चुनाव के लिए कोविड प्रोटोकॉल को हवा में उड़ाते हमारे नेता! आज गांधी या विनोबा होते तो क्या करते?

पिछले 1-2 महीनों में चुनावी राजनीति ने एक अलग ही विरोधाभास पैदा किया है. इस विरोधाभास ने कहीं संकट को हल्के में लिया. इस विरोधाभास ने सारे कोविड प्रोटोकॉल को हवा में उड़ा दिया. देखने में आया है कि न तो हमारे यहां ठीक से मास्क पहने जाने का पालन हुआ है और न ही शारीरिक दूरी का ख्याल रखा जा रहा है.

Source: News18Hindi Last updated on: April 11, 2021, 2:57 PM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
चुनाव के लिए कोविड प्रोटोकॉल को हवा में उड़ाते हमारे नेता! आज गांधी या विनोबा होते तो क्या करते?
चुनावी रैलियों में जुट रही है भीड़. (Pic- BJP Twitter)
वैसे तो हर वक्त ही प्रासंगिक है, लेकिन मौजूदा संकट में एक नॉन पॉलिटिकल लीडरशिप की बेहद जरूरत है. इसका यह अर्थ नहीं है कि सक्रिय राजनीति या राजनेता के महत्व को कम किया जा रहा है, उनकी अपनी भूमिका है, थी और रहेगी. लेकिन इस वक्त कई कारणों से यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि क्या (खासकर अभी और ऐसा संकटों में) देश में एक स्वतंत्र नॉन पॉलिटिकल लीडरशिप होना चाहिए?

भारत के इतिहास में ऐसे कई नेतृत्व रहे हैं, जिन्होंने सामाजिक बदलाव का बीड़ा उठाया, उनके पीछे जनता का एक बड़ा भरोसा रहा, उन्होंने जो कहा जनता ने उसे हाथोंहाथ लिया. विनोबा भावे को ही लें, विनोबा अगर चाहते तो आजादी के बाद एक पॉलिटिकल पावर के रूप में खुद को स्थापित कर सकते थे, लेकिन इससे इतर उन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए अलग ही रास्ता चुना. भूदान आंदोलन में जिस तरह से जनता ने उन्हें सम्मान दिया और अपनी जमीनों को दान किया, वैसा अदभुत काम इतिहास में कम ही हुआ है! इस रास्ते से विनोबा एक सर्व स्वीकार्य सामाजिक नेता के रूप में निकलकर आते हैं, और कई लोग तो उन्हें गांधी से भी आगे मान लेते हैं.

कल्पना कीजिये इस वक्त गांधी या विनोबा जैसा कोई नेतृत्व होता तो वह इस महामारी के बीच अपनी भूमिका भी कैसे निभा रहा होता?


अब जो स्थिति एक बार फिर बनी है उसमें हमारी लापरवाहियों का भी बड़ा योगदान है. एक बार तो हमें लगा था कि कोविड के चंगुल से मुक्त होकर एक बेहतरीन परिणाम की तरफ बढ़ रहे हैं, लेकिन हम फिर पहले से ज्यादा बड़ी मुसीबत में हैं. यह लहर वायरस के मजबूत हो जाने से ज्यादा हमारी लापरवाहियों से आई है. और इसमें बड़ा रोल चुनावी राजनीति की मजबूरी को भी माना जा सकता है.
कुछ दिन पहले एक जमीनी सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि जब वह गांव में गए और लोगों को सुरक्षा उपाय नहीं अपनाते देख उन्हें टोंका तो उन्होंने जवाब में लगभग डांट ही दिया. उन्‍होंने कहा कि ‘आप यदि ऐसे डराने के लिए हमारे गांव आते हैं तो मत ही आया कीजिए! आप देख नहीं रहे हैं चुनावों में कैसे भीड़ मचाई जा रही है और हमें डराया जा रहा है.' वास्तव में उनकी यह प्रतिक्रिया समाज के एक बड़े वर्ग की प्रतिनिधि प्रतिक्रिया है.

पिछले 1-2 महीनों में चुनावी राजनीति ने एक अलग ही विरोधाभास पैदा किया है. इस विरोधाभास ने कहीं संकट को हल्के में लिया. इस विरोधाभास ने सारे कोविड प्रोटोकॉल को हवा में उड़ा दिया. देखने में आया है कि न तो हमारे यहां ठीक से मास्क पहने जाने का पालन हुआ है और न ही शारीरिक दूरी का ख्याल रखा जा रहा है. निरंतर हाथ धोना तो हमारी आदत में शामिल ही नहीं रहा है, इन सभी सुरक्षा उपायों का पालन करने वालों का प्रतिशत बहुत कम है. जब नेतृत्व खुद ही पालन करता दिखाई नहीं दे रहा हो तो बाकी से क्या उम्मीद करे!

तकरीबन सभी राजनैतिक दलों ने चुनाव जीतने की चाह और मजबूरी में पिछले महीनों में जिस तरह से भीड़ जुटाने का काम किया है, जिस तरह से बचाव के निर्देशों की धज्जियां उड़ाई गईं, उसका एक सही संदेश जनता के मन में नहीं गया है.
ऐसे नाजुक वक्त में रह-रहकर यही लगता है कि सक्रिय राजनैतिक नेतृत्व के अलावा भी देश में ऐसा नेतृत्व होना चाहिए, जिस पर जनता को भरोसा हो. जिसकी बात समाज मानता हो. जिसकी बातों में विशुद्ध अध्यात्म और सत्य का तेज हो. जिसकी मंशा किसी तरह की शक्ति प्राप्त करना नहीं बल्कि समाज परिवर्तन के जरिए देश की दुखी और पीड़ित जनता की जिंदगी में बदलाव लाना हो, ताकि जहां भी ऐसा लगे कि देश सक्रिय राजनीति पर अविश्वास कर रहा है, वहां वह विकल्प के रूप में दिखाई दे. ऐसा इसलिए भी क्योंकि देश के एक बड़े वर्ग में किसी भी दल के प्रति आस्था का अभाव दिखाई देता है. वह विकल्पहीन है.

ऐसा नहीं है कि ऐसे नेतृत्व देश में नहीं हैं या हो नहीं सकते हैं और ऐसा भी नहीं है कि ऐसा कोई एक ही राष्ट्रव्यापी नेतृत्व होना चाहिए, छोटे-छोटे स्तरों पर भी इस कार्य को साधा जा सकता है, लेकिन मौजूदा वक्त ने जिन खांचों में लोगों को बांट दिया है वहां से इसका रास्ता और कठिन दिखाई देता है. जिस तरह का नैरेटिव आज समाज में सेट कर दिया जाता है उसमें या तो वह सत्ता पक्ष में खड़ा दिखाई देता है या उसे उसके खिलाफ करार दे दिया जाता है, पर क्या देश में इससे इतर कोई समाज नहीं हो सकता है जो सिर्फ और सिर्फ दुखी, पीड़ित और हाशियों के लोगों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति सुधारने, उनके मानवीय विकास के बिगड़े हुए मापदंडों को ठीक करने का सपना देखते हों.

देश के कई इलाकों में सामाजिक आंदोलन और उनके नेताओं का अलग दखल है, लेकिन ऐसे आंदोलन अपने अधिकारों और हकों के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं तो स्वाभाविक रूप से वह सत्ताओं से सवाल करते हैं, ऐसे में उनकी छवियां भी विरोधी होने की नजर आती है, पर वास्तव में न तो खिलाफ होते हैं और न ही विकल्प बन सकते हैं, उनकी क्षमताएं बहुत सीमित होती हैं.

गैर सरकारी संस्थाओं की भी इस संकट में बहुत ही सकारात्मक भूमिका हो सकती है, बल्कि उनकी तो अवधारणा ही सरकार और समुदाय के बीच में एक नेतृत्वकारी सकारात्मक भूमिका की होती है, लेकिन पिछले दो दशकों में गैर सरकारी संस्थाओं के लिए काम करने की मुश्किलें बरकरार हैं. धर्मगुरुओं की प्रभावकारी भूमिका हो सकती है, धर्म जब गैर राजनीतिक तरीके से जनता में जाएगा, तो उसकी भूमिका प्रभावी बनेगी, नहीं तो उसे भी पक्ष—विपक्ष के खांचे में रख दिया जाएगा. क्या समाज खुद को बचाने के लिए किसी ऐसे विकल्प पर विचार करेगा. शुरुआत इसी वक्त से हो. सरकार काम कर ही रही है, आईये हम सब भी नेतृत्वकारी भूमिका निभाएं. (यह लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: April 11, 2021, 2:57 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर