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क्या अधिकार बना देने से समाज पानीदार बनेगा?

लोगों के लिए पानी की उपलब्धता को लेकर कई सवाल हैं. बहस भी है कि पानी का हक मिलना चाहिए. लेकिन क्या वाकई सिर्फ अधिकार बना देने से सभी सवालों के जवाब मुमकिन हैं?

Source: News18Hindi Last updated on: April 13, 2020, 3:06 PM IST
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क्या अधिकार बना देने से समाज पानीदार बनेगा?
देश के कई दर्जन जिलों में पानी का स्तर तय सीमा से नीचे जा चुका है. (फाइल फोटो)
पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने राजनीति में आने का खुलासा किया. उन्होंने बताया कि तकरीबन पचास साल पहले कमलनाथ जब छिंदवाड़ा से सौंसर के रास्ते जा रहे थे तो कुछ महिलाएं उनके इंतजार में तीन घंटे से भी अधिक समय से खड़ी थीं. रात के तकरीबन दस बज रहे थे. उनके हाथों में चिमनियां थीं. इसे देखकर कमलनाथ हैरान रह गए. ठहरकर उनसे बातचीत की. महिलाओं ने बताया कि वह पानी के भयंकर संकट से गुजर रही हैं. उन्हें एक घड़ा पानी लेने के लिए बारह किलोमीटर चलना पड़ता है. कमलनाथ ने खुद बताया कि बस उसी वक्त उन्होंने तय किया कि इस समस्या को यदि सिरे से दूर करना है तो उन्हें सक्रिय राजनीति में आना पड़ेगा. इस कहानी को जब वह सुना रहे थे तो सभागार में तकरीबन पच्चीस राज्य के लोग पानी पर चर्चा करने जमा हुए थे. मौका था मध्यप्रदेश में देश की एक अनूठी कवायद पानी के अधिकार का. देश में पहली बार एक राज्य ने पानी के हक को लेकर इतनी बड़ी कवायद की है.

सचमुच पानी का संकट बहुत गहरा है. कमलनाथ का तीस—चालीस बरस पहले का किस्सा इतना पुराना नहीं लगता है.

पहले समस्या यह होती थी कि पानी लोगों के पास तक नहीं पहुंच पाता है इसके लिए उन्हें भारी मशक्कत करनी पड़ती थी, अब समस्या पानी के नहीं होने की ज्यादा हो गई है. राजनीति में भले ही कितना पानी बह गया हो पर जमीन के पानी का सवाल वैसा का वैसा है बल्कि पहले से और अधिक गंभीर और जीवन का सवाल बन गया है. पानी जिससे हर कोई हर तरह से प्रभावित है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित तो खुद जल संरचनाएं भी हैं. पानी से रीते तालाब, नदियां, पोखर इनके जलाधिकार का हनन तो सबसे अधिक हमने ही किया है !


बीते तीन—चार दशकों के विकास ने पानी के प्रबंधन को सबसे ज्यादा अनदेखा किया है. पूरा जोर ज्यादा से ज्यादा पानी उलीच कर धरती को पानी से रीता कर देने पर ही रहा है, उसे लौटाना तो जैसे भूल ही गए. इसी की परिणाम हमने देखा है कि आजादी के वक्त मध्यप्रदेश का टीकमगढ़ जिला देश में सबसे ज्यादा सिंचित माना गया था, उसी टीकमगढ़ जिले में सूखा पड़ जाता है, वहां भयंकर पलायन होता है. ऐसी ही परिस्थितियां कमोबेश हर कहीं नजर आती हैं. शहर में संकट है ही गांवों में भी पानी का संकट ऐसा है कि पानी पर पहरेदार बैठाने पड़ रहे हैं.
इन परिस्थितियों में मध्यप्रदेश सरकार लोगों को पानी का हक देने जा रही है. देश में पहली बार कोई राज्य यह हिम्मत कर रहा है कि वैधानिक रूप से लोगों को पानी का हक दे. हालांकि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जब गरिमापूर्ण जीवन की बात करता है, तो उसमें पानी का अधिकार भी शामिल होता है. संयुक्त राष्ट और मानवाधिकार परिषद ने भी जलाधिकार को मानवाधिकार के रूप में मान्यता दी है. पर राज्यों के स्तर पर पानी को कभी ऐसा माना ही नहीं गया कि उसके लिए ऐसी कोई वैधानिक कवायद करनी पड़े, लेकिन जब परिस्थितियां ऐसी बन ही गई हैं तो यह भी ठीक है कि उसे ज्यादा जोर लगाकार हक के रूप में पूरा किया जाए. आखिर सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी भी है कि वह देश में रोटी—कपड़ा और मकान की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में लोगों की मदद करे.

पानी के अधिकार का कोई अंतिम मसौदा अभी तक सामने नहीं आ पाया है, लेकिन इस सम्मेलन में यह तय किया गया है कि अगले तीन से चार महीने में पानी के अधिकार का मसौदा जनता के सामने होगा. इसकी सबसे खास बात जो कही जा रही है वह यह कि प्रदेश के हर नागरिक को 55 लीटर पानी उपलब्ध करवाया जाएगा. यदि सचमुच ऐसा हो जाता है तो निश्चित रूप से यह एक क्रांतिकारी कदम माना जाएगा, पर यह होगा कैसे.


ऐसा नहीं है कि इससे पहले पानी पहुंचाने के लिए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में काम नहीं किया गया है. इससे पहले मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान ने इसके लिए अपने पंद्रह सालों में भारी कवायद की. उन्होंने नर्मदा को भी जीवित मनुष्य का दर्जा दिलवाने की कोशिश की. सिंहस्थ के आयोजन में शिप्रा में नर्मदा का पानी ले आए और प्रण लिया कि अगले सिंहस्थ तक वह शिप्रा को पुनर्जीवित करके ही दम लेंगे, लेकिन इधर कुछ होता दिखा नहीं. ग्रामीण मध्यप्रदेश में पंद्रह हजार से ज्यादा नल—जल योजनाएं बनीं, लेकिन इनमें से पंद्रह सौ योजनाएं पूरी तरह से ठप्प हैं.इसके लिए लोगों की खुद की भी प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की जिम्मेदारी तय करना पहली बात है, लेकिन केवल उसी के भरोसा बैठ जाने से भी काम नहीं चलेगा. हम देख रहे हैं कि मध्यप्रदेश में छोटे—बड़े तमाम बांध बनाए गए हैं, नदियां हैं, लेकिन जब मुख्यमंत्री यह बताते हैं कि जिस साल मानसून ने बारिश के रिकॉर्ड तोड़े हों उसी साल फरवरी आते—आते 65 बाँध और 165 रिजर्व वायर सूखे की चपेट में हैं. स्थानीय निकाय नागरिकों को 2 से 4 दिन में पानी उपलब्ध करवा पा रहे हैं. सोचिए, कि यदि हालात यह हैं तो मसला पानी की उपलब्धता से बढ़कर कुछ और है. भोपाल का ही उदाहरण लें, तो यह अपनी झीलों, ताल—तलैयों के कारण देश में ख्यात है, लेकिन इसकी प्यास बुझाने के लिए यहां भी पानी तो नर्मदा का ही लाना पड़ा.

पानी का स्तर नीचे चले जाने से देश के कई हिस्सों में नल से पानी आना बंद हो चुका है. (फाइल फोटो)


फिर भी पानी के लिए किसी भी तरह की नयी—पुरानी कवायद का स्वागत तो किया ही जाना चाहिए. यह बहुत अच्छी बात है कि पानी के अधिकार का यह मामला केवल मध्यप्रदेश में नहीं ठहरने वाला है. पच्चीस राज्यों के प्रतिनिधियों ने कहा है कि वह अपने—अपने राज्य के मुख्यमंत्रियों से मिलकर ऐसे कानून बनाने की मांग करेंगे और ऐसे कई बेहतरीन उदाहरण भी इस जल सम्मेलन में सामने आए भी. अलवर में तरूण भारत संघ के काम का सालों पुराना उदाहरण तो है ही, तेलंगाना में पानी को लेकर हुए ताजा काम ने भी वहां किसानों की आत्महत्या को रोकने में कामयाबी हासिल की है. पानी का मामला केवल किसानों को ही राहत नहीं देता, यह महिलाओं, बच्चों और प्रधानमंत्री जी के स्वच्छ भारत अभियान के लिए भी उतना ही जरूरी है, इसलिए यह जरूरी है कि वास्तव में इस कानून के प्रति सभी सरकारें गंभीर हों. यदि यह कानून वास्तव में जैसा सोच रहे हैं, वैसा करने में भी कामयाब हो जाता है तो इसे केन्द्रीय कानून के रूप में भी लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए.

यह अच्छी बात है कि किसी व्यक्ति को दूसरे के जीवन में लिखा दुख भी इस तरह से याद रह जाता है, और वह उसे अपनी क्षमता में दूर करने की हरसंभव कोशिश करता है. मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ को यदि यह घटना इस तरह भी याद रह जाती है और वह चालीस—पचास साल बाद ही सही, उन परिस्थितियों के प्रति चिंतित होकर एक बुनियादी कदम उठाते हैं तो लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा और मजबूत होती है.  वह भी उस दौर में जबकि सरकारों की बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराने की रणनीति को ‘मुफ्तखोरी’ कहकर सोशल मीडिया पर मजाक बनाया जा रहा हो, लेकिन यह भी तय बात है कि कागज में लिखा अधिकार और जमीन पर पहुंचे अधिकार में भारी अंतर है, देश में खाद्य सुरक्षा का अधिकार भी है, रोजगार के गारंटी वाली योजना भी है, और सूचना का अधिकार भी, पर इनको पाने की राह में तमाम किस्म की चुनौतियां भी सामने आती हैं.

यदि पानी का हक मिल भी गया तो उसका अगला सवाल साफ पानी का होगा, उसका अगला सवाल खुद प्राकृतिक संरचनाओं के संरक्षण का भी होगा, उसका अगला सवाल नदियों के पुन: बह लेने का भी होगा, उसका अगला सवाल जल प्रदूषण को रोकने का भी होगा, उसका अगला सवाल पानी पर किसका अधिकार होगा, यह भी होगा. अब देखना यह है​ कि इन सारे सवालों का जवाब जल अधिकार कानून कैसे देगा ?

( लेखक वाटर एड इंडिया की फैलोशिप के तहत मध्यप्रदेश में पानी और स्वच्छता के मुददे पर कार्य कर रहे हैं.)
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First published: February 17, 2020, 12:39 PM IST
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