कोविड-19 के बाद आत्मनिर्भरता ही सबसे बेहतर रास्ता!

अजीब संयोग है कि पिछले सदी के दूसरे दशक के अंत और तीसरे की शुरूआत में जब भारत स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था तब गांधी ने स्वदेशी की अवधारणा को एक पुख्ता रूप में सामने रखा था. अब ठीक सौ साल बाद एक वायरस की परिस्थितियों ने एक बार फिर आत्मनिर्भरता शब्द को बहुत जोरदार ढंग से उबारा

Source: News18Hindi Last updated on: May 13, 2020, 3:50 PM IST
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कोविड-19 के बाद आत्मनिर्भरता ही सबसे बेहतर रास्ता!
गांधी का कहना था कि स्वदेशी का मतलब उनके लिए यह है कि भारत की जरूरत भर का कपड़ा तैयार करना
चौथे लॉकडाउन (Lockdown 4) की बात कहते हुए अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने जिस आत्मनिर्भरता शब्द पर सबसे ज्यादा जोर दिया, यदि उसे दूसरे पर्यायवाची के रूप में स्वदेशी समझें तो भारत में यह कोई नई बात नहीं है. स्वदेशी को लेकर एक लंबा संघर्ष और निर्माण है, जिसे हम गांधी और उससे पहले भी हुए आंदोलनों से समझ सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी ने भी शुरुआत में इस शब्द पर बहुत ज्यादा जोर दिया. डंकल प्रस्ताव का विरोध किया. हालांकि इस सैधांतिक बात को पिछले दशकों में व्यावहारिक रूप से कोई खास तवज्जो नहीं दी, खासकर आर्थिक उदारीकरण और खुले बाजार की नीतियों के बाद तो यह शब्द जैसे हाशिए पर ही चला गया.

आज जब देश केवल कोविड-19 (Covid-19) संक्रमण के कारण एक अजीब तरह के संकट में आकर खड़ा हो गया है और लॉकडाउन ने भारतीय अर्थव्यवस्था और जनजीवन की बुनियाद हिलाकर रख दी है. ऐसी परिस्थिति में आत्मनिर्भर होने के अलावा हमारे पास कोई और विकल्प है भी नहीं. इस आत्मनिर्भरता की बात प्रधानमंत्री ने इससे पहले दिए गए भाषण में भी की और इस बार तो और भी ज्यादा बार की, एक योजना के साथ की, यानी लगातार इस बीच जो चिंतन रहा है वह स्वदेशी आत्मनिर्भर व्यवस्था के इर्द-गिर्द रहा है, यह बहुत बुनियादी सोच हो सकती है और भारत के पुनर्निर्माण का रास्ता भी हो सकता है. बशर्ते इसमें विकास को भी शहर से गांव की तरफ न देखते हुए गांवों से शहरों की तरफ देखा जाए.

अजीब संयोग है कि पिछले सदी के दूसरे दशक के अंत और तीसरे की शुरूआत में जब भारत स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था तब गांधी ने स्वदेशी की अवधारणा को एक पुख्ता रूप में सामने रखा था. अब ठीक सौ साल बाद एक वायरस की परिस्थितियों ने एक बार फिर आत्मनिर्भरता शब्द को बहुत जोरदार ढंग से उबारा, जबकि इन सौ सालों में बहुत मौका होने के बाद भी हम वैसा नहीं कर पाए जिसकी जरूरत थी. जो गांधी की सोच थी. गांधी ने अंग्रेज गर्वनर के सहायक एमपी काम्बी को एक लंबा पत्र लिखकर स्वदेशी के बारे में अपने विचार और उन विचारों के पीछे तर्क भी प्रस्तुत किए थे.  उस पत्र में गांधी का कहना था कि स्वदेशी का मतलब उनके लिए यह है कि भारत की जरूरत भर का कपड़ा तैयार करना और उसका समुचित वितरण करना. इसमें घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना और लोगों को यह शपथ लेने के लिए राजी करना कि वह स्वदेशी ही पहनेंगे. और जितने विदेशी वस्त्र हों उन्हें जरूरत होने पर पहनते रहें, उन्हें एकदम खारिज न करें.

इसके आगे उनकी सोच थी कि स्वदेशी केवल आर्थिक और धार्मिक पहलुओं तक सीमित न रहे. वह उसमें उच्च नैतिक स्तर के राजनैतिक परिणामों की संभावनाएं भी देख रहे थे, जो उस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत थी. फिर गांधी ने सत्य का प्रयोग में भी स्वदेशी पर लिखा है ‘स्वदेशी मेरी श्रदधा है, क्योंकि उसके द्वारा हिंदुस्तान के भूखों मरनेवालों, अर्ध-बेकार स्त्रियों को काम दिया जा सकता है. जो वह कातें उस सूत को बुनवाना और वह खादी लोगों को पहनाना यह मेरी भावना है और मेरा आंदोलन है.‘
क्या आज फिर देश ऐसे किसी आंदोलन की मांग कर रहा है. अब की चुनौतियां तो और भी अधिक हैं, क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्थाएं अब अपने चरम पर हैं. बाजार ने खुद को इतना अधिक मजबूत, दमदार और समाज के भीतरी आवरण तक खुद को धंसा लिया है, कि उसमें ऐसे किसी भी आंदोलन की सफलता की संभावना सौ साल पहले के भारत से बेहद कमजोर साबित होंगी. ऐसी आत्मनिर्भरता त्याग, समर्पण और एक वास्तविक देश प्रेम मांगेगी, क्या हम एक नए आत्मनिर्भर भारत के लिए इतना कुछ करने को तैयार होंगे.

वास्तव में ऐसा करना होगा, क्योंकि कोई बिना अर्थशास्त्र पढ़ने वाला व्यक्ति भी लॉकडाउन के असर को देखते हुए यह समझ गया है कि देश में कोविड के अलावा अर्थव्यवस्था का भी एक संकट मुंह फैला रहा है. आने वाले दिनों में केवल भारत की ही नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाने की पूरी-पूरी संभावना है और ऐसे वक्त में कोई भी देश किसी दूसरे देश की वैसी मदद करने में भी खुद को सक्षम नहीं पाएगा, इसका सीधा सा अर्थ यही है कि हर किसी को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी है. अपने संसाधनों का सोच-समझकर इस्तेमाल करना है. एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जहां गरीबों पर गरीबी का कम से कम असर पड़े, कम से कम नौकरियां जाएं और इस संकट के बाद जो पुनर्निर्माण हो उसका ज्यादा से ज्यादा फायदा देश के खाते में जाए.

आज के वक्त में तो यह और संभव इसलिए भी है क्योंकि देश लोगों के लिए सर्वोपरि है, राष्ट्रवाद की भावना चारों ओर बह रही है और उसका ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व कर रहे हैं नरेन्द्र मोदी. मोदीजी ने गांधी के चश्मे से स्वच्छता को ऐतिहासिक रूप से एक मुद्दा बना दिया, गांव-गांव में शौचालय स्थापित भी हो गए, क्या स्वच्छता से एक कदम आगे बढ़ाकर अब आत्मनिर्भरता को नए संदभों में देखा जाना चाहिए.ये भी पढ़ेंः-
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First published: May 13, 2020, 3:45 PM IST
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