प्रवासी मजदूरों के लिए सस्ते आवास कितने जरूरी?

लॉकडाउन (Lockdown) ने भारत में प्रवासी मजदूरों (Migrant Workers) की परिस्थितियों की ऐसी तस्वीरें पेश की हैं, जिसने हमें कई मामलों में हमारी आधारभूत जरूरतों पर सोचने को मजबूर कर दिया है.

Source: News18Hindi Last updated on: July 13, 2020, 2:21 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
प्रवासी मजदूरों के लिए सस्ते आवास कितने जरूरी?
लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों को कई दिक्‍कतों का सामना करना पड़ा.
कोविड-19 की परिस्थितियों ने सभी के लिए एक सुरक्षित घर की अनिवार्यता को स्थापित कर दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबके लिए आवास के अपने महत्वाकांक्षी नारे की समयरेखा 2022 तक तय कर रखी थी. इस योजना के दो साल पहले आए इस कोविड के संकट ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है. इससे निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन ने भारत में प्रवासी मजदूरों की परिस्थितियों की ऐसी तस्वीरें पेश की हैं जिसने हमें कई मामलों में हमारी आधारभूत जरूरतों पर सोचने को मजबूर कर दिया है.

प्रवासी मजदूरों का संकट केवल रोजीरोटी का भी नहीं था. जब उन्होंने दुनिया में अपनी तरह की बीमारी देखी और उसके बारे में यह सुना कि उससे केवल स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण में ही बचा जा सकता है, और उनके मानकों पर खुद की अवस्थाओं पर देखा तो पाया कि इन परिस्थितियों में तो वह बच नहीं सकते हैं. गांवों में एक स्वच्छ वातावरण से शहरों में जाकर वह ऐसी बसाहटों में रहने को मजबूर होते हैं जहां कि हवा पानी का संकट तो होता ही है, एक ही कमरे में कई लोग रहने को मजबूर होते हैं.

आवास से जुड़े संकटों के कारण ही प्रवासी मजदूर अपने परिवारों को चाहकर भी साथ नहीं ले जा पाते, क्योंकि उनकी मजदूरी के अनुपात में शहर में रहने का खर्च उन्हें इस बात की इजाजत नहीं देता है. यह भी तय बात है कि मजदूरों के बिना कोई शहर नहीं चल सकता है, इसलिए कोविड-19 के बाद यदि उनको शहर में वापस लाना है तो उन्हें सस्ते सुविधायुक्त आवास उपलब्ध करवाने की दिशा में भी सोचना पड़ेगा उस पर तेजी से काम करना पड़ेगा.

इस संदर्भ में केन्द्र सरकार के बीस लाख करोड़ के पैकेज में अर्फोडेबल हाउसिंग को शामिल किए जाने की योजना इस वक्त की बहुत बड़ी और जरूरी पहल लगती है. इस योजना को प्राथमिकता में रखते हुए केंद्रीय कैबिनेट ने अर्फोडेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्लेक्सेस योजना को मंजूरी दे दी है. यह योजना प्रधानमंत्री आवास योजना की सब-स्कीम के तहत प्रवासी श्रमिकों और शहरी गरीबों को बहुत कम किराये पर रहने की सुविधा दी जाएगी. इस योजना के तहत कंस्ट्रक्शन वर्कर्स, लेबर्स और प्रवासी मजदूर जैसे असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को किफायती रेंटल हाउसिंग स्कीम के तहत 1,000 से 3,000 रुपये प्रति माह किराए पर लोगों को घर उपलब्ध कराए जाएंगे. इसके लिए सरकार ने 600 करोड़ का फंड भी मंजूर किया है.
रोटी कपड़ा और मकान की आधारभूत जरूरतों के पिछले दशकों में आवास को लेकर कई तरह की योजनाएं आई और बनी. नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के 13 महीने बाद जब देश के शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानमंत्री आवास योजना की घोषणा की उस वक्त भी सभी को आवास दिलाने के मामले में हम कोसों पीछे थे. 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत शहरी आवासों के लिए गठित तकनीकी समूह के मुताबिक इस योजना (वर्ष 2012 से 2017) की शुरुआत में भारत में बुनियादी जरूरतों के साथ 1.88 करोड़ घरों की कमी थी. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में यह कमी 2.47 करोड़ थी. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में तकरीबन 17.72 लाख लोगों के पास अपना घर नहीं था. इस योजना में भी शहरी इलाकों में ही एक करोड़ बारह लाख घरों की जरूरत बताते हुए काम शुरू किया था, लेकिन यह काम एकदम जादुई डंडे से रातोंरात नहीं हो सकता था. इसके लिए सरकार ने खुद छह साल की समयरेखा तय की थी.

नवम्बर 2019 तक के सरकारी आंकड़े के मुताबिक भारत के शहरी क्षेत्रों में जिन 93 लाख आवासों को स्वीकृत किया गया है, उनमें से तकरीबन 28 लाख मकानों को ही पूर्ण करके सौंपा गया है, जबकि 55 लाख मकान अब भी निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं यानी उनका काम अभी अधूरा है. 2001 में शहरी इलाकों में 7.78 लाख बेघर लोग थे, यह संख्या दस साल बाद बढ़ कर 9.38 लाख हो गई, यानि इस बीच शहरों पर लोगों का दबाव बढ़ा है.

कोविड 19 के संकट में अब यदि सस्ते आवास की इस योजना को जल्दी से जल्दी लागू करने की जरूरत है. यह केवल इसलिए जरूरी नहीं है मजदूरों को आवास देना है बल्कि इसलिए भी जरूरी है क्योंकि देश को संक्रमण से भी बचाना है और उद्योग-धंधों और रोजगार को भी सुरक्षित माहौल में आगे बढ़ाया जाना है. महत्वपूर्ण यह भी है कि कितनी तेजी से इस योजना को अमलीजामा पहनाया जाता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग सुरक्षित परिस्थितियों में आ सकें, वह दूसरी बीमारियों से बच सकें ताकि स्वास्थ्य सेवाओं का बोझ भी कम हो सके.शहरों में प्रवासी मजदूरों को इस योजना में भले ही किराये के सस्ते घर मिल जाएं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बेघरबारों का सवाल फिर भी वैसा ही खड़ा रहेगा. ग्रामीण क्षेत्रों में आठ लाख से ज्यादा लोग बेघरबार हैं. सवाल यह है कि कोविड19 के संकट में इन ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए भी क्या कोई योजना लागू की जाएगी या उन्हें त्वरित आवास उपलब्ध करवाया जाएगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं. यह आलेख सीएमएस-बीप नेशनल मीडिया फैलोशिप 2020 के अंतर्गत तैयार किया गया है.)
facebook Twitter whatsapp
First published: July 13, 2020, 2:19 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading