शेरनी: विकास की उलटबांसी सामने लाती फिल्म

शेरनी ड्रामा नहीं परोसती, वह वास्तविकता के ज्यादा करीब है, इसे न तो डाक्यूमेंट्री कह सकते हैं, न यह विशुद्ध कला फिल्म है और न ही व्यावसायिक नजरिए से बनाई गई लगती है. इन तीनों ही विधाओं के मिश्रण का यह एक नायाब नमूना है और निर्माण के दृष्टि से इसे एक नए किस्म का सिनेमा भी करार दे सकते हैं, जिसमें इन तीनों तरीकों का मिश्रण है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 23, 2021, 10:55 AM IST
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शेरनी: विकास की उलटबांसी सामने लाती फिल्म
शेरनी फिल्म जंगलों से सटे हुए गांवों की वास्तविक परिस्थिति को सामने ला रही है.
नजीओमार्का सेमिनार—संगोष्ठियों में होती आई विकास की बहसों को सिनेमा पर लाना वाकई हिम्मत का काम है! हालिया रिलीज ‘शेरनी’ हमें विकास की उलटबांसी से रूबरू कराती है. वह भी तब जब विकास नामक गुब्बारा खूब फल-फूल रहा है और उस पर बड़ा वर्ग गफलत में है. वह नहीं जानता है कि जिस विकास से वह गलबहियां कर रहा है, उसका एक और स्याह पक्ष भी है. विकास की कीमत कितनी भारी होती है और इसकी बलि पर आखिर कौन लोग चढ़ जाते हैं, वह सामने ही नहीं आ पाता है.

स्टार अदाकारा विद्या बालन और अन्य कलाकारों के बेहतरीन अभिनय से सजी हुई यह फिल्म भारतीय समाज में गहरे तक पैठे लिंगभेद को भी सामने रखती है. साथ ही, यह सवाल करती है कि एक स्त्री शेरनी की हद तक भी मजबूत हो जाए, तो भी उसे उपेक्षित व्यवहार का शिकार होना ही पड़ता है. इसलिए यह फिल्म केवल पर्यावरण और विकास का सवाल ही नहीं है, वह मानवीय विकास के मानकों को भी सामने लाने का काम करती है.

शेरनी ड्रामा नहीं परोसती, वह वास्तविकता के ज्यादा करीब है, इसे न तो डाक्यूमेंट्री कह सकते हैं, न यह विशुद्ध कला फिल्म है और न ही व्यावसायिक नजरिए से बनाई गई लगती है. इन तीनों ही विधाओं के मिश्रण का यह एक नायाब नमूना है और निर्माण के दृष्टि से इसे एक नए किस्म का सिनेमा भी करार दे सकते हैं, जिसमें इन तीनों तरीकों का मिश्रण है.

जंगलों से सटे हुए गांवों की वास्तविक परिस्थितियां
फिल्म में जंगलों से सटे हुए गांवों की वास्तविक परिस्थिति को सामने लाते है. यहाँ एक शेरनी (असल में बाघिन) आदमखोर हो जाती है, वह कुछ जानवरों और मनुष्यों को मार देती है. इस शेरनी को फिल्म में चालाक बताया जाता है,( हालांकि अपनी और अपने शावकों की रक्षा करना चालाकी नहीं हो सकती.) वन विभाग के तमाम उपायों के बाद भी वह पकड़ में नहीं आ पाती और जब उसके पकड़ने की गुंजाइश बनती भी है तो राजनीति बीच में आ जाती है.

चूंकि, नेताओं को चुनावों में अपनी—अपनी दाल गलानी है तो वह इस गांवों में शेरनी के आ जाने की दहशत को बने ही रहना देना चाहते हैं. दूसरे नेता उसे शिकारी के हाथों मरवाकर लोगों के मसीहा बनना चाहते हैं. दूसरी तरफ वन विभाग का सालों साल से चलता भ्रष्टाचारी रवैया है, जिसमें गलती से एक ईमानदार अफसर है, जो नियम और कानूनों को कागजों पर नहीं जमीन पर देखना चाहता है. उसकी संवेदना उन प्रभावित लोगों से भी है, जंगल से भी और जानवर से भी.

देश के जंगलों में अकूत धनसंपदा भरी पड़ी है, खनिज भंडार हैं, कोयला है, जानवर हैं, पर मनुष्य ने यह मान लिया है कि जंगल तो उनका है, यह पूरी धनसंपदा उनकी है और इस पर केवल उनका हक है. इसलिए पिछले सौ—पचास सालों में अंधाधुंध दोहन किया है. इसकी मार सबसे ज्यादा जानवरों ने झेली है और उन जानवरों के साथ उन मनुष्यों ने जो प्रकृति के साथ सहजीवन की अवधारणा के साथ रहते चले आए हैं.
इसका असर यह हुआ है कि जंगल का दायरा लगातार छोटा होता चला गया है, जानवर और प्रकृति के साथ रहने वाले मनुष्यों का जीवन कठिन होता चला गया है, जब विकास नाम की चिड़िया आ जाती है तो इन स्थानीय समुदाय को उनका शत्रु मान लिया जाता है, उनके जंगल पर से अधिकारों को खत्म कर दिया जाता है, इस सवाल को फिल्म बखूबी सामने लाती है. और अंत में एक किरदार वह भी है जो शेरनी की मौत को ही समस्या का हल मानता है, और ज्यादा से ज्यादा शिकार करके उसका गुणगान करना उसका शगल है. सिस्टम भी इस मारने वाले को और मार डालने की अवधारणा का सहयोग करता है, क्योंकि वह सबसे आसान रास्ता है.

अंग्रेजों ने यहीं से किया था दोहन का रास्ता प्रशस्त
यह फिल्म मध्यप्रदेश में बनी है. मप्र के पचमढ़ी में ही अंग्रेजों ने वन विभाग का पहला आफिस खोलकर कानून के जरिए वनों के दोहन का रास्ता प्रशस्त किया था. बायसन लॉज नामक वह इमारत आज भी मौजूद है. अंग्रेजों के जाने के बाद भी कानून कमोबेश वैसे ही रहे हैं, और आज भी अकूत संपदा को वैध और अवैध तरीके से रातदिन उलीचा जा रहा है. फिल्म में बालाघाट की उन कॉपर माइंस खदानों को दिखाया गया है, जो शेरनी के लिए सुरक्षित जगह जाने में गहरी खाई बन गई हैं.

मुझे भी उन माइंस में जाने का मौका मिला है. सवाल फिल्म् में दिखाए गए जंगली जानवरों का ही नहीं है, आसपास बसे गांवों में भी यह किस तरह की समस्याएं पैदा करती हैं, इसे मैंने अपनी आंखों से देखा है, जंगलों के बीच रेगिस्तान कैसे बन जाता है, इसे भी वहां पर देखा है लेकिन जब आप इस पर सवाल करते हैं तो आपके विकास विरोधी करार दिए जाने का खतरा हो जाता है. पर क्या कभी यह ईमानदारी से सोचा जाता है कि इन विकास परियोजनाओं में जितना पर्यावरण और स्थानीय लोगों का हुआ है उसके बदले उन्हें क्या वाकई एक बेहतर जिंदगी मिली. अनुभव अच्छे नहीं है.

आज जब मध्यप्रदेश में हीरा खनन के लिए एक दूसरे बड़े जंगल बक्सवाहा के कटने का विरोध हो रहा है, तो उसकी वजह भी यही है कि लोगों के मन में यह विश्वास ही पैदा नहीं हो पाया है कि जितना काटा जाएगा, उससे दोगुना—चौगुना रोप भी दिया जागा. हजारों साल पुराने पेड़ों को काटकर उनकी क्षतिपूर्ति यदि कनेर के पौधे से की जाए, तो यह भला कैसे न्याय होगा. रहवासियों को उजाड़कर उन्हें मंगल गृह की तरह की जमीनों पर बसाया जाएगा, जैसा कि हमने हरसूद शहर को देख था, तो भला कैसे विरोध नहीं होगा.


अनुभव अब तक यही कहानी कहते हैं, देश में जितनी भी विकास परियोजनाएं बनाई गई हैं उन परियोजनाओं से प्रभावित लोगों का एक भी बेहतर मॉडल अब तक नहीं बन पाया है, बलिदानियों के हिस्से में कोई खुशहाली का उत्साह कहीं भी नहीं दिखाई देता है और जब परिस्थितियां इतनी ज्यादा खराब हैं तो हम फिर आखिर उस विकास के मॉडल को बदलते क्यों नहीं है, जिससे मनुष्य को भी खतरा है और शेरनी को भी.

इस खतरे से बचने और बचाए जाने की तमन्ना सभी के मन में जागती है. कुदरत से हर व्यक्ति की भावना जुड़ती है, इसलिए हर कोई यही चाहता है कि शेरनी की जान बचे, जंगलों की जान बचे, कुछ कमाल हो, लेकिन ऐसा चाहने वालों के लिए यह फिल्म कोई नाटकीयता पैदा नहीं करती. वह बताती है कि वास्तव में इस मोर्चे पर अन्याय का पलड़ा भारी है. फिल्म देखकर यदि सचमुच यह चाहेंगे कि शेरनी और जंगल की जान बचे तो इसके लिए समाज को साहस दिखाना होगा.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: June 23, 2021, 11:25 AM IST
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