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कोरोना से चेतो, पर इन महाबीमारियों पर भी ध्यान दो !

बहुत अच्छी बात है कि कोरोना वायरस के प्रति समाज में त्वरित चेतना आई. लोगों ने फटाफट मास्क पहन लिए,...

Source: News18Hindi Last updated on: April 13, 2020, 3:02 PM IST
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कोरोना से चेतो, पर इन महाबीमारियों पर भी ध्यान दो !
कोरोना वायरस से बचाव करें लेकिन बाकी कई गंभीर बीमारियों पर भी ध्यान दें
बहुत अच्छी बात है कि कोरोना वायरस के प्रति समाज में त्वरित चेतना आई. लोगों ने फटाफट मास्क पहन लिए, परीक्षाओं के वक्त स्कूल कॉलेज में छुट्टी हो गई, सिनेमाघर बंद हो गए. देश में संभवत: पहली दफा ऐसा बेहतरीन ऐहतियात नजर आया. मीडिया भी इसको खूब रिपोर्ट कर रहा है. कोरोना के प्रति जागरूकता संदेशों में कई सेलेब्रेटी भी शामिल हुए. एक वायरस के प्रति यह प्रदर्शन अभूतपूर्व है, सराहनीय है. यह लेख लिखे जाने तक हिंदुस्तान में केवल दो व्यक्ति इसके चलते मौत का शिकार हुए हैं. जबकि पीड़ितों की संख्या फिलहाल 110 के आसपास है.

इसके बरक्स देखें तो 2016 से लेकर 2018 तक की अवधि में टयूबरकुलोसिस से देश में तकरीबन सत्तावन लाख पीड़ित हुए हैं. इन पीड़ितों में से तकरीबन एक लाख अस्सी हजार लोग मारे गए हैं. यानी हर दिन 179 लोग अकेले टीबी से दम तोड़ रहे थे.

कैंसर जैसी बीमारी ने भी हिंदुस्तान में भयंकर कहर ढाया है, हालांकि इसे गैर संक्रामक बीमारियों की श्रेणी में रखा गया है. यह एक—दूसरे से नहीं फैलती है, लेकिन जिस तरह से हमारा खानपान दूषित हो रहा है और खतरनाक रसायनों और कीटनाशकों का प्रयोग खेती—बागवानी में बढ़ा है, उससे यह अब और भी खतरनाक रोग होता जा रहा है, पीबीसीआर की रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2016 में साढ़े चौदह लाख, 2017 में पंद्रह लाख से ज्यादा और 2018 में भी इतने ही मामले सामने आए, जबकि कैंसर के कारण इन्हीं तीन सालों में हिंदुस्तान के अंदर 23 लाख से ज्यादा लोग मारे गए.

तकरीबन 22 लाख लोगों को मच्छर के काटने से मलेरिया हुआ और चार लाख लोग खतरनाक डेंगू से भी पीड़ित हुए. देश में चिकनगुनिया के हर साल साठ हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए जा रहे हैं. निमोनिया और डायरिया दो ऐसी बड़ी बीमारियां हैं, जिन पर अब भी पूरी तरह नियंत्रण नहीं हो पाया है, देश में नवजात शिशु दर, अंडर फाइव बच्चों की मृत्यु दर का यह सबसे बड़ा कारण है.
जब इन आंकड़ों और कोरोना वायरस के आंकड़ों पर नजर डालते हैं तो लगता है कि देश में पहले से मौजूद भयंकर जानलेवा बीमारियों के आगे यह कुछ भी नहीं है, फिर अचानक हमारा समाज, सरकार और पूरा तंत्र कैसे इसके प्रति सावधान हो जाता है, और सालों—साल से समाज में घर किए बैठी इन बीमारियों की तरफ कैसे इतना ध्यान नहीं जाता है.

क्या यह इसलिए है क्योंकि कोरोना एक वैश्विक संकट बनकर उभर रहा है और उसका वायरस किसी की आर्थिक स्थिति देखकर हमला नहीं बोल रहा है, वह हवाई जहाज से लेकर लोकल बसों तक में उसी समानता से हो सकता है, लेकिन टीबी जैसी बीमारी है जो गरीब सहरिया आदिवासियों और भूखे या आधे पेट लोगों का शिकार सबसे पहले बनाती है, या डायरिया जो साफ पानी नहीं मिल पाने के कारण कुपोषित बच्चे को मार डालता है.

लिखने का आशय कोरोना वायरस के प्रति असावधान हो जाना बिलकुल भी नहीं है, बल्कि इस सावधानी के बहाने उस पूरे विमर्श को छेड़ना है जहां कि गरीब और पिछड़े भारत की बीमारियां किसी खबर का, किसी आंदोलन का या किसी चेतना का विषय नहीं बन पाती हैं. लोग चुपचाप दम तोड़ते रहते हैं, उनका उचित इलाज भी नहीं मिल पाता. इलाज करवाने में उनकी आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जाती है, वह कर्ज में डूब जाते हैं, ऐसी परिस्थितियों को दूर करने के लिए जरूरी है कि जैसी चेतना समाज कोरोना वायरस के प्रति दिखा रहा है, उसी स्तर पर जाकर समाज की दूसरी घातक बीमारियों के बारे में भी सोचे, उन पर बात करे.दुनिया संभवत: इसलिए भी इसको लेकर इतनी गंभीर है क्योंकि उन समाजों में इन दूसरी बीमारियों का खतरा उतना नहीं है, जितना कि इस कोरोना के वायरस ने खड़ा कर दिया है, और उस पर वह तैयार भी हैं, लेकिन हम हिंदुस्तानियों को शायद हमारे समाज की घातक बीमारियों के आंकड़े भी पता नहीं हैं. जिस चाइना को कोरोना वायरस के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है वहां भी हिंदुस्तान से कम टीबी पेशेंट हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक चाइना में हर साल 9 लाख टीबी पेशेंट रजिस्टर होते हैं जोकि भारत से तकरीबन आधे हैं. जबकि यूनाइटेड स्टेटस में एक साल में केवल 9 हजार के आसपास टीबी पेशेंट की संख्या है.

सवाल यह है कि क्या यूएस, या इटली में इसे मेडिकल इर्मेंजेसी मानकर इस पर फौरन खड़ा हुआ जाएगा तो हमारा समाज भी क्या उसकी मुंहदेखी कोरोना—कोरोना करने लगेगा, या फिर आंखें खोलकर हमारे आसपास की तस्वीरें भी देखने की कोशिश करेगा !

हिंदुस्तान ही ऐसा मुल्क है जहां कि बीमारियों से लोग इतने ज्यादा परेशान हो जाते हैं कि आत्महत्या तक करने लगते हैं. यह संख्या कोई छोटी—मोटी संख्या नहीं है, पर इसको हम एनसीआरबी के आंकड़ों में साल दर साल देखकर भी अनदेखा ही करते चले जाते हैं.

यदि 2001 से 2015 तक की अवधि पर गौर किया जाए तो 3,84,768 लोगों ने बीमारियों के चलते खुद की जिंदगी खत्म कर ली, यदि इन लोगों की कहानियों को खोजा जाए तो पता चलेगा कि इसके पीछे ज्यादातर कारणों में या तो गरीबी थी या ऐसी पीड़ा थी जिसे कोई अस्पताल दूर नहीं कर पाया. हमारा समाज भी इन तकरीबन चार लाख लोगों को सांत्वना नहीं दे पाया कि तुम ठीक हो जाओगे. बल्कि जबसे निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर होने का तमगा पहनाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को जानबूझकर कमजोर किया जाता रहा है उसके बाद से तो सबसे लिए सस्ता और सुलभ स्वास्थ्य और भी दूर की कौड़ी जान पड़ता है.
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First published: March 16, 2020, 1:28 PM IST
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