भारत में डेढ़ करोड़ से ज्यादा बच्चे नशे का शिकार

नेतृत्व नशामुक्ति की बात तो करता है, लेकिन शराबबंदी की नहीं, क्योंकि इससे भरी राजस्व की हानि हो सकती है. सरकार चाहे किसी की हो, नशे का पेड़ खूब फलता-फूलता है, इसकी टहनियां भर काटी जाती हैं जड़ नहीं.

Source: News18Hindi Last updated on: February 8, 2021, 3:27 PM IST
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भारत में डेढ़ करोड़ से ज्यादा बच्चे नशे का शिकार
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भारत में डेढ़ करोड़ से ज्यादा बच्चे नशे का शिकार हैं. इनमें कई नशे तो ऐसे हैं जिनके हमने नाम तक नहीं सुने हैं. यह नशे बच्चों को एक अँधेरी दुनिया में धकेल रहे हैं. देश में तमाम कायदे, कानून हैं और सरकारें भी नशा मुक्ति अभियान चला रहे हैं, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में यदि बच्चे नशीले पदार्थों के उपयोगकर्ता के रूप में सामने आ रहे हैं, तो यह स्थिति निश्चित ही चिंताजनक है.


मध्यप्रदेश में पिछले महीने जहरीली शराब का मुद्दा छाया रहा. दो दर्जन से अधिक लोगों की मौत हुई, प्रशासन ने सक्रियता दिखाई तो गाँव-गाँव में अवैध शराब पाई गयी. इन घटनाओं के बाद प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती ने नशामुक्ति अभियान की घोषणा कर दी. गृहमंत्री नरोत्तम मिश्र ने अवैध शराब को बंद करने के लिए कदम उठाने की बात की और एक कदम आगे जाकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रतलाम से नशा मुक्ति अभियान का आगाज ही कर दिया. उनका मानना है कि यह प्रवृत्ति शराबबंदी से नहीं बल्कि अभियान से ही दूर हो सकती है!


नेतृत्व नशामुक्ति की बात तो करता है, लेकिन शराबबंदी की नहीं, क्योंकि इससे भरी राजस्व की हानि हो सकती है. सरकार चाहे किसी की हो, नशे का पेड़ खूब फलता-फूलता है, इसकी टहनियां भर काटी जाती हैं जड़ नहीं. कोरोना काल में तो हमने ठेकों पर महिला पुलिसकर्मियों की दुकान सँभालते हुए तस्वीरों को देखा है, बिहार, गुजरात जैसे राज्यों में तो खैर शराबबंदी लागू होने के बाद भी कितना नशा कम हुआ, यह वहीं के लोग बेहतर बता सकते हैं.


चिंता में डालने वाले हैं नशे से संबंधित आंकडे़

नशे के सम्बन्ध में हाल ही में राज्यसभा में आँकड़े पेश किए पर गए हैं. यह स्थिति चिंता में डाल देने वाली है. सांसद दिनेश त्रिवेदी ने सवाल पूछा था कि क्या सरकार को निराश्रित बच्चों में नशे की लत की जानकारी है और यदि है तो उसके निराकरण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं ? इसके जवाब में महिला एवं बाल विकास विभाग ने बताया है कि देश में तकरीबन डेढ़ करोड़ बच्चे नशे के उपयोगकर्ता हैं, तीस लाख बच्चे शराब, बीस लाख बच्चे भांग, चालीस लाख बच्चे ओपियोइड्स, बीस लाख बच्चे सीडेटिप्स, तीस लाख बच्चे इन्हेलेंट, दो लाख बच्चे कोकीन, चार लाख बच्चे एटीस, और दो लाख बच्चे हल्लुकिनोजेंस के उपयोगकर्ता पाए गए.


यह आंकड़े सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय मादक द्रव्य निर्भरता उपचार केंद्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली के माध्यम से कराए गए राष्ट्रीय सर्वेक्षण पर आधारित है. सरकार ने कहा है कि मादक द्रव्यों के आदी निराश्रित बच्चों के संबंध में अलग से कोई डाटा उपलब्ध नहीं है. क्या हम यह जरूरी नहीं समझते कि यह समस्या कितनी बड़ी होती जा रही है, इसका पता लगाएं. उसके सही आंकड़ों को सामने लाएं.


यह सवाल निराश्रित बच्चों में नशाखोरी की समस्या पर केन्द्रित था. इससे एक सामान्य धारणा यह बनती है कि निराश्रित बच्चों में ऐसी समस्या ज्यादा है क्योंकि वह ज्यादा असुरक्षा में होते हैं. हर शहर के अपने ऐसे अनुभव हैं. यह जो बच्चे हजारों कारणों से रेलवे प्लेटफार्म, फुटपाथ और ऐसी ही कई और जगह अपना बचपन गुजारने को मजबूर हैं, वह आसानी से इनकी चपेट में आ जाते हैं. पंचर जोड़ने के साल्यूशन को सूंघने से लेकर न जाने कितनी तरह के नशा करने की खबरें अखबार में छपती हैं. कई बार इन्हें संरक्षण देने वाला माफिया इन्हें नशे के दलदल में धकेलकर मनचाहे अनैतिक काम में भी धकेल देते हैं. यह एक पूरे जीवन को बर्बादी की तरफ ले जाने वाली राह है.


ऐसे बच्चों को भी किशोर न्याय बच्चों की देखभाल और संरक्षण अधिनियम 2015 (जेजे अधिनियम) के अनुसार संवेदनशील पाए गए और मादक द्रव्य के व्यापार में संलग्न होने की संभावना वाले बच्चे को देखभाल और संरक्षण के जरूरतमंद बच्चे के तौर पर शामिल किया गया है. पर ऐसे तमाम सिस्टम तब काम करते हैं जबकि कोई गंभीर घटनाएं सामने आती हैं. उसके पहले इस प्रवृत्ति को रोकने की कोशिशें अभी उस स्तर पर नहीं हैं, जितनी की समस्या है.


नशे की मांग में कमी की राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत किशोर गृहों में नशा मुक्ति केंद्र और देखभाल और संरक्षण के जरूरतमंद बच्चों जैसे विशेष समूहों के लिए राज्य सरकार के माध्यम से नशा मुक्ति केंद्रों की स्थापना और उनकी सहायता करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है. युवाओं में मादक द्रव्य के सेवन के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से उच्च शैक्षणिक संस्थानों विश्वविद्यालय परिसरों और स्कूलों तथा समाज तक पहुंचने पर विशेष ध्यान देते हुए 272 संवेदनशील जिलों में नशा मुक्त भारत अभियान शुरू किया गया है, इसे देश के सभी जिलों में लागू करने की जरूरत है, क्योंकि यह समस्या सर्वव्यापी है.


बच्चों की दुनिया में नशे की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, इसके लिए बड़ों की दुनिया में भी नशे को हतोत्साहित किया जाना चाहिए. गांधी ने कहा भी था कि ‘नशा शरीर और आत्मा दोनों का ही नाश करता है.‘ अब यह देश के भविष्य का भी नाश कर रहा है. (ये लेखक के निजी विचार हैं)


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: February 8, 2021, 3:27 PM IST
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