अफवाहों को भी ‘सच के वैक्सीन’ की जरूरत

कोविड 19 महामारी हमारे देश में तांडव कर रही है. 130 करोड़ की आबादी वाले भारत में यह 18 साल से ज्यादा उम्र के हर लोगों को लगाई जानी है. बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए भी यह जरूरी होगी और उम्मीद कर सकते हैं कि उनके लिए भी यह जल्द ही मंजूर हो जाएगी.

Source: News18Hindi Last updated on: May 7, 2021, 10:48 PM IST
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अफवाहों को भी ‘सच के वैक्सीन’ की जरूरत
वैक्सीन ही नहीं, पिछले साल कोविड की पहली लहर में भी हमने कितनी तरह की अफवाहों को झेला था. (सांकेतिक तस्वीर)
साबित हो रहा है. हमने कम समय में टीके का उत्पादन भी कर लिया, पर केवल उत्पादन ही काफी नहीं होगा, हमारे यहां एक और संकट है कि हर आदमी इस वैक्सीन को लगवाए. सरकारें भले ही अखबारों के पहले पन्नों पर भर—भर विज्ञापन दे रही हो, लेकिन अफवाहों के कदम उनसे तेज चलते हैं. गांव—गांव और शहरों में भी वैक्सीन को लेकर बीसियों तरह की भ्रांतियां चल रही हैं. पिछले कुछ दिनों की इन अफवाहों पर गौर करें-

• वैक्सीन लगवाने से मृत्यु हो जाती है.
• वैक्सीन लगवाने से बुखार चढ़ जाता है, और कोरोना हो जाता है.
• कुत्तों वाले इंजेक्शन लगा देते हैं और हमारी किडनी निकाल लेते हैं.
• अविवाहित लोगों को वैक्सीन नहीं लगवाना है, इससे बांझ हो जाते हैं. यह जनसंख्या कम करने का एक तरीका है.
• किसान आंदोलन ने साबित किया है कि कोरोना महामारी नहीं है, बल्कि यह वैक्सीन से जनसंख्या नियंत्रित करने का एक षडयंत्र है.
• डायबिटीज होने पर वैक्सीन नहीं लगवाएं, वरना यह बुरा प्रभाव डालेगी.• वैक्सीन लगवाने से मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ सकती है.
• शराब, सिगरेट के शौकीन लोगों को वैक्सीन लगवाने पर कैंसर होने का खतरा बढ़ जाएगा.
• जिन्हें कभी श्वसन तंत्र से संबंधित बीमारी जैसे निमोनिया, दमा आदि है उनकी वैक्सीन लगवाने से मौत हो जाएगी.
• कोविड हो जाने के बाद टीके की जरुरत नहीं होती
• कोविड वैक्सीन का पूरी तरह से ट्रायल नहीं किया गया है.
• वैक्सीन नहीं लेना चाहिए, उसमें सुंअर का मांस मिलाया गया है.
• वैक्सीन में चिप लगा हुआ है जिससे आपके दिमाग को नियंत्रित किया जाएगा.
• कोरोना की वैक्सीन मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने से रोकने की साजिश है.
• कोरोना वैक्सीन नहीं लगवाई तो सरकार हमारी पेंशन बंद कर देगी.
• कोरोना वैक्सीन नहीं लगवाई तो हमारा सरकारी राशन बं.द हो जाएगा
• वैक्सीन से खून के थक्के जम सकते हैं.
• महिलाओं को मासिक धर्म के समय टीका नहीं लगवाना चाहिए.
• इन सभी भ्रांतियों का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है. यह सब सुनी—सुनाई बातें हैं जो व्हाट एप्प के माध्यम से दूर गांव—गांव तक फैल रही हैं.

भारत में बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम एक अरसे से चलाया जा रहा है. इस टीकाकरण कार्यक्रम में कई तरह के टीके शामिल हैं जो बच्चों को कई गंभीर बीमारियों से बचाते हैं. इससे देश में बाल और शिशु मृत्यु दर में भारी कमी आई है. अध्ययन बताते हैं कि संपूर्ण टीकाकरण से देश में होने वाली बच्चों की मृत्यु को 65 फीसदी तक कम किया गया है. इसके लिए गांव—गांव में सरकार ने निशुल्क व्यवस्था भी की है, इसके बावजूद आज तक देश में बच्चों का संपूर्ण टीकाकरण नहीं हो पाया है.
बच्चों के टीकाकरण की दर अटकी हुई है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के चौथे चक्र में 62 प्रतिशत बच्चों को ही सभी टीके लगे थे. नेशनल हैल्थ मैनेजमेंट सिस्टम के मुताबिक 18—19 तक यह प्रतिशत बढ़कर 87 प्रतिशत तक आया था, लेकिन इसके बावजूद 13 प्रतिशत बच्चे या यानी तकरीबन 34 लाख बच्चे पूर्ण टीकाकरण से वंचित थे.

कोविड 19 महामारी हमारे देश में तांडव कर रही है. 130 करोड़ की आबादी वाले भारत में यह 18 साल से ज्यादा उम्र के हर लोगों को लगाई जानी है. बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए भी यह जरूरी होगी और उम्मीद कर सकते हैं कि उनके लिए भी यह जल्द ही मंजूर हो जाएगी. पर चुनौती केवल मंजूरी भर की नहीं है. हर आदमी वैक्सीन लगवाए इसके लिए वैक्सीन के प्रति जागरुक करना भी उतना ही जरूरी है. वैक्सीन ही वह जरिया है जिसके माध्यम से हम खुली हवा में सांस लेने की हिम्मत कर सकते हैं. लोगों को यह भी समझना चाहिए कि वैक्सीन केवल उनके लिए ही जरूरी नहीं है, उनके आसपास के लिए भी जरूरी है, नहीं तो वायरस किसी ने किसी रूप में लम्बे समय तक जीवित रहेगा.

जिन देशों ने वैक्सीन को अपनी पहली प्राथमिकता में रखा और वहां के समाज में हमारे यहाँ जैसी अफवाहें नहीं फ़ैली, सरकार ने बजट का एक बड़ा हिस्सा वैक्सीन पर खर्च किया और लोगों ने भी उसे हाथों हाथ लिया. उन देशों में अब लोग मास्क उतारने की हिम्मत कर रहे हैं, सरकार ने वहां प्रोटोकाल को शिथिल किया है. भले ही वह आबादी में हमसे कम हैं, लेकिन वे बताते हैं कि महामारी का एक ही इलाज है और वह है टीकाकरण. क्या हम ऐसा सोच सकते हैं ?

वैक्सीन ही नहीं, पिछले साल कोविड की पहली लहर में भी हमने कितनी तरह की अफवाहों को झेला था. सांप्रदायिक आधार पर घृणा की लहर भी तमाम जगहों से उठती रही. लेकिन बीते सवा साल में हमने उन तमाम अवधारणााओं को खारिज होते देखा है. दशकों से जिन मान्यताओं को हम पालकर बैठे थे, वह सारी मान्यताएं कोविड की आंधी में ध्वस्त हो गई हैं, लेकिन इस पर भी आश्चर्य है कि अब भी समाज में ऐसे लोग हैं जो इतने बड़े खतरे के बावजूद फिर उसी कोशिश में है. उनका विज्ञान से नाता क्यों नहीं जुड़ पा रहा है ? इस स्थिति में हमें एक सोशल वैक्सीन की भी जरुरत होगी, अब तक की इस लड़ाई में सरकार ने पूरा जिम्मा केवल अपने उपर रखा है, उसमें समाज के प्रबुद को कायदे से शामिल नहीं किया गया है. अब जबकि तीसरी लहर के आने की आशंका भी बढ़ गई है तब देश के गांव—गांव में कोरोना वारियर्स बनाए बिना यह लड़ाई और कठिन होती जाएगा. जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ टी सुंदररामन इसका एक सहज फार्मूला तीन बिंदुओं में बताते हैं. उनके अनुसार तीसरी लहर को रोका जा सकता है बशर्ते उसकी निगरानी का बेहतरीन सिस्टम बने, समाज की भागीदारी को व्यवस्थित रूप से बढ़ाया जाए और वैक्सीनेशन पर बहुत अधिक ध्यान हो.

हमें अपने स्वास्थ्य और इस महामारी पर कम से कम इतना तो संवेदनशील होना चाहिए कि कोई आपके घर आपके घर, परिवार के स्वास्थ्य की खातिर टीका लगवाने की बात कहने आए और बदले में आप उसपर गालियां, पत्थर न बरसाएं. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: May 7, 2021, 10:48 PM IST
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