विश्व स्तनपान सप्ताह: जानिए कैसे पैदा होते ही भूख का शिकार होते हैं शिशु?

उस नवजात के पास रोने के सिवाय कोई शब्द भी नहीं होते, जिनसे वह अपनी मां से पोषण की गुजारिश कर पाता. हां, भूख तो लगती ही होगी, क्योंकि हर शिशु जन्म लेने के बाद ही मां की छाती से चिपककर एक ही गुजारिश करता है, दूध.

Source: News18Hindi Last updated on: August 4, 2021, 1:40 pm IST
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विश्व स्तनपान सप्ताह: जानिए कैसे पैदा होते ही भूख का शिकार होते हैं शिशु?
कोरोना के खिलाफ नवजातों में एंटीबॉडी बनाने में कारगर है स्‍तनपान.


भोजन का सही महत्व वही समझ सकता है, जिसने कभी भूख सही हो! पेट में निवालों की दरकार हो और वह कुछ मिनटों तक भी हासिल न हो, तो हमारा क्या हाल होता है? लेकिन सोचिए कि जिन्हें जन्म लेते ही भूख का शिकार होना पड़ता हो, उसकी क्या हालत होती होगी ? उस नवजात के पास रोने के सिवाय कोई शब्द भी नहीं होते, जिनसे वह अपनी मां से पोषण की गुजारिश कर पाता. हां, भूख तो लगती ही होगी, क्योंकि हर शिशु जन्म लेने के बाद ही मां की छाती से चिपककर एक ही गुजारिश करता है, दूध.



नवजात शिशुओं की एक बड़ी आबादी को सचमुच यह नसीब नहीं होता. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नतीजों में यह बात सामने आती है कि भारत में यह संकट बहुत बड़ा है. हमारे देश में हर साल तकरीबन सवा दो करोड़ बच्चे पैदा होते हैं, यानी हर दिन लगभग सत्तर हजार प्रसव होते हैं. प्रसव के बाद, मां को एक चुनौतीपूर्ण स्थिति से गुजरकर शिशु को स्तनपान भी करवाना होता है, इसलिए कि पहले घंटे में मां का दूध ही बच्चे के लिए सर्वाधिक जरूरी पोषण होता है.



लेकिन, सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि केवल 41.6 प्रतिशत बच्चों को ही जन्म के एक घंटे के भीतर पोषण मिल पाता है. हर 100 में से लगभग 59 बच्चे जन्म के बाद पहला घंटा भूख में गुजारते हैं. यह एक बहुत बुरी स्थिति है, जो लगभग एक पूरी पीढ़ी को कमजोर बनाने का काम कर रही है.



उत्‍तर प्रदेश और राजस्‍थान में संकट सबसे बड़ा

यदि राज्यों के नजरिए से देखा जाए तो उत्तरप्रदेश में यह संकट सबसे बड़ा है. भारत सरकार का सर्वे बताता है कि उत्तरप्रदेश में जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान करने वाले बच्चे का प्रतिशत सबसे कम है. यहां केवल 25 प्रतिशत बच्चे ही अमृतपान हासिल कर पाते हैं. ये कृष्ण की भूमि है, जो दूध-दही-माखन के लिए ही जाना जाता है. दूसरा, बुरा हाल राजस्थान का है, यहां भी 28.4 प्रतिशत बच्चों को पहले घंटे में पोषण मिल पाता है.




उत्तराखंड, 28.8 प्रतिशत बच्चे ही अमृतपान का सुख पाते हैं. जबकि देश की राजधानी दिल्ली में भी हालात जाने क्यों खराब हैं, जबकि यहां तो सभी लोग शिक्षित होते हैं. दिल्ली में सत्तर प्रतिशत बच्चे जन्म के एक घंटे के भीतर भूखे क्यों हैं, यह एक बड़ा सवाल दिल्ली को अपने आप से पूछकर यह जवाब खोजना चाहिए कि इन पैमानों पर उसका विकास कब होगा?



सबसे ज्यादा गेहूं उपजाने वाले पंजाब में भी मां की कोख दिल्ली बराबर बच्चों को जन्म के एक घंटे के भीतर भूखा ही रखती है. झारखंड में 67 प्रतिशत और मध्यप्रदेश में भी 66 प्रतिशत बच्चे एक घंटे के भीतर कोलस्ट्रम से वंचित रह जाते हैं.



तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं बदले हालात

एक से सात अगस्त के बीच सरकार, संस्थाएं और बाल अधिकारों के लिए संवेदनशील लोग इस बात की वकालत करते हैं कि जन्म के पहले घंटे में स्तनपान का प्रतिशत बढ़े और इसके प्रति लोगों की वर्जनाएं टूटें, लेकिन हैरानी की बात यह है कि एनएफएचएस के दो चक्रों के बीच के दस सालों में स्तनपान के हालातों में सुधार नहीं हुआ. वहीं, पहले छह महीने तक केवल मां के दूध पर निर्भर रहने की सलाह को भी अनदेखा किया गया. आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में छह से आठ माह के दौरान पूरक आहार देने का प्रतिशत भी 52 से घटकर 42 पर आ गया.


शहरी इलाकों में एक बड़ी वजह यह है कि पिछले कुछ सालों में सीजेरियन प्रसव के मामले बेहद तेजी से बढ़े हैं. आपरेशन के बाद प्रसूता के लिए अपने शिशु को स्तनपान में कई स्तर पर बाधाएं आती हैं, हालांकि डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी तब भी शिशु को स्तनपान करवाने की बात कहते तो हैं, लेकिन यह कितना व्यवहार में आ पाता है, यह सभी लोग जानते हैं.



इसलिए संस्थागत प्रसव का आंकड़ा बढ़ने के बाद भी पहले घंटे में करवाए जाने वाले उस स्तनपान का प्रतिशत अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ पा रहा है, जिसकी वकालत विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर तमाम चिकित्सकीय अध्ययन करते हैं.



ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद हैं सालों पुरानी जड़ताएं

ग्रामीण क्षेत्रों के नजरिए से देखें तो इन इलाकों में सालों पुराने जड़ताएं हैं, जिनके कारण कोई भी परिवर्तन सहज रूप से नहीं हो पाता है. इसके कुछ उदाहरण सीधे रूप से मिलते हैं. कुछ समय पहले मध्यप्रदेश के दूरदराज के इलाकों में घूमते हुए ऐसे कई व्यवहार देखने को मिले, जो शिशु स्वास्थ्य के लिए बिल्‍कुल भी सही नहीं है. जैसे शिवपुरी-श्योपुर के कई इलाकों में प्रसव के बाद पहले दो तीन दिन फोसा यानी रुई से दूध पिलाया जाता है. यह फोसा घर की किसी रजाई का होता है. यहां शोभर यानी सूदक उठने के बाद ही दूध पिलाया जाता है. ऐसा मानना है कि गन्दगी में दूध नहीं आता है. शोभर उठने तक बकरी या गाय के दूध में आधा पानी मिलाकर पिलाया जाता है.




कई क्षेत्रों में प्रसव के बाद मां का पहला दूध निदो (निकालकर) कर राख में मिलाकर ऐसी जगह फेंका जाता है, जहां चींटी उसे ना खा पाए. कुछ समुदायों में यह भी प्रचलन है कि मां का पहला दूध निकालकर देवी-देवता को चढ़ाया जाता है. इससे बाद शिशु को दिया जाता है. मां को पहले तीन दिन तक पानी के अलावा खाने के लिए कुछ भी नहीं दिया जाता है. जब तीन दिन बाद देवता की पूजा हो जाती है तभी मां को खाने को दिया जाता है.



शिवपुरी जिले की ही कुछ गांवों में हमें यह पता चला कि प्रसूता की नाल काटने के लिए दूसरे गांव से मेहतरानी या दाई बुलाई जाती हैं, जब तक नाल नहीं कट जाती, शिशु को बकरी का दूध रुई के फोए से पिलाया जाता है. अब आप खुद सोचिए कि इन मान्यताओं को कैसे बदला जा सकता है. इन मान्यताओं को बदले बिना क्या शिशु को पहले घंटे में अमृतपान की तस्वीर बदली जा सकती है ?


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: August 4, 2021, 1:40 pm IST
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