शहरों सोच लो, तुम्हारे लिए पसीना बहाने कौन वापस आएगा?

अध्ययन में 81% प्रवासी मजदूरों ने बताया कि उन्हें किसी भी किस्म का अवकाश या छुट्टी नहीं मिलती है. जिस दिन वे काम पर नहीं जा पाते हैं, उस दिन उन्हें मजदूरी की राशि का घाटा होता है.

Source: News18Hindi Last updated on: May 27, 2020, 5:00 PM IST
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शहरों सोच लो, तुम्हारे लिए पसीना बहाने कौन वापस आएगा?
यह आज से तो नहीं कहा जा रहा कि देश में भयंकर पलायन है.
अच्छी बात है कि सड़क पर मीलों पैदल चल रहे प्रवासी मजदूर (Migrant workers) सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) को नजर आए. सर्वोच्च न्यायालय उनके लिए देर से ही सही, पर फिक्रमंद हुआ, स्वत: संज्ञान लेते हुए उसने संबंधित सरकारों की ओर से मुहैया कराई गई सेवाओं को अपर्याप्त माना है और जरूरी सेवाएं पूरी करने के लिए आदेश दिए हैं.

इस आदेश में सोशल मीडिया (Social media) पर तमाम सरकारों सबसे बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाने के दावे भी हवा में उड़ गए हैं. यही नहीं, इस मामले में केन्द्र और राज्य सरकारों को 28 मई तक जवाब पेश करने को भी कहा है. यही निर्देश पंद्रह से बीस रोज पहले दे दिया होता तो संभव था कि इतने वीभत्स दृश्य और राहत के नाम पर गंदी राजनीति हम नहीं देखते! खैर इसको भी देर आए दुरुस्त आए का मुहावरा याद करके स्वागत कर लेना चाहिए, और उम्मीद करनी चाहिए कि मजदूरों की सड़क पर से गुजर जाने के बाद अब अपने गांव पहुंचने पर भी क्या परिस्थितियां हैं. समस्या केवल दो-चार रोज की तो नहीं है, अभी एक लंबा वक्त चुनौती में गुजारना है. समाज अपने तरीके से लड़ ही रहा है, स्वैच्छिक गैर राजनीतिक, सामाजिक संगठन और संस्थाएं चुपचाप अपने-अपने तरीके से राहत कार्यों में लगी ही हैं, लेकिन लोकतंत्र में नीति और योजनागत निर्माण की मुख्य जिम्मेदारी तो सरकारों की ही है.

इसके लिए उन्हें ही नई चुनौतियों के लिए आगे आना होगा. पर उसके लिए ठीक-ठीक पता होना करना पड़ेगा कि मौजूदा दौर की चुनौतियां क्या हैं. प्रशासन का पूरा फोकस कोविड नियंत्रण और रोकथाम में है, लेकिन इस तबके की आजीविका की चुनौतियां भी कोविड जितनी ही गंभीर हैं. यह कोविड के संक्रमण काल ही नहीं उससे पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं का एक परिणाम है.

पलायन की स्थिति गम्भीर
यह आज से तो नहीं कहा जा रहा कि देश में भयंकर पलायन है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत के 17 बड़े राज्यों में एक अकेले मध्यप्रदेश के 30.29 लाख लोग पलायन करके गए थे. इनमें से 10.18 लाख पुरुष और 20.11 लाख महिलाएं थी. तकरीबन हर राज्य में पलायन की स्थितियां गंभीर हैं. स्थानीय स्तर पर रोजगार की उपलब्धता और योजनाओं के ढुलमुल क्रियान्वयन में ऐसी तस्वीरें हर साल आती हैं, इस साल हमने कुछ ज्यादा देखीं, एक साथ देखीं.

54.5% मजदूर अकेले पलायन पर
बहरहाल प्रवासी मजदूरों के संकटों पर मध्यप्रदेश के दस जिलों में एक त्वरित सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की है. विकास संवाद और गैर सरकारी संस्थाओं की यह रिपोर्ट प्रवासी मजदूरों की परिस्थितियों का एक आइना दिखा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक 45.5% मजदूर परिवार के साथ और 54.5% अकेले पलायन पर गए थे. यानी जो लोग मजदूरों को शहरों में ही ठहरने के लिए दोषी बता रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि आधे से ज्यादा मजदूरों के पीछे घरों में बच्चे हैं, बूढ़े मां बाप हैं, पत्नी हैं, इन सभी तक रुपए पहुंचाना, उनके खाने-पीने का बंदोबस्त करना यह सब उनके माथे होता है. गांव से जब भोजन और अन्य व्यवस्थाएं न होने के फोन आते होंगे, तो उनके पास क्या जवाब होता होगा. यही बड़ी वजह रही कि कुछ दिन तो उन्होंने सब्र से काम लिया फिर वह लंबी दूरी तक चल पड़े.इनके लिए डिजिटल भारत अभी बहुत दूर
जिस डिजिटल भारत को बनाने का सपना हम देख रहे हैं, उसमें प्रवासी मजदूरों की भागीदारी अभी दूर है. उनका लेन-देन अब भी नगदी में हो रहा है, इसलिए वह डिजिटल पॉवर से लैस लोगों की तरह एक क्लिक से अपने घर पैसा नहीं भेज सकते. रिपोर्ट बताती है कि 85.8% प्रवासी मजदूरों को नकद भुगतान किया जाता है, इसलिए इसका कोई वैधानिक प्रमाण नहीं होता है. 93.2% मजदूर/कामगारों को नियुक्ति या अनुबंध पत्र नहीं दिया गया. इससे उनके कोई कानूनी अधिकार तय नहीं होते है ये सारी अवस्थाएं उनको एक अनिश्चित भविष्य देती हैं, इसलिए जब तक काम चलता है, तब तक वे वहां रहते हैं, उनका मन तो अपने घर में ही लगा रहता है. डिजिटल भारत में वे अपने गांव तक पैसा भी नहीं भेज पाते.

मजदूरी का पूरा भुगतान नहीं मिला
रिपोर्ट यह भी बताती है कि जिस समय मजदूर लौटो उनमें से 47 प्रतिशत मजदूरों को पूरा भुगतान नहीं मिला था. जब वे अपने घरों में वापस पहुंचे 23% मजदूरों के पास 100 रुपये से भी कम भी राशि शेष बची थी. 7% मजदूरों के पास वापस पहुंचने के वक्त 1 रुपये भी शेष नहीं थे. 25.2% मज़दूरों के पास 101 से 500 रुपए शेष बचे थे और 18.1% के पास 501 से 1000 रुपए शेष थे. केवल 11% मजदूर ऐसे थे, जिनके पास रु. 2001 से ज्यादा की राशि शेष थी. सोचिए कि जीते तो कैसे जीते, वापस न आते तो क्या करते. उन्हें बहुत ज्यादा मजदूरी तो मिलती नहीं, 29.4 प्रतिशत प्रवासी मजदूर औसतन 201 से 300 रुपए, 41.6% मजदूर 301 से 400 रुपए और 17.1% मजदूर 401 से 500 प्रतिदिन कमाते हैं. उनके पास न अवकाश होता है और न दूसरा भत्ता.

इस अध्ययन में 81% प्रवासी मजदूरों ने बताया कि उन्हें किसी भी किस्म का अवकाश या छुट्टी नहीं मिलती है. जिस दिन वे काम पर नहीं जा पाते हैं, उस दिन उन्हें मजदूरी की राशि का घाटा होता है, इसलिए वह लगातार काम करते हैं जब भी परिस्थिति बनती है झोला उठाकर गांव की ओर निकल पड़ते हैं.

54.6 फीसदी मजदूर अब पलायन नहीं करना चाहते
यह अध्ययन यह भी बताता है कि तकरीबन 43 प्रतिशत मजदूरों पर किसी न किसी तरह का कर्ज है. हालांकि सभी मजदूर कर्ज पाने के हकदार नहीं होते, कर्ज के लिए कुछ रखना पड़ता है, और रखने के लिए इनके पास कुछ खास नहीं है. सभ्य लोकतंत्र ने इन प्रवासी मजदूरों के साथ जिस तरह का व्यवहार, आर्थिक असुरक्षा, संकट और दर्द पैदा किया उसके बाद 54.6 फीसदी मजदूर अब पलायन कर बड़े शहरों की तरफ मुंह नहीं करना चाहते. 24.5% अभी तय नहीं कर पाए हैं कि अब वे दोबारा जाएंगे या नहीं और यदि जाएंगे तो कब ? केवल 21% कामगार स्थितियां सामान्य होते ही पलायन पर जाना चाहेंगे. हे शहरों, अब सोच लो तुम्हारे लिए पसीना बहाने अब कौन आएगा?

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First published: May 27, 2020, 4:57 PM IST
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