पराली संकट: अपने ही खेतों को जलाने की मूर्खता

हरित क्रांति का असर यह हुआ कि रबी फसल में गेहूं और चना और खरीफ में काला सोना यानी सोयाबीन की फसल बड़े पैमाने पर ली जाने लगी. इसने इस जिले की तस्वीर बदल दी.

Source: News18Hindi Last updated on: April 3, 2021, 12:55 PM IST
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पराली संकट: अपने ही खेतों को जलाने की मूर्खता
सस्ते में खेतों को साफ करने का यह विनाशकारी मॉडल देश के अन्य इलाकों की फिजा खराब करने की राह पर बढ़ रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock)
दूर-दूर तक खेतों से उठती आग की लपटें, फिजा में फैला धुआं, एक काली भयावह चादर. जो खेत महीने भर पहले पूरे हरेपन में नहाए थे, जिन्हें देखते आंखें थकती नहीं थीं. बढ़ती गर्मी से यह हरा रंग सुनहरे में बदलता गया, एक तोहफे की तरह खेतों की मिट्टी, पानी, नमी ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर अनुपम उपहार भेंट किया, बदले में उसे बिना देर किए जला दिया गया. उसे दो दिन का आराम भी न करने दिया. पल भर में वही खेत धधक-धधक कर जल गए. मिट्टी ओढ़कर बैठे जाने कितने जीवों को जलाकर मार डाला. चिड़ियों के घर जल गए. पशु-पक्षी भय में इधर-उधर दौड़ गए. शुक्र है पिछले साल की तरह कोई मनुष्य के जिंदा जलने की खबर इस साल नहीं आई, हां कोशिश में कमी नहीं थी.

लालच मनुष्य को किस तरह से अंधा बना देता है कि वह अपना और कुदरत का अच्छा बुरा भी नहीं सोचता, यह उसी की एक कहानी है. मध्यप्रदेश के जिस जिले से मैं आता हूं उसे एमपी का पंजाब कहते हैं. और सचमुच है भी. उत्पादन के मामले में नर्मदा किनारे की यह मिट्टी पंजाब के किसी भी जिले को टक्कर देती है. हरित क्रांति के बाद सत्तर के दशक में जिले में तवा बांध बन जाने के बाद नहरों का जाल बिछा. पानी उपलब्ध होने से पूरा फसल चक्र बदल गया. पहले यहां वर्षा आधारित खेती थी. बीसियों किस्म के अनाज पैदा होते थे. इनमें ऐसे मिलेटस भी शामिल थे, जो आजकल बिगड़ी जीवनशैली और खानपान को सुधारने के लिए सुझाए जाते हैं.

हरित क्रांति का असर यह हुआ कि रबी फसल में गेहूं और चना और खरीफ में काला सोना यानी सोयाबीन की फसल बड़े पैमाने पर ली जाने लगी. इसने इस जिले की तस्वीर बदल दी. बंपर सोयाबीन पैदा हुआ, गेहूं भी. धीरे-धीरे खेतों से चना गायब हो गया. सोयाबीन की फसल भी लगातार कई सालों तक खराब होती रही, उत्पादन घटा और कई ऐसी रिपोर्ट भी आईं जिसमें बताया गया कि सोयाबीन के कारण जमीन बंजर हो रही है. कुछ सालों में सोयाबीन की जगह धान ने ले ली.

एक और पैटर्न शुरू हुआ और वह है गर्मी में मूंग की फसल का. यह फसल तकरीबन दो महीने में तैयार हो जाती है. अब इस जिले मुख्य रूप से चार ही फसलें बची हैं, गेहूं, धान, सोयाबीन और मूंग. बाकी सारे अनाज इस सर्वाधिक उपज वाले जिले से गायब हैं. उत्पादन तो बड़ा लिया, लेकिन पोषण घटा लिया.
यह पृष्ठभूमि इसलिए क्योंकि जमीन और पर्यावरण का जो संकट पैदा हो रहा है वह इससे जुड़ा हुआ है. दरअसल गेहूं की फसल पकने-कटने और मूंग की फसल का बो देने के बीच अब किसान के पास इतना भी समय नहीं है कि वह अपने खेत में गेहूं की नरवाई जलाने के अलावा भी कुछ कर सके. लेकिन इसका खतरा इतना बड़ा है कि नरवाई की इस आग में इस जिले में पिछले साल 12 लोग जिंदा जल गए थे और सैकड़ों एकड़ खड़ी फसल भी स्वाहा हो गई थी. इस साल भी अब तक सात सौ एकड़ से ज्यादा खड़ी फसल जलने की रिपोर्ट अखबारों में आ चुकी है.

ऐसा नहीं है कि नरवाई जलाने का काम पहले से नहीं होता रहा है. पराली जलाने का संकट कितना बड़ा है इसे हम दिल्ली की फिजा में भी देख ही चुके हैं. देश के अलग-अलग हिस्सों में जहां गेहूं बोया जाता है वहां खेतों को साफ करने का सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाला तरीका भी यही है. माचिस की एक तीली से जब काम हो रहा हो तो दूसरे तरीके पर जाएं भी क्यों ?

पर यह संकट केवल किसान अपने लिए ही पैदा नहीं करता है. दिल्ली में इसके खतरनाक संकट को हम देख चुके हैं जब खुली हवा में ही लोगों की आंखों में जलन पैदा होने लगी थी. सफर पोर्टल, सिस्टम आफ एयर क्वालिटी एंड व्हेदर फॉरकॉस्टिंग एंड रिसर्च, भारतीय मौसम विज्ञान संस्थान पुणे ने बताया था कि अक्टूबर-नवम्बर 2019 में दिल्ली में पीएम 2.5 स्तरों में 2 से लेकर 44 प्रतिशत तक का योगदान पराली जलाने का था. इससे बचने के लिए उत्तर भारत क चार राज्यों पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश और एनसीआर में सरकार ने तमाम तरह के कदम उठाए. एक स्तर पर ऐसी मशीनों पर पचास से लेकर अस्सी प्रतिशत तक की भारी रियायत दी गई, इसके लिए अब तक तीस हजार से ज्यादा कस्टम हायरिंग केन्द्र की स्थापना की जा चुकी है.एक लाख से ज्यादा मशीनें अवशेष प्रबंधन के लिए किसानों को दी गई हैं. इस योजना पर तीन सालों में अब तक तकरीबन 1726 करोड़ रुपए भी खर्च किए जा चुके हैं. इसके साथ ही जो किसान पराली नहीं जला रहे हैं. उनके लिए मुआवजा या अतिरिक्त सहायता राशि भी दी जा रही है. इससे पर्यावरण में भले ही बहुत सुधार नहीं हुआ हो, लेकिन आग की घटनाओं में 30 प्रतिशत तक की कमी आई है.

सस्ते में खेतों को साफ करने का यह विनाशकारी मॉडल देश के अन्य इलाकों की फिजा खराब करने की राह पर बढ़ रहा है. इसका उपाय एक सामूहिक पर्यावरणीय और मानवीय चेतना और उससे ज्यादा संवेदना से ही आ सकता है. जानकारी तो भरपूर है. उसके नुकसान भी पता है. प्रशासन भी फार्मिलिटीज कर लेता है, सरकार ने एमपी में भी धान या गेहूं की नरवाई को जलाना प्रतिबंधित किया हुआ है, ऐसा करते पाए जाने पर पंद्रह हजार रुपए तक का जुर्माना भी लगाया है. लेकिन अंतत: होता कुछ नहीं है, क्योंकि आदेश एक्शन में नहीं आ पाते. जरुरत इस बात की है कि सरकार ने पराली संकट को दूर करने के लिए जो कदम उठाए हैं, उन्हें वह अन्य इलाकों में भी लागू करे. ऐसे किसानों को प्रोत्साहित करें जो अपने खेतों को जलाने की भेड़चाल में शामिल नहीं हैं. यह संकट केवल खेत का संकट नहीं है, यह धरती का संकट है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: April 3, 2021, 12:55 PM IST
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