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ग्रामीण जीवनरेखा है मनरेगा, फिर इसके बजट में कटौती क्यों?

बेहतर होता कि इस साल के बजट आवंटन में सबसे ज्यादा जोर मनरेगा पर होता, लेकिन वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण इस पर दरियादिली नहीं दिखा पाईं और इसे संशोधित बजट अनुमान से तकरीबन 09 हजार करोड़ रुपये का कम बजट आवंटन दिया गया है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 4, 2020, 4:57 PM IST
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ग्रामीण जीवनरेखा है मनरेगा, फिर इसके बजट में कटौती क्यों?
मजदूरों के रहने का भी होगा इंतज़ाम
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना उर्फ मनरेगा को कभी यूपीए सरकार की 'असफलता का स्मारक' बताया गया था. निश्चित तौर पर इस योजना को बनाने, लाने और जमीनी रूप से लागू करने में यूपीए सरकार ने बहुत मेहनत भी की थी. इस योजना ने करोड़ों लोगों को संकट के दौर में रोजगार देने में सफलता भी पाई. अब इस योजना का आकार तकरीबन 60 हजार करोड़ तक पहुंच गया है. जिस वक्त इसे असफल करार देते हुए तमाम सवाल खड़े किए गए थे, उस वक्त यह योजना तकरीबन 32 हजार करोड़ रुपये की योजना थी. अब मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में यह तकरीबन दोगुनी बजट की होकर 60 हजार करोड़ पर जा पहुंची है.

इसका अर्थ यह है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद यह योजना ग्रामीण भारत में लोगों की जीवनरेखा बनी हुई है, लेकिन क्या वजह है कि इसे इस सरकार के भाषणों में वैसा सम्मान नहीं मिलता जैसा कि प्रधानमंत्री जी की ओर से चलाई जा रही दूसरी योजनाओं को. दिक्कत तो यह भी है कि जब हम रोजगार शब्द को कहते—सुनते हैं तब ऐसे रोजगार की तस्वीर हमारे जहन में आती भी नहीं जैसा कि मनरेगा में चुपचाप तरीके से होता रहता है. जाने क्यों सरकार इस श्रेय को हासिल नहीं करना चाहती कि वह मनरेगा के माध्यम से ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने की एक  महत्वपूर्ण कोशिश में लगी हुई है.

वित्तमंत्री इस बार दरियादिली नहीं दिखा पाईं और इसे संशोधित बजट अनुमान से तकरीबन 09 हजार करोड़ रुपये का कम बजट आवंटन दिया गया है.
वित्तमंत्री इस बार दरियादिली नहीं दिखा पाईं और इसे संशोधित बजट अनुमान से तकरीबन 09 हजार करोड़ रुपये का कम बजट आवंटन दिया गया है.


पिछले साल मनरेगा पर सरकार ने 60 हजार करोड़ रुपये का भारी भरकम आवंटन कर ग्रामीण भारत के जरूरतमंद लोगों की आजीविका सुनिश्चित की थी. संशोधित बजट अनुमान में इसे बढ़ाकर 71 हजार करोड़ रुपये तक ले जाया गया. यह बहुत प्रशंसनीय कदम इसलिए कहा जाना चाहिए कि चारों ओर रोजगार के बढ़ते संकट और अधोसंरचनात्मक निर्माण में यह योजना जमीनी स्तर पर कारगर नजर आती है. इस संशोधित बजट अनुमान को देखते हुए होना तो यही चाहिए था कि इस साल के बजट आवंटन में सबसे ज्यादा जोर मनरेगा पर ही होता और इसका बजट 71 हजार करोड़ से भी ज्यादा का रखा जाता, लेकिन वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण इस पर दरियादिली नहीं दिखा पाईं और इसे संशोधित बजट अनुमान से तकरीबन 09 हजार करोड़ रुपये का कम बजट आवंटन दिया गया है.
बजट में प्रमुख योजनाओं के बजट आवंटन को देखें तो किसी योजना पर यह सबसे ज्यादा कटौती है. एक महिला होने के नाते उन्हें यह भी समझना चाहिए था कि पहली बात तो ग्रामीण भारत रोजगार के नजरिये से एक चुनौतीपूर्ण अवस्था से गुजर रहा है. पीरिएडिक लेबर फोर्स सर्वे (Periodic Labour Force Surveys) 17-18 के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी साल 2011—12 की तुलना में 08 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है. दूसरी बात इस योजना में अगर काम की सहभागिता की बात की जाए तो वह पुरुषों से भी ज्यादा है. मनरेगा के आंकड़े बताते हैं कि इस वक्त इस योजना में तकरीबन 56 प्रतिशत महिलाएं काम कर रही हैं. संभवत: देश में ऐसी कोई दूसरी योजना नहीं है, जहां महिलाओं की इस तरह की भागीदारी रही हो. इस योजना में अनुसूचित जाति के 20 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के 17 प्रतिशत लोग भागीदारी करते हैं.

मनरेगा में इस वक्त तकरीबन 56 प्रतिशत महिलाएं काम कर रही हैं. संभवत: देश में ऐसी कोई दूसरी योजना नहीं है, जहां महिलाओं की इतनी बड़ी भागीदारी हो.
मनरेगा में इस वक्त तकरीबन 56 प्रतिशत महिलाएं काम कर रही हैं. संभवत: देश में ऐसी कोई दूसरी योजना नहीं है, जहां महिलाओं की इतनी बड़ी भागीदारी हो.


बजट दस्तावेज में मनरेगा के आउटकम संकेतक केवल यह नहीं कहते हैं कि वह अगले एक साल में कितने लोगों को रोजगार देकर उनकी आजीविका को सुनिश्चित करेंगे, बल्कि यह भी बताते हैं कि वह ग्रामीण भारत के विकास में भी आमूलचूल परिवर्तन करने वाले हैं. इस लिहाज से भी मनरेगा की तारीफ बनती है. सरकार ने लक्ष्य रखा है कि वह 270 करोड़ मानव दिवस का काम उत्पादित करेगी. इन कामों के माध्यम से वह 75 लाख परिसंपत्तियों का निर्माण करेगी. इसके साथ ही 123 लाख नई कार्य परियाजनाओं को लांच किया जाएगा. अगर इनको ठीक तरह से कर लिया गया तो परिणाम के रूप में तकरीबन डेढ़ लाख सूक्ष्म सिंचाई परियोजनाएं देश में आकार लेंगी. इसमें तकरीबन 40 हजार काम वनीकरण से संबंधित हो सकेंगे. इतना ही नहीं तकरीबन सवा लाख जल संरचनाएं भी पुनर्जीवित हो सकेंगी.
होना तो यह चाहिए था कि इस साल के बजट आवंटन में सबसे ज्यादा जोर मनरेगा पर होता और इसका बजट 71 हजार करोड़ से भी ज्यादा का रखा जाता.
होना तो यह चाहिए था कि इस साल के बजट आवंटन में सबसे ज्यादा जोर मनरेगा पर होता और इसका बजट 71 हजार करोड़ से भी ज्यादा का रखा जाता.


मनरेगा की वेबसाइट के मुताबिक 2019—20 में प्रति दिन प्रति व्यक्ति प्रति काम पर होने वाला खर्च 247 रुपये है. इसमें मटेरियल की कीमत और मजदूरी भी शामिल होती है. इस साल के बजट आवंटन (61500 करोड़) और काम के लक्ष्य (270 करोड़ मानव दिवस) को देखें, तो यह औसतन 227 रुपये प्रति व्यक्ति, प्रति मजदूर निकलकर आ रहा है, जो तकरीबन 20 रुपये प्रति व्यक्ति कम है. अगर इस गणित को ठीक से समझा जाता, शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर लेने का दमखम बजट में भी दिखाया जाता, तो कम से कम 20 रुपये की रकम और बढ़ाकर मनरेगा को रोजगार की वास्तविक जीवनरेखा बना दिया जाता.

मनरेगा का साल दर साल आवंटन


वर्ष                बजट
2016-      17 48215
2017-     18 55000
2018-     19 61084
2019-     20 71002
2020-    21 61500


(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)


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First published: February 4, 2020, 4:30 PM IST
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