कोरोनाकाल में बचपन को संवेदनशीलता से देखने की जरूरत

बचपन की छवियां उम्र भर असर करती हैं ! इस समय दुनियाभर के बच्चे कोरोना कोविड-19 का जो ऐतिहासिक कहर देख रहे हैं, संभव है वह इसे अपनी स्मृति से ताजिंदगी विलोप न कर पाएं.

Source: News18Hindi Last updated on: May 18, 2020, 3:59 PM IST
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कोरोनाकाल में बचपन को संवेदनशीलता से देखने की जरूरत
2011 की जनगणना के मुताबिक देश में शून्य से छह साल तक के 157 मिलियन बच्चे हैं
वैसे तो हम सभी एक महामारी के साक्षी हो गए हैं, लेकिन जीवन के जिस मखमली हिस्से को बचपन कहते हैं, (और तकरीबन झोपड़ी से लेकर महलों के बच्चों के लिए वक्त का यह जहीन हिस्सा किसी न किसी रूप में यादगार होता ही है, वह आशानुरूप न भी हो तो तो वह सबक की तरह से रह-रह कर सामने आता है) वक्त के ऐसे हिस्से में जो कहानी लिखी जा रही है, उसके बारे में सोचकर सिहरन हो उठती है. बार-बार यह सोचने में आता है कि इस वक्त बचपन क्या और कैसे कर रहा है? वह कितना सुरक्षित है? उसके लिए हमारी तैयारी क्या है ? कहीं ऐसा भी न हो कि इस महामारी के बाद जब इससे दो-दो हाथ करने का विश्लेषण हो तब हमारे पास बताने को बहुत कुछ न हो? कहीं हम पर ऐसा आरोप न लग जाए कि हमने बचपन को उसके अपने हाल पर छोड़ दिया था ! हमेशा से उपेक्षित रहे बचपन का महामारी में भी उपेक्षा का संगीन आरोप हमारे माथे पर न लग जाए?

यह सही है कि इस बीमारी की बनावट ने हमारे समाज के सारे ताने-बाने को तोड़कर रख दिया. इसने हर उस जगह बड़ी ही चालाकी से प्रहार किया जहां से कोई समाज बनता है. इसने मोहल्लों के रिश्तों-नातों पर ऐसे प्रहार किया कि लोग अंतिम संस्कार जैसे बहुत जरूरी माने-जाने वाले मौकों पर भी न जा पाएं, इसने दुनिया की भीड़ में मनुष्य को अकेले संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया.

हमारा समाज वैसे ही तमाम कारणों से एकल समाज की ओर प्रस्थान कर गया था जिसकी जड़ में कहीं न कहीं बाजारवाद से प्रभावित वह जीवनशैली ही थी जहां वस्तु ही हमें सारे सुख-सुविधा का प्रधान पैमाना बनी बैठी थी. तकनीक की उपलब्धताओं और सरलताओं के बाद भी हमारे जीवन संवाद का दायरा छिन्न-भिन्न हो चला था, और किस्मत से बच्चे भी उस संवाद त्रासदी का बड़ा शिकार हो रहे थे.

बच्चे गुनाहगार नहीं हैं पर उनकी पीड़ा सबसे मार्मिक
ऐसे में इस महामारी में हमें मौका तो मिला कि इस जीवनशैली का आत्मविश्लेषण किया जाए. हम पाएंगे कि चाहे वह झोपड़ी का समाज हो, बालकनी वाला मध्यमवर्ग या बंगलों में हर आधुनिक तकनीक और यंत्र से लैस बचपन. उसकी समस्या हर कहीं रही है, उसके रूप भले ही कुछ बदले से हों. हमने देखा कि वह एक तस्वीर जिसमें एक मजदूर अपने बच्चे को एक हाथ से पकड़कर किसी खिलौने का उछालकर ट्रक में चढ़ा रहा है या वह एक तस्वीर जिसमें एक मजदूर स्त्री अपने बच्चे को ट्रॉली पर लेटाकर यूं घसीटकर ले जा रही है. हम में से जब-जब कोई कोरोना को याद करेंगे तो यह तस्वीरें हमारी आंखों के सामने से तैर जाया करेंगी. इस हालात के लिए बच्चे गुनाहगार नहीं हैं, पर उनकी पीड़ा सबसे मार्मिक है. इसका ये मतलब भी बहुत साफ है कि हम अपनी जिम्मेदारी निभाने में बुरी तरह असफल रहे हैं. इसलिए यह सिर्फ केवल तस्वीरें नहीं रह जातीं, यह सीधे सवाल की तरह हमारी आंखों में गहरे तक चुभ जाती हैं. इस महामारी में ऐसे सैकड़ों-हजारों दृश्य होंगे जो हमारी आंखों तक आए ही नहीं हैं. क्या कोई जवाब हमारे सामने है. क्या कोई तैयारी है?

यदि पोषण और स्वास्थ्य के नजरिए से देखें तो हिंदुस्तान के बच्चे कोरोना से पहले ही हमसे बेहतर करने की बुनियादी मांग कर रहे थे. हर सौ में से तकरीबन चालीस बच्चे किसी न किसी तरह के कुपोषण के शिकार हैं. हर एक हजार पैदाइश पर तकरीबन 50 बच्चों के खोने का गम भी हमारे सीने पर दर्द देता रहता था. लिखेंगे तो बीसियों और भी समस्याएं और आंकड़े आकर सामने खड़े हो जाएंगे, यह परिस्थिति हमारे बुनियादी ढांचे में सर्वोच्च प्राथमिकता से कदम उठाए जाने की मांग रखती थी, लेकिन हम देखकर भी अनदेखा करते रहे. नतीजा हमारे सामने है.

कहीं बचपन को न चुकानी पड़े महामारी की सबसे बड़ी कीमतहम 2015 में मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स प्राप्त करने में पीछे रह गए थे, और अब सतत विकास लक्ष्यों को 2030 तक की समय सीमा में हासिल करना भी दूर की कौड़ी साबित होगा. बात अब अपने मानकों को बेहतर करने के स्थान पर यह हो जाएगी कि हम सालों-साल की मेहनत के बाद आंकड़ों को जो किसी तरह सुधार पाए थे, कहीं वह आंकड़े हमें दस-बीस साल पीछे न लेकर चले जाएं ?

आखिर महामारी की कीमत भी तो चुकानी होगी, इसकी सबसे बड़ी कीमत कहीं बचपन को न चुकानी पड़े. इसलिए हमें बच्चों के पोषण, बच्चों का स्वास्थ्य और उनकी शिक्षा तीनों पर ही बहुत बारीकी से ध्यान देने की जरूरत होगी.

2011 की जनगणना के मुताबिक देश में शून्य से छह साल तक के 157 मिलियन बच्चे हैं. हमें इस बात पर गर्व करना चाहिए कि एकीकृत बाल विकास योजना के तहत इन बच्चों को कवर किया जाता है. तमाम आलोचनाओं के बावजूद देश अपनी प्रतिबदधता से पीछे नहीं हटा है.

इस योजना के तकरीबन चार दशकों ने बाल अधिकारों के लिए एक नई रोशनी दी है. इस योजना ने न केवल बच्चों के शुरूआती पोषण और शिक्षा को प्रभावित किया है बल्कि ग्रासरूट पर ऐसे कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी की है, जो गांव में अब वैसी ही महत्वपूर्ण भूमिका में है, जैसा कभी स्कूल शिक्षक हुआ करता था.

सिर्फ रेडी टू ईट मील का पैकेट देने से नहीं चलेगा काम
कोरोना महामारी के वक्त में भी यह पढ़ी-लिखी और समाज के लिए जागरुक कार्यकर्ता महामारी के रोकथाम की पहली कड़ी साबित हुई हैं. शुरूआत में इन कार्यकर्ताओं के साथ वेतन विसंगति जैसी चीजें रहीं, अब भी उनका वेतन ठीक तो हुआ है पर सम्मानजनक नहीं. अब जरुरत इस बात की होगी कि इन्हीं कार्यकर्ताओं के मार्फत देश में उपेक्षित बचपन को किसी गहरे गडढे में जाने से बचाया जाए. लॉकडाउन में भले ही बच्चों को रेडी टू ईट मील का एक पैकेट भर देकर काम चला लिया हो, लेकिन अब केवल इससे काम नहीं चलेगा. प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या गांव लौटी है, जरुरत इस बात की भी होगी कि इन सेवाओं के दायरे में ऐसे बच्चों को भी बिना किसी भेदभाव के शामिल किया जाएगा.

शिक्षा के कई तकनीकी विकल्प भी हो सकते हैं, (हालांकि इस विकल्प को एक परिस्थिति में ही सर्वमान्य जाना चाहिए) लेकिन पोषण और स्वास्थ्य का विकल्प तकनीक नहीं हो सकती. और यह भी तय बात है कि इतने बड़े देश में यह काम केवल सरकार जैसी जनकल्याणकारी संस्थाएं ही कर सकती हैं.
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First published: May 18, 2020, 3:59 PM IST
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