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कोरोना की तीसरी लहर: राजनीतिक दलों के लिए भी एक गाइडलाइन जारी करे जनता

यह ऐतिहासिक गलती हमने पिछली लहर के पहले देखी थी जब चुनावों को अंजाम दिया गया था और उसके परिणाम में हमने अपनों की हजारों लाशों का अंतिम संस्कार होते देखा है. अब फिर चुनाव भी हैं, और तीसरी लहर का खतरा भी है. टीवी के भाषणों में, सोशल मीडिया में सोशल के मीम्स में फिर से वैसे ही संदेश तैरते हैं, लेकिन उसके बाद रैलियों की तस्वीरें आती हैं, हजारों लोग जमा होते हैं, बैठकें होती हैं, इनमें कभी मास्क लगाने या नहीं लगाने की अजब सी छूट होती है.

Source: News18Hindi Last updated on: January 7, 2022, 11:57 PM IST
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कोरोना की तीसरी लहर: राजनीतिक दलों के लिए भी एक गाइडलाइन जारी करे जनता
राजनीतिक दलों के लिए जनता को भी एक गाइडलाइन जारी करनी चाहिए. (सांकेतिक तस्वीर-AP)

और इस बार तो बिलकुल भी सावधानी नहीं. तीसरी लहर सामने है और दूसरी लहर के भयंकरतम परिणाम भुगतने वाला समाज सब कुछ भुलाकर सीना फुलाए घूम रहा है, तब जब विभिन्न स्वास्थ्य मंचों से सावधान हो जाने और वायरस के और बिगड़ैल हो जाने की खबरें लगातार आ रही हैं. अब तो मास्क लगाने, सोशल डिस्टेसिंग बनाने, हाथ साफ करते रहना जैसे ‘जुमला’ ही बन गया हो. भारतीय समाज इस लापरवाही तक कैसे पहुंचा और इसका अंजाम और क्या हो सकता है, इस पर सोचने-समझने की जरूरत है.


कोरोना के खिलाफ लड़ाई हमने बड़े जोर-शोर से शुरू की थी. यहां तक कि देश में ताली-थाली बजाने, मोमबत्ती जलाकर एकजुटता दिखाने जैसे संकल्प भी बहुत ही मन से अंजाम दिए. उस वक्त तक वायरस क्या है, कैसा है, कितनी तबाही मचाएगा, जैसे सवाल हमारे सामने थे, अधिक जानकारियां नहीं थी, समाज में डर था, तो लोगों ने स्वास्थ्य विज्ञान के उपायों का भरपूर पालन किया, कोई नहीं करते दिखता तो लोगों ने अपनी ओर से टोंककर गलतियों को ठीक भी किया, लॉकडाउन जैसी सख्त ऐतिहासिक अवस्थाओं को बिना किसी रंजोगम के झेल भी लिया, लेकिन क्या वजह रही कि उसके बाद दूसरी लहर और अब तीसरी लहर में लोग बेपरवाह हैं. वह क्यों यह कहते सुने जा रहे हैं कि ‘जो भी होगा देखा जाएगा!’


इसकी बड़ी वजह जो समझ में आती है वह है नेतृत्व पर अंधानुकरण की हद तक विश्वास, भरोसा, इतना कि व्यक्तिगत रूप से भी हम यह तय नहीं कर पाते कि क्या सही है या क्या गलत. कोरोना के मामलों में भी देश की अधिकांश जनता इसी गफलत में फंसी रही है और इसका सबसे बड़ा कारण है कि हमारी लीडरशिप ने उन्हें संशय की स्थिति में डाल दिया है. खासकर राजनीतिक नेतृत्व ने, और उनकी भारी चुनावी रैलियों ने. और यह किसी एक दल की बात नहीं है.


दूसरी लहर के समय भी हुई थी ऐसी भूल

यह ऐतिहासिक गलती हमने पिछली लहर के पहले देखी थी जब चुनावों को अंजाम दिया गया था और उसके परिणाम में हमने अपनों की हजारों लाशों का अंतिम संस्कार होते देखा है. अब फिर चुनाव भी हैं, और तीसरी लहर का खतरा भी है. टीवी के भाषणों में, सोशल मीडिया में सोशल के मीम्स में फिर से वैसे ही संदेश तैरते हैं, लेकिन उसके बाद रैलियों की तस्वीरें आती हैं, हजारों लोग जमा होते हैं, बैठकें होती हैं, इनमें कभी मास्क लगाने या नहीं लगाने की अजब सी छूट होती है.


राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक गाइडलाइन जारी हो

इसी गफलत ने इस बार स्थिति को और गंभीर बना दिया है, यदि पिछले चौबीस घंटों में एक लाख से अधिक संक्रमण के मामले आ गए हैं और हम फिर भी गंभीर नहीं हैं, तो आप खुद ही सोचिए कि संभलते-संभलते देर न हो जाए. आग लगने पर ही कुंए खोदने वाला हमारा समाज क्या इस भारी विपदा को झेल पाएगा. और झेल पाएगा तो कैसे? आखिर क्या हो कि बुरे हालात को बनने ही नहीं दिया जाए, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अब तक जनता के लिए कोरोना प्रोटोकाल और गाइडलाइन बनते आई है, इस बार थोड़ी सक्रिय जिम्मेदारी जनता भी उठाए और राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक गाइडलाइन जारी कर दे.


चाहे कितना ही कोई बुलाए राजनैतिक रैलियों में प्रत्यक्ष रूप से नहीं जाया जाए, जब हमारे बच्चों ने विपरीत परिस्थितियों में आनलाइन माध्यमों से अपनी लिखाई-पढ़ाई को आगे बढ़ाने का कारनामा कर दिखाया है तो बड़े भी तय कर लें कि ऐसे तमाम प्रयोजनों को भी आनलाइन माध्यमों से ही अंजाम देंगे.


तार्किक नजरिये से सोचना जरूरी

जान से बड़ी कोई चीज नहीं है और हर नागरिक को जीने का अधिकार है. यदि किसी लापरवाही से किसी भी भारतीय को अपनी जान असमय देनी पड़ती है, तो ऐसे तंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाता है. ऐसे चुनाव का कोई मतलब नहीं है, ऐसी राजनीति अर्थहीन है जो अपने स्वार्थ की फिक्र लोगों की सेहत से ज्यादा करती है. हम सर्वे भवन्तु सुखिन: और सर्वे सन्तु निरामय की परम्परा से आते हैं, यह पंक्तियां सर्वाधिक रूप से सुबह-शाम दोहराई जाती हैं, लेकिन हमारा व्यवहार ठीक इससे उल्टा है. कोविड-19 बीसियों म्यूटेशन के बाद ‘कोविड-22’ तक जा पहुंचा है, लेकिन हमारी सामूहिक चेतना सूचना क्रांति के अतिरेक में कई सौ साल पीछे जा पहुंची है, जरूरत है वैज्ञानिक चेतना जगाने की, पर यह होगा कैसे ? क्या हम पिछले दो साल के अनुभवों से सीख लेते हुए तार्किक नजरियों से सोच पाएंगे ?


कोविड नितांत निजी बीमारी होती तो सबको अपने हिसाब से इसे डील करने की आजादी हो सकती थी, लेकिन हम सबको पता है कि यदि कोई एक व्यक्ति को भी खतरा है तो समझिए सबको खतरा है, कोई भी सुरक्षित नहीं है, इसके बावजूद समाज में ऐसे मूर्खों की बड़ी जमात है जिन्होंने अपनी भांति-भांति की कट्टर मान्यताओं के चलते टीकाकरण को नहीं अपनाया है जबकि हम जानते हैं कि दुनिया में अब तक जितनी महामारियां रही हैं वह केवल टीकाकरण से ही नियंत्रित हो पाई हैं.


इन सब विकारों से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है कि लोग अपने अंदर एक राजनैतिक नेतृत्व पैदा करें, जो उनके अपने पक्ष में सबसे ज्यादा खड़ा हो, उसकी अपनी प्रतिबदधताएं हों, और वह ऐसे हर एक उपक्रम पर सवाल खड़े करता नजर आए जो लोगों को गफलत की अवस्थाओं में डाल रहे हैं. क्या हम ऐसी कोई शुरुआत करेंगे?


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: January 7, 2022, 11:48 PM IST
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