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OPINION: वही सुनें, करें जो प्रधानमंत्री कह रहे हैं

क्या देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का संदेश साफ नहीं था? क्या सभी लोगों ने उनको ठीक से सुना...

Source: News18Hindi Last updated on: April 13, 2020, 3:01 PM IST
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OPINION: वही सुनें, करें जो प्रधानमंत्री कह रहे हैं
पीएम मोदी ने सभी को ईस्टर की शुभकामनाएं दी
क्या देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का संदेश साफ नहीं था? क्या सभी लोगों ने उनको ठीक से सुना नहीं था. गौर कीजिए. एक बार नहीं बार—बार उन्होंने दोहराया था ‘घर से निकलना नहीं है.  ‘दीया जलाना है.‘
यह ताकीद पिछ्ले अनुभव का सबक थी, जब प्रधानमंत्री ने डॉक्टरों और कोरोना के खिलाफ जंग में सीधी लड़ाई लड़ रहे लोगों को सम्मान देने के लिए एक दिन के जनता कर्फ्यु के बाद ध्वनि नाद का आव्हान किया था. ताकि यह जंग लड़ रहे लोगों को भरोसा दिला सकें कि देश उनके साथ खड़ा है. पर किया क्या ? कुछ लोग उत्साह में सड़कों पर निकल आए. कुछ लोगो ने एक सम्मान के कार्यक्रम को जश्न में तब्दील कर दिया. ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ की धज्जियां उड़ा दीं.

जाहिर तौर पर इसी भय के चलते प्रधानमंत्री ने बहुत सोच—समझकर अपने वीडियो संदेश को बुना था. इस कार्यक्रम के भी पक्ष—विपक्ष में तमाम टिप्पणियां सोशल मीडिया पर तैर रही थीं. कई तरह की व्याख्याएं सामने आईं. पर मोदी को देश की जनता ने अपना बहुमत दिया है. पूरा भरोसा था कि यह कार्यक्रम भी सफलता हासिल करेगा. काम की रणनीति बनाई भी ऐसी जाती है, जिसकी पूरे होने की गुंजाइश बराबर रहे. जो आसान रहे. जिसे हर कोई कर पाए. जिस पर विपक्ष सवाल न कर पाए, और कोई अलोचना करे भी तो ऐसा लगे कि वह देश के हित की बात नहीं कर रहा है.

इसलिए इन दो कार्यक्रमों का विरोध भी कोई खुलकर नहीं कर पाया, सिवाय उन लोगों के जो मांग कर रहे थे कि इस इवेंट की जगह पहले अस्पतालों में सुविधाएं दो, डॉक्टर दो, डॉक्टरों को मेडिकल उपकरण दो, जांचें जल्दी कराओ. देश का सबसे लोकप्रिय नेता इस बात को जानता भी है. पर हुआ क्या?
इस बार भी जब 9 बजे तो लोग बालकनी में पहुंचे. उनके हाथों में दीए के अलावा थालियां थीं, घंटियां भी थीं. शंख की ध्वनि भी सुनाई देने लगी. पिछली बार आजादी से यह सब बजाने के अनुभव को लोग दोबारा इस्तेमाल करना चाहते थे. सामूहिकता के आनंद को फिर जीना चाहते थे. कुछ देर बाद पटाखों की आवाजें आने लगीं. आसमान से शहर की शूटिंग चल रही थी, आतिशबाजी भी होने लगी. सोशल मीडिया पर मूर्खता शब्द तैरने लगा. कुछ शहरों में आग लगी. भारी नुकसान भी हुआ. इसका मतलब है कि जो कुछ बोला जा रहा है उसे देश की जनता नहीं सुन रही है. और यह सबसे खतरनाक है.

इस अजीब बीमारी ने हर तरह के ताकतवर आदमी की ताकत छीनकर उसे पंगु बना दिया है. उसे घरों में कैद कर दिया है. कोई ताकत इससे लड़ नहीं सकती, सिवाय उन बातों को सुनने के जो कही जा रही हैं. यकीन कीजिए, बातें सुनने और मानने के अलावा और कोई भी इलाज नहीं है, कोई भी नहीं.

अमरीका—इटली जैसे देश इस बीमारी के आगे घुटने टेक चुके हैं. हमारी स्वास्थ्य सेवाएं, और सिस्टम इन देशों की अपेक्षा बहुत कमजोर है. हमारा विल पॉवर जरूर मजबूत हो सकता है, ऐसी अनेक खतरनाक बीमारियों से गुजरने का अनुभव भी हमारे पास है, जिनको सहन करते हुए भी हम जीते चले जाते हैं, लेकिन खबर लिखने से लेकर आंखों तक पहुंचती है तब तक आंकड़े बहुत आगे जा चुके होते हैं. ऐसे में सिवाय बात मानने के कोई भी चारा नहीं. इसलिए जो भी बात बड़े—बुजुर्ग कह रहे हैं, उसे मान लीजिए. यह जान लीजिए कि यदि यह वायरस गांव—खेड़ों, कस्बों तक पहुंचा तो दुनिया में सबसे ज्यादा मौतें हमारे देश में ही होने वाली हैं. क्योंकि सभी जानते हैं गांव का स्वास्थ्य सेवा तंत्र बेहद कमजोर है, वह इस भयंकर बीमारी का वजन झेलने की स्थिति में बिलकुल भी नहीं है. इसलिए सिवाय लॉकडाउन के मानने के और कोई चारा बिलकुल नहीं है.बिलकुल सही है कि भारत एक उत्सवधर्मी देश है. यहां पर भूखे पेट आदमी भी ईश्वर में आस्थावान मिलकर उम्मीद की रोशनी रखता है. यह सही है कि एकजुटता से ही हम इस बीमारी को हरा सकते हैं, पर अतिउत्साह से कतई नहीं. छुपाकर भी बिलकुल नहीं. एक—दूसरे पर आरोप लगाकर भी नहीं. जातीय—वर्गीय खांचों में डालकर भी नहीं. इसे हराया जा सकता है सिर्फ गंभीरता लाकर. इसलिए हमें कहना मानना होगा.

(लेख में लेखक के विचार निजी हैं)
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First published: April 8, 2020, 1:34 AM IST
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