कहां आ गए हम ! भीड़ हिंसा के वीडियो बनाना सीख गई, बचाना नहीं

भीड़ खुद ही तय कर रही है कि अपराधी कौन है, अगले पल उसे क्‍या सजा दे देनी है, उसे मार डालना है. न थाने में मामला दर्ज कराना है, न अदालत ही जाना है. सोचिए, यह वही हिंदुस्तान है.

Source: News18Hindi Last updated on: February 7, 2020, 2:56 PM IST
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कहां आ गए हम ! भीड़ हिंसा के वीडियो बनाना सीख गई, बचाना नहीं
कृष्ण के प्रेम की आराधना करने वाले हम नफरत के अंगारे बरसाने में कैसे लग गए?

अपने दिमाग से एक पल को सारे राजनीतिक विचार निकाल कर एक पल को शांति से सोचिए, कहां आ गए हम? एक मनुष्य जमीन पर पड़ा है, किसी को ठीक—ठीक नहीं पता कि उसने क्या किया है? उसका दोष क्या है? उसने किसके साथ क्या अपराध किया है? सैकड़ों लठैत उसे पीट रहे हैं. हर कोने से उस पर पत्‍थर फेंके जा रहे हैं. बाप की उम्र का एक व्यक्ति 20-22 किलो का पत्थर अपने दोनों हाथों से उठाता है, और पूरी ताकत से उसे दे मारता है. इसके बाद भी उस बेदम पर लाठियां तब तक बरसती रहती रहती हैं, जब तक कि वह मर नहीं जाता. कई हाथों में स्मार्ट फोन है. दिल हिला देने वाली यह वारदात उनमें कैद होते रहती है. वीडियो बनाने कई आते हैं, लेकिन उसे बचाने के लिए कोई आगे नहीं आता. देश में इस तरह के कई मामले हुए है. इस बार दिल दहला देने वाली यह घटना मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) के धार जिले से सामने आई है.


कुछ महीने पहले हैदराबाद (Hyderabad) में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए आरोपियों को माला पहनाकर सिर—आंखों पर बैठाने वाली भीड़ ने इस बार खुद लाठिया अपने हाथों में ले ली. भीड़ का हौसला बढ़ गया है, उसे पुलिस की भी जरूरत नहीं है. वह खुद यह तय कर ले रही है कि कुछ लोग बच्चा चोर हैं और अगले ही पल उसे बच्चा चोरी की सजा दे देना है, उसे मार डालना है. न थाने में मामला दर्ज कराना है, न अदालत ही जाना है. सोचिए, यह वही हिंदुस्तान है न जिसके एक बूढ़े आदमी ने घूम—घूम कर पूरे देश में अहिंसा का पाठ पढ़ाया. कोई सदियों पहले नहीं महज 100 साल के अंतर से देखा. यह महावीर, बुदध की धरती और कृष्ण के प्रेम की हम आराधना करने वाले नफरत के अंगारे बरसाने में कैसे लग गए? अगर इसको ही डिजिटल इंडिया कहते हैं, तो प्लीज मुझे मेरा 'चिमनी वाला हिंदुस्तान' लौटा दो. मुझे उसी व्यवस्था में जीने दो जहां पोस्टकार्ड से खबर पहुंचाने में सप्ताह भर का समय लग जाता था. जहां पल भर में बच्चा चोर की खबर मीलों दूर फैलकर कोई हत्या नहीं हुआ करती थी और जहां आदमी कोई हिंसक कदम उठाने से पहले सोचा करता था. जहां भीड़ इंसान से हैवान जैसा व्यवहार नहीं किया करती थी.




शुक्र है इस घटना में पीटने वालों और पिटने वाले का मजहब एक था. वरना इस देश की राजनीति उस पर क्या कुछ न कर जाती.
शुक्र है इस घटना में पीटने वालों और पिटने वाले का मजहब एक था. वरना इस देश की राजनीति उस पर क्या कुछ न कर जाती.

हे ईश्वर तेरा शुक्रिया ! मध्यप्रदेश के धार जिले के उस गांव में पीटने वालों और पिटने वाले का मजहब एक ही था. उसमें हिंदू—मुस्लिम का भेद नहीं था. सिहर उठता हूं यह सोचकर कि उनमें एक भी अगर कोई और होता तो इस देश की राजनीति उस पर क्या कुछ न कर जाती. सोशल मीडिया पर कितने युदध छिड़ते, संविधान और नियम—कानून के जाने कितने चीथड़े आकाश में बिखरे नजर आते. स्थानीय दोस्तों ने बताया कि घटना कैसे संगठित तरीके से अंजाम दी गई. जो कहानी पता चल रही है उसका सार यही है कि पूरा मामला योजना बनाकर जानबूझकर अंजाम दिया गया. कुछ लोगों ने इसमें फेक न्यूज का सहारा लिया. अफवाह का, डिजिटल टेक्नोलॉजी का, भीड़ का. सोचिए, समाज में संवेदना का स्तर क्‍या हो गया है. सभ्य, सुशिक्षित, पेंट—कमीज पहने और तकनीक से लैस समाज ने खुद का विकास किया या अपनी चेतना का विनाश किया. हो सकता है कि भीड़ किसी दिन मुझे भी मार दे. किसी और बहाने से मार दे. मुझे भी बच्चा चोर करार दे दिया जाए या मनमुताबिक कोई और कहानी गढ़ ली जाए. व्‍हाट्सएप पर मेरा वीडियो, फोटो वायरल कर दिया जाए, क्योंकि आज जब यह सब कुछ हो रहा तो मैं चुप रहता हूं. मैं भी तो नहीं सोचता. मैं किसी खबर को जांचता नहीं. लाठियों को रोकता नहीं, पत्थरों को शरीर पर पड़ने देता हूं.

सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. हो सकता है कि यह मैं न हूं, आप हों, कोई भी हो सकता है. भीड़ पहचानकर तो नहीं मारती. अगर आप कुछ कर रहे होते तो अब तक 50 से ज्यादा लोग देश में ऐसे ही मारे जा चुके होते? क्या किया हमने. सरकारों ने क्या किया. सोशल मीडिया पर लगाम तक नहीं लगा पाए. एडवाइजरी देने के सिवाय कोई व्यवस्था नहीं बना पाए, जिससे लोगों को सबक मिले. अभिभावकों को इतना भरोसा नहीं दे पाए कि उनका बच्चा इतना महफूज है कि उसे उनकी बिना मर्जी के कोई घर की दहलीज से एक कदम भी आगे नहीं ले जा सकता. पुलिस थानों को ऐसा बन जाने दिया गया कि वह अपराध हो जाने के बाद ही सक्रिय हों. दोषी हम सभी हैं. सामाजिक व्यवस्था का यह ऐसा ग्रहण है जो सालों नहीं उतरेगा और ऐसे समाज में तो और भी दुखदाई है, जहां एक बेहतरीन लोकतंत्र रहा हो. सालों की मेहतन से बनाया गया मूल्य आधारित संविधान हो, जहां तमाम महापुरुषों की करुणा, प्रेम, अहिंसा की सच्ची प्रेरक कहानिया हों, जिन्‍हें उन्होंने कहा नहीं, जीकर बताया है.


(यह लेखक के अपने निजी विचार हैं.)


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First published: February 7, 2020, 2:56 PM IST
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