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लाखों का पैकेज छोड़कर खेती करने वाला किसान क्यों सफल

Policy for Agriculture and Farmer: पिछले बीस-पच्चीस सालों के अंदर भारत में तीन लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं. किसान की औसत आय आज भी छह हजार रुपए सालाना पर बनी हुई है. आखिर यह आंकड़े वैसे क्यों नहीं हो पाए, जैसे कि कोई सफल व्यक्ति के करने पर होते हैं.

Source: News18Hindi Last updated on: January 18, 2021, 7:26 PM IST
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लाखों का पैकेज छोड़कर खेती करने वाला किसान क्यों सफल
बीते बीस-पच्चीस सालों में खेती में आमूलचूल परिवर्तन आया है. तकनीक और तौर-तरीकों में बदलाव हुआ है. फाइल फोटो
आपकी आंखों के सामने अक्सर ऐसी हेडलाइन सामने आती रहती हैं, जिनमें बताया जाता है लाखों का पैकेज छोड़कर गांव आया, खेती की और आज लाखों रुपए कमा रहा है. कई मीडिया प्लेटफार्म पर तो ऐसी खबरों का सेक्शन ही बन गया है, जिनमें सफलता की रंगबिरंगी कहानियां हैं. नए प्रयोग हैं, आइडिया हैं. इन्हें पढ़कर लगता है कि खेती वास्तव में बहुत अच्छा काम है.

दूसरी ओर ऐसी भी खबरें निरंतर सामने आती हैं, जिनमें मौसम की मार है, घाटा है, सही दाम नहीं मिलना है, भारी-भारी कर्ज है, खेती से अलगाव है, निराशा है और इस हद तक है कि कहीं उनका शरीर किसी पेड़ में रस्सी से लटका हुआ पाया जाता है, तो कहीं जहर खाकर जान देने की खबर सुनाई पड़ती है. आखिर क्या वजह है कि एक ही धरती पर, एक ही समाज में, एक ही खेत में एक किसान सफल हो जाता है और दूसरा लगातार घाटा झेलते हुए अपनी जान दे देता है. एक के हाथ में सुनिश्चित सफलता क्यों और दूसरे के हाथ में हमेशा निराशा क्यों.

कोई 24 साल पहले अर्थशास्त्र की कक्षा में शिक्षक हमें पढ़ाते थे कि भारतीय खेती मानसून का जुआं है. वह कहते थे कि भारत में हर पांच साल में दो साल अतिवृष्टि, दो साल अल्पवृष्टि और एक साल ही सामान्य बारिश हुआ करती है. दूसरी बात वह यह कहते थे कि भारत में किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है, कर्ज में मर जाता है और अपनी अपने बेटे को भी कर्ज में छोड़ जाता है.

उस वक्त हमें यह बात ज्यादा समझ में नहीं आती थी. दिखता जरूर था कि खेती एक जोखिम का काम है, इसमें हर दिन चुनौती ही चुनौती है. खेत तैयार कर बीज डालने से लेकर मंडी तक पहुंचाकर बेच देने में हर चरण में चुनौती है. यहां तक कि रुपए घर लाते समय कई बार उसके साथ लूटमार भी हो जाया करती थी.
यह सही है कि बीते बीस-पच्चीस सालों में खेती में आमूलचूल परिवर्तन आया है. तकनीक और तौर-तरीकों में बदलाव हुआ है. सदियों से जो गौ आधारित खेती होती रही वह पूरी तरह बदल गई. वह अब या तो बहुत दूर-दराज वाले इलाकों में बची है या वह परंपरागत खेती बचाने वाले प्रयोगधर्मी किसानों के खेतों में ही दिखाई देती है.

ट्रैक्टर और नए-नए कृषि उपकरणों ने कृषि में मानवीय शरीर से किए जाने वाले कामों को कम कर दिया है. सिंचाई की भी नई तकनीकें विकसित हुई हैं, जिनमें पानी का अधिकाधिक उपयोग किया जा रहा है, लेकिन इसके साथ लागत इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि सामान्य किसान के लाभ का पूरा गणित ही गड़बड़ा गया है. वह खाद-बीज के लिए दूसरों पर निर्भर है, महंगा डीजल भारी पड़ता है, दूसरों के द्वारा तय किए गए दाम पर वह अपनी उपज बेचता है, और दाम मिलने से पहले ही कर्ज की रकम कट जाती है. इसलिए उसके बहीखाते में उत्पादन का आंकड़ा तो बढ़ा मिलता है, लेकिन लाभ के कॉलम में वह पहले वाली ही स्थिति पर खुद को पाता है. उसकी खेती का वह पुराना ताना-बाना तो टूट ही चुका होता है, जो खेती को व्यवसाय नहीं, एक जीवन पद्धति मानता है, जो खेती को आजीविका मानता है.

हरित क्रांति के बाद सरकारों ने भी खेती को व्यवसाय की तरह अपनाए जाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है. नगद फसलों का रकबा जबर्दस्त बढ़ा है. हालात यह हो चुके हैं कि जहां पर गेहूं, सोयाबीन, धान, जैसी फसलों का बंपर उत्पादन हो रहा है, वहां पर अब मक्का, ज्वार और इन जैसे दूसरे अनाज खोजने से भी नहीं मिल रहे हैं. लेकिन, क्या यह नगद फसलें खुशहाली ला पाई हैं. आखिर क्यों बंपर उत्पादन के बावजूद किसान आत्महत्या की खबरें थमी नहीं हैं. इन्हीं पिछले बीस-पच्चीस सालों के अंदर भारत में तीन लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं. किसान की औसत आय आज भी छह हजार रुपए सालाना पर बनी हुई है. आखिर यह आंकड़े वैसे क्यों नहीं हो पाए, जैसे कि कोई सफल व्यक्ति के करने पर होते हैं. वह आखिर ऐसा कौन सा अलादीन का जादुई चिराग लेकर आता है, जिससे सबकुछ अच्छा ही होते चला जाता है.पहला मामला है पूंजी का, लाखों का पैकेज छोड़कर खेतों में लौटे उस किसान के पास पर्याप्त पूंजी होती है, जिससे वह अपने खेतों में अपनी जरूरत का काम बिना किसी दबाव के कर पाता है. उसके पास जोखिम लेने की ताकत होती है. वह खेती के हर काम में नए प्रयोग को लागू कर सकता है. वह ज्ञान को जमीन पर उतारता है. उसके पास एक नेटवर्क होता है और दुनिया में ऐसे बेहतरीन कामों के प्रति एक्सपोजर भी. इनका पूरा फायदा वह अपने काम में लेता है. वह अपनी उपज का मोलभाव करने की क्षमता रखता है, क्योंकि उसके पास भंडारण की व्यवस्था है, कर्ज नहीं होने से उस पर वैसा दबाव भी नहीं होता. वह सरकारी योजनाओं का लाभ लेना भी जानता है.

ऐसा नहीं है कि एक सामान्य किसान ऐसा नहीं कर पाता है. उसकी महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ी हो सकती हैं, ज्ञान और कौशल भी, लेकिन पूंजी के अभाव में उसके सपने धरे के धरे रह जाते हैं. वह कृषि के उस जाल से खुद को बाहर ही नहीं निकाल पाता है, जिसमें बहुत कुछ करने के बाद भी थोड़ा सा लाभ होता है.
इसलिए देश में एक किस्म का नैरेटिव बन गया है कि खेती तो घाटे का ही सौदा है. हमारी कक्षा में शिक्षक इसे पढ़ाते रहे, और हम यह हिम्मत नहीं कर पाए कि आखिर खेती घाटे का सौदा कैसे हो सकती है, जबकि वह अकेला ऐसा काम है जो उत्पादन करता है, जो एक दोने से हजार दाने बनाने की कुदरती ताकत रखता है.

हमने क्यों सवाल नहीं किए कि यदि खेती घाटे का सौदा है तो क्यों है और यदि वह है तो उसको लाभ का सौदा बनाने के लिए सरकारों ने अब तक क्या-क्या किया है. दूसरे धंधों में लोगों का भरपूर विकास हुआ, लेकिन किसानों के हक में ऐसी नीतियां क्यों नहीं बनाई जा सकीं, जिससे भारत का हर किसान खुशहाल हो पाता, वह आत्महत्याएं नहीं करता.

*ये लेखक के निजी विचार हैं.
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: January 18, 2021, 7:18 PM IST
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