World TB Day: कोविड के पहले साल घटे, लेकिन फिर बढ़ गए टीबी के मामले

हमने 2025 तक टीबी खत्‍म करने का लक्ष्‍य तय किया है. कोविड 19 महामारी ने तमाम अभियानों को बुरी तरह से प्रभावित किया है. ऐसे में इस लक्ष्य की समीक्षा करने और नए सिरे से रणनीति भी बनाए जाने की जरूरत है. आज विश्व टीबी दिवस के मौके पर एक बार फिर से इस चुनौती से लड़ने के लिए कमर कस लेनी चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: March 24, 2022, 7:06 am IST
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World TB Day: कोविड के पहले साल घटे, लेकिन फिर बढ़ गए टीबी के मामले
World TB Day.

13 जनवरी 2011 के बाद से भारत में पोलियो का कोई भी मामला सामने नहीं आया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के क्षेत्रीय प्रमाणन आयोग ने 27 मार्च 2014 को भारत को पोलियो मुक्त होने का प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया. यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी. भारत ने एक दूसरी बड़ी उपलब्धि का लक्ष्य भी तय किया है और वह है भारत से 2025 तक टीबी यानी तपेदिक महामारी का पूरी तरह से खात्मा करना. भारत इस राह में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इस बीच कोविड 19 महामारी ने तमाम अभियानों को बुरी तरह से प्रभावित किया है. इस महामारी के बाद लांग कोविड के असर मानव शरीर पर देखने को मिल रहे हैं, ऐसे में उन तमाम लक्ष्यों की समीक्षा और नए सिरे से रणनीति भी बनाए जाने की जरूरत है. आज विश्व टीबी दिवस के मौके पर एक बार फिर से इस चुनौती से लड़ने के लिए कमर कस लेनी चाहिए.


भारत में टीबी के आंकड़ों को देखा जाए तो 2015 में प्रति एक लाख की आबादी पर 217 मरीज सामने आ रहे थे, 2016 में यह घटकर 211 हुए, 2017 में 204 और 2018 में 199 हुए. वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2021 बताती है कि अब यह संख्या घटकर 188 प्रति लाख की आबादी तक पहुंच गई है. संख्या में देखें तो भारत में 2017 में 18.27 टीबी के मामले सामने आए थे जो 18 में 21.55 और 19 में 24 लाख तक पहुंच गए. 2020 में यह संख्या घटकर 18 लाख तक हो गई. यह कोविड की लहर का पहला साल था, इस पूरे साल भारत में लोगों ने स्वच्छता व्यवहार और संक्रमण से दूर रहने की हरसंभव कोशिश की थी, लेकिन यह भी हुआ था कि कोविड के कारण दूसरी बीमारियों को लोगों ने छुपाया भी था और वह अस्पताल तक पहुंचने में डर रहे थे. इसलिए इस कम हुए आंकड़े का यह भी कारण हो सकता है. यदि ऐसा नहीं होता तो यह संख्या 2021 में फिर बढ़कर 21.55 लाख तक नहीं पहुंचती. आंकड़े यह भी बताते हैं कि 2019 में भारत में 73382 लोग मारे गए यानी कुल मरीजों का 4.4 प्रतिशत और इसके अगले साल 89823 टीबी प्रभावितों की मृत्यु होना दर्ज हुई. इससे पता चलता है कि टीबी अब भी देश में एक चुनौती बनी हुई है और यदि कोविड न आया होता तो यह सबसे बड़ी महामारी के रूप में दर्ज होती.


भारत में टीबी को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना 2017—25 चलाई जा रही है. यह योजना मई 2017 से शुरू हुई है. इस योजना के माध्यम से टीबी को जड़ से समाप्त करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं. टीबी ज्यादातर गरीब आबादी के लिए घातक सिद्ध होती है. टीबी और पोषण का नजदीक का संबंध है. इसलिए सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए 500 रुपए प्रतिमाह की आर्थिक सहायता टीबी मरीजों के लिए मुहैया कराई है ताकि वे अपना पोषण सुनिश्चित कर सकें और उनके अंदर इस महामारी से लड़ने की शक्ति का संचार हो सके. यह राशि टीबी मरीज के खाते में सीधे अंतरित करने की व्यवस्था की गई है ताकि बीच में कोई गड़बड़ न हो सके. केवल पोषण के लिए ही सरकार ने 2019—20 में 590 करोड़, 20—21 में 610 करोड़ और 21—22 में 680 करोड़ रुपए की राशि खर्च की है.


जरूरत इस बात की है कि इस राशि का उपयोग केवल मरीज के लिए हो. होता यही है कि जिस मकसद के साथ सहायता उपलब्ध करवाई जाती है वह किन्हीं दूसरे खर्चों पर हो जाती है. और यदि मरीज महिला अथवा बच्चे हों तो फिर तो इस राशि का उपयोग घर के अन्य खर्चों पर भी होना निश्चित है. ऐसे में यदि नीति में नगद भुगतान की जगह पोषण किट तैयार करके मरीजों तक पहुंचाने की व्यवस्था कर दी जाए तो शायद इसके लीकेज के चांस कम हो सकते हैं. इसके लिए इसे अन्य विभागीय योजनाओं के साथ जोड़कर भी देखा जा सकता है.


टीबी के साथ आवास का मामला भी जुड़ा हुआ है और स्वच्छता का भी. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनने वाले मकान निश्चित रूप से इस महामारी को दूर करने में भी सहायक होंगे. जिन इलाकों में टीबी का प्रभाव ज्यादा है, वह आबादी छोटे और ऐसे मकानों में रहती है जहां पर संक्रमण बढ़ने की संभावना बहुत अधिक रहती है. मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिला टीबी से सर्वाधिक प्रभावित रहता है. यहां पर ज्यादा आबादी सहरिया आदिवासियों की है. इन आदिवासियों की घर बहुत छोटे और बंद से रहते हैं, जिससे यह परिवार के अन्य सदस्यों को प्रभावित कर देते हैं. जरूरत इस बात की है कि ऐसे क्षेत्रों और आबादी की पहचान करके इन घरों को इस तरह का बनाया जाना चाहिए जिनसे यह इलाके बीमारियों से लड़ पाने में सक्षम हों. उसे केवल आवास योजना तक ही सीमित नहीं कर दिया जाना चाहिए.


स्वच्छता व्यवहार को सही तरीके से अपनाकर इस महामारी से ठीक प्रकार से लड़ा जा सकता है, और 2025 तक न सही, लेकिन 2030 तक भी देश से इस महामारी को शून्य किया जा सका तो यह देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि साबित होगी.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव, शोध, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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    First published: March 24, 2022, 7:06 am IST
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