और पिता की मृत्यु के बाद भाई बहन की अच्छे से देखरेख की. मां के जाने के बाद अपने भाई-बहनों के लिए मां बाप का फर्ज निभाया.

जब मैं काम करता था तो अच्छा परिवार चलता था...
नरेन्द्र ने बताया कि बीमारी फैलती है, मुंह में कपड़ा बांधने से यह नहीं फैलती हैं जिन्हें हो जाती है उन्हें स्कूल में बंद कर दिया जाता है. हमारे गांव में 3 लोगों को बंद कर दिया था. उनसे किसी को भी मिलने नहीं दिया जाता.

कहा कि जब मैं काम करता था तो अच्छा परिवार चलता था. मुझे 230 रुपए मिलता था. लॉकडाउन में तो हमें बहुत ज्यादा परेशानी हुई. नरेन्द्र बताते हैं कि भाई बहनों में सबसे बड़ा हूं इसलिए काम करना पड़ता है. बंद के कारण गांव वालों को अपने परिवार के पालन पोषण करने में बहुत परेशानी आई, अब हम उम्मीद करते हैं कि जल्दी ही सब कुछ ठीक हो जाएगा.

नरेन्द्र को सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी PDS का फायदा का भी केवल दुकान संचालक की मेहरबानी से मिल सका. नरेन्द्र का राशन कार्ड आधार कार्ड से लिंक नहीं हो पाया है, इस वजह से उन्हें इस योजना का लाभ मिलना मुश्किल हो रहा था.


लॉकडाउन में जब पीडीएस दुकान संचालक मनोज यादव ने नरेन्द्र की तकलीफ देखी तो उन्होंने अपनी आईडी से उन्हें तीन महीने का राशन उपलब्ध करवा दिया पर यह हमेशा नहीं हो सकता. यदि जुलाई माह तक आधार कार्ड से इसे नहीं जोड़ा गया तो उनका नाम राशन की पात्रता से ही हट जाएगा. ऐसे में नरेन्द्र और उसके भाई बहनों को खासी दिक्कत होगी. हालांकि उन्हें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत मिलने वाला अतिरिक्त राशन नहीं मिला है. पन्ना जिले में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता रवि पाठक इसके लिए कोशिश कर रहे हैं.

नरेन्द्र ने बताया कि हमारी छोटी बहन को मिड डे मील की जगह गेहूं जरूर मिले, क्योंकि वह स्कूल जाती है, इसके अलावा उन्हें कोई और सहायता नहीं मिली.

(कोविड-19 ने प्रवासी मजदूरों की जिंदगी में दोहरा संघर्ष पैदा कर दिया है. शहर से निकलकर गांव तो पहुंच गए, लेकिन मुश्किलें अभी थमी नहीं हैं. सरकार से राहत मिली है, पर अभी और राहत की जरूरत है. भारत के ऐसे ही मजबूर इंसानों की कहानी पढ़िए इस सीरीज में.)
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First published: July 4, 2020, 2:45 PM IST
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