कभी कहलाता था काला सोना, अब क्यों पिट रही सोयाबीन की खेती

मध्‍य प्रदेश की जमीन का तेल निकालने के बाद अब यह देश के कुछ और राज्यों में सोयाबीन अपनी पैठ बना रहा है, तब यह जरूरी हो जाता है कि एमपी में इसकी दुर्गती की एक बार पड़ताल जरूर कर ली जाए और तभी इसे अपनाया जाए.

Source: News18Hindi Last updated on: July 22, 2021, 7:48 PM IST
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कभी कहलाता था काला सोना, अब क्यों पिट रही सोयाबीन की खेती
त्तर के दशक में सोयाबीन मध्यप्रदेश में आया. इसकी आमद से पहले मध्यप्रदेश में कई प्रकार की मोटे अनाज वाली और मसालों की फसलें होती थीं, जैसे मक्का, कोदों, कुटकी, ज्वार, दालें आदि होती थीं. कम उत्पादन के बावजूद किसानों को अपने खाने-पीने की चीजें अपने ही खेत-खलिहान से मिल जाया करती थीं. बाजार पर निर्भरता कम थी. इन सारी फसलों को चौपट करके सोयाबीन पूरे प्रदेश में छा गया.

कुछ सालों तक इसने लगातार बंपर उत्पादन दिया भी. लोग इसे काला सोना तक कहने लगे, लेकिन पिछले कुछ सालों से यह खुद चौपट होने की कगार पर पहुंच गया है. हालात यह हैं कि सब तरह के जतन करने के बाद भी इसका उत्पादन बढ़ नहीं पा रहा है. यह भी कहा जा रहा है कि सोयाबीन जमीन को बंजर कर रहा है. यह भोजन की थाली का भी हिस्सा नहीं है. तेल जरूर निकाला जाता है.

एमपी की जमीन का तेल निकालने के बाद अब यह देश के कुछ और राज्यों में सोयाबीन अपनी पैठ बना रहा है, तब यह जरूरी हो जाता है कि एमपी में इसकी दुर्गति की एक बार पड़ताल जरूर कर ली जाए और तभी इसे अपनाया जाए.

बढ़ा बुवाई क्षेत्र, कम हुआ उत्‍पादन
पहले बात कर लेते हैं कुछ आंकड़ों की. यह आंकड़े कल लोकसभा में कृषि एवं कल्याण मंत्रालय की ओर से केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने पेश किए हैं. वैसे तो इस सूची में देश भर के आंकड़े हैं, लेकिन इनमें सबसे पहली नजर एमपी पर जाना इसलिए स्वाभाविक है. क्योंकि, हरित क्रांति के बाद एमपी का सोयाबीन स्टेट बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी गई है.

पिछले पांच सालों यानी 2016-17 से लेकर 2020-21 तक की अवधि में मध्यप्रदेश के अंदर सोयाबीन बुवाई का क्षेत्रफल 54.01 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 64.99 हजार हेक्टेयर पर पहुंच गया है, लेकिन दूसरी ओर हम पाते हैं कि ठीक इसी अवधि में सोयाबीन का उत्पादन 1231 हजार टन से घटकर 789 हजार टन पर सिमट गया है.


यह कैसी अजीब बात है कि बुवाई का क्षेत्रफल तो बढ़ा, लेकिन उत्पादन 442 हजार टन घट गया, जबकि इन्हीं सालों में मध्यप्रदेश में सामान्य बारिश दर्ज की गई. कोई भी साल सूखा नहीं गया. कोई ऐसा बड़ा प्राकृतिक प्रकोप भी नहीं रहा जिससे पूरे प्रदेश में फसल चौपट हो जाए, उसके बावजूद इस स्तर पर रकबे के बढ़ने के बावजूद उत्पादन का घटना हमें चौंकाता है.खेती की खेती को क्‍यों कहा गया भष्‍मासुर
सोयाबीन एक नगद फसल है. इसका खाने से सीधा संबंध नहीं है और बोने में भी नगद खर्च करना पड़ता है. हर साल खाद बीज खरीदने, बोने, नींदने, कीटनाशक-नींदानाशक दवाओं में, काटने, मंडी में बेचने तक में में अच्छा खासा पैसा खर्च करना पड़ता है. इसके हर पड़ाव पर नगदी की जरुरत पड़ती है. इस नगदी के लिए ज्यादातर किसानों को कर्ज लेना पड़ता है. इस बीच, यदि यह फसल खराब हो जाए या मौसम प्रतिकूल हो जाए, तो इसमें बहुत बड़ा घाटा भी सहना पड़ता है.

इसीलिए, बिना जहर की खेती के पक्षधर किसान, जिन्हें इसके लिए देश के सबसे बड़े पुरस्कारों में एक पदमश्री मिला बाबूलाल दाहिया भस्मासुर कहते हैं. उनके मुताबिक, उन प्रदेशों में जहां सोयाबीन बड़े पैमाने पर होता है, वहां किसानों की आत्महत्या की एक बड़ी वजह सोयाबीन की खेती भी है, क्योंकि इसमें हर कदम पर नगदी की आवश्यकता बड़ी मात्रा में होती है, और इसका इंतजाम तमाम तरह के कर्जों से होता है.


हालांकि, लगातार घाटे के बावजूद सोयाबीन मप्र सोयाबीन बोने और उत्पादन में अग्रणी बना हुआ है. रकबे को देखें तो मप्र में देश के कुल सोयाबीन क्षेत्र का 49 प्रतिशत हिस्सा है. इसके बाद, महाराष्ट्र की 34 प्रतिशत और राजस्थान की 10 प्रतिशत हिस्सेदारी है. उत्पादन के मामले में मध्यप्रदेश की 52 प्रतिशत हिस्सेदारी है. वहीं, महाराष्ट्र की 32 प्रतिशत और राजस्थान की 10 प्रतिशत हिस्सेदारी है.

छोटे-मंझौले किसानों को नहीं मिल पाता फायदा
बंपर उत्पादन के बाद भी प्रोसेसिंग को लेकर कोई काम नहीं होने के कारण इसका फायदा छोटे और मंझौले किसानों को नहीं मिल पाता है. उनकी निर्भरता केवल बाजार के बेचने तक है. सोयाबीन तेल बनाने वाली बड़ी कंपनियां हैं, इससे किसान केवल उनके लिए कच्चा उत्पादन करने वाला मोहरा मात्र है.

यदि प्रोसेसिंग पर ध्यान दिया गया होता, और इसकी तेल निकालने से लेकर अन्य उत्पाद बनाने तक की छोटी मशीनरी को विकसित किया जाता, तो हो सकता था कि किसान वाकई सोयाबीन की फसल से भरपूर फायदा ले पाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बल्कि जो सरकारी प्लांट भी सोयाबीन प्रोसिसिंग के लिए लगाए गए थे, वह भी नही चल पाए और सरकार खुद भी सोया स्टेट होने का भरपूर फायदा नहीं उठा पाई.


जिस वक्त लोकसभा में कृषि कल्याण मंत्री ने यह आंकड़े सदन में पेश किए, उस वक्त दिल्ली की सड़कों पर ऐतिहासिक किसान आंदोलन चल रहा है, किसान अपनी मांगों को लेकर अड़े हैं और खरीफ की फसल एक बार फिर अवर्षा की शिकार है. देश के एक बड़े हिस्से में मानूसन के ब्रेक ने फसलों पर दोहरी मार डाल दी है. या तो किसान फसल बो ही नहीं पाया है, और बोई है तो उसमें जान नहीं है, वह सूखे का शिकार हो गई है.

निराश कर सकते हैं अगले साल के आंकड़े
ऐसे में, अगले साल सोयाबीन उत्पादन के आंकड़े एक बार फिर निराश करने वाले होंगे, ऐसे में एक बार ठहरकर हर स्तर पर सोयाबीन की पड़ताल करने की जरुरत है. मप्र के आंकड़ों की समीक्षा जरूरी है कि ऐसा हो क्यों रहा है. और यदि वाकई यह अब एक धोखेबाज फसल साबित हो रही है तो इसके विकल्पों को भी प्रोत्साहन देने की जरूरत है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: July 22, 2021, 7:48 PM IST
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