विश्व टीबी दिवस: कोरोना काल में टीबी की बात

भारत के संदर्भ में हम देखें तो टीबी भी एक खतरनाक स्तर तक समाज में व्याप्त है, पर वैसी चेतना कभी भी दिखाई नहीं दी, हमें इसके सामाजिक—राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक कारणों का विश्लेषण करके यह समझना चाहिए कि ऐसा क्यों नहीं हो सका है?

Source: News18Hindi Last updated on: March 24, 2021, 11:00 AM IST
शेयर करें: Facebook Twitter Linked IN
विश्व टीबी दिवस: कोरोना काल में टीबी की बात
25 मार्च को विश्व टीबी दिवस मनाया जाता है.
देश में कोविड संक्रमितों की संख्या एक करोड़ को पार कर गई है. डेढ़ लाख से ज्यादा लोग मारे गए. जिस रूप में यह महामारी आई उसी मुस्तैदी से सरकार और समाज ने मिलकर इसे नियंत्रित किया, वह काबिले तारीफ है. भारत जैसे देश में जहां पर स्वास्थ्य मानक बहुत अच्छे नहीं हों और आधारभूत स्वास्थ्य सुविधाओं का भी संकट हों, वहां पर कोविड का कहर आशंका से कम है.

आज विश्व टीबी दिवस है पर कोविड की बात पहले इसलिए, क्योंकि सवा साल पहले तक हम टयूबरकुलोसिस को ही सबसे खतरनाक संक्रामक बीमारी मान रहे थे. हैरत की बात यह है कि इलाज होने के बावजूद 2016 से 2018 के बीच में टीबी के कारण देश में तकरीबन 184000 लोग मारे गए थे. यह संख्या कम नहीं है ! फिर सवाल उठता है कि आखिर क्यों टीबी को दूर भगाने की रफ्तार और रणनीति वैसी नहीं रही है, जैसी कि कोविड19 के खिलाफ देखी है ?

कोरोनाकाल में भारत में टीबी की बात की ही जानी चाहिए. कोविड का कोई इलाज नहीं होने से, एकदम नया होने से, अमीर—गरीब किसी भी तबके को बराबरी से प्रभावित करने से, वैश्विक प्रभाव होने से यह एक महामारी के रूप में सामने आया और इसका असर भी दिखा. दुनिया के सारे राजनीतिक नेतृत्वों की प्राथमिकता में यह बना, पर यदि भारत के संदर्भ में हम देखें तो टीबी भी एक खतरनाक स्तर तक समाज में व्याप्त है, पर वैसी चेतना कभी भी दिखाई नहीं दी, हमें इसके सामाजिक—राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक कारणों का विश्लेषण करके यह समझना चाहिए कि ऐसा क्यों नहीं हो सका है?

बहरहाल सतत विकास लक्ष्यों में टीबी भी एक बिंदु है, जिसे 2030 तक खत्म करके जवाब देना है. नरेंद्र मोदी सरकार ने 2017 में टीबी को पूरी तरह से दूर करने के लिए एक रणनीति बनाई भी है और तय समय से बहुत पहले यानी 2025 तक इसे पूरे देश से दूर करने का लक्ष्य रखा है. यह एक कठिन, किंतु जरूरी पहल है.
हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि हम आंकड़ों को सही रूप में स्वीकार करें. जैसा कि संसद में बताया गया है कि वर्ष 2020 में टीबी के मामलों में लगभग 25 प्रतिशत की कमी आई है. यह एक अप्रत्याशित सा आंकड़ा है. ऐसा कैसे हो सकता है कि सबसे संकटकाल की स्थिति में जबकि स्वास्थ्य या पोषण का गंभीर संकट रहा हो, तब टीबी जैसा संक्रामक रोग इस लेवल पर कम हुआ हो. इसके सही और गलत मानने के कुछ कारण हो सकते हैं. सही इसलिए माना जा सकता है, क्योंकि जिस स्तर की स्वास्थ्य चेतना समाज में आई है, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, साफ—सफाई, पोषण, अपनी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का असर दूसरी बीमारियों पर भी दिखाई देने लगा है.

अगर इनमें से कुछ पर पहले ध्यान दिया जाता तो शायद टीबी सालों साल तक भारत की इतनी बड़ी बीमारी नहीं बनी होती. टीबी पेंशेंट की संख्या में कमी को स्वीकार नहीं करने का एकमात्र कारण यह हो सकता है कि महामारी के दौर में उसका ठीक—ठाक नोटिफिकेशन हुआ ही न हो. बहरहाल सरकार टीबी का राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण प्रक्रिया में हैं और उसके नतीजे भी शीघ्र आने की उम्मीद की जा रही है, इसके बाद ही टीबी की दशा और दिशा तय हो पाएगी.

टीबी कोई आज की बीमारी नहीं है. इंडियन मेडिकल रिसर्च कौंसिल के पर्चों में जब हम इस बीमारी को खोजते हैं तो पाते हैं कि 1900 की शुरुआत में प्रति एक लाख लोगों पर आठ सौ लोग टीबी से प्रभावित थे. 1920 तक चार सौ लोग इससे इससे प्रभावित पाए गए. 1950 में हमारे देश में प्रति लाख आबादी पर यह आंकड़ा 200 तक पहुंचा था। मंजिल अभी बहुत दूर है.चूंकि टीबी गरीब तबके की बीमारी अधिक है और उसका सीधा संबंध पोषण, आवास और सफाई व्यवस्था से है, तो इसकी रणनीति भी उसी तरह से तैयार होनी चाहिए. प्रधानमंत्री आवास और समग्र स्वच्छता अभियान के माध्यम से इन दो बिंदुओं पर देश में बेहतर काम हुआ है, जो कहीं न कहीं इस तरह की संक्रामक बीमारियों की रोकथाम में बहुत मददगार साबित होगा, लेकिन पोषण को लेकर अभी और काम करने की जरूरत है. पोषण में विविधता लाने के लिए सरकार अपने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और जोड़ सकती है.

पोषण से भी मतलब केवल सब्जी रोटी नहीं अपितु संतुलित भोजन से माना जाना चाहिए. इसलिए यहां पर केवल टीबी का इलाज मुहैया करा भर देने से टीबी का खात्मा संभव नहीं है, यह तब मुमकिन होगा जबकि देश में लोगों को रोग प्रतिरोधक ताकत बनाए रखने के लिए संतुलित आहार भी मिले. इसके लिए लोगों को स्थानीय समाज में मिलने वाले पोषक तत्वों की ओर जाना होगा. ऐसे मरीजों को को गरम और पके हुए भोजन के साथ भी जोड़ सकती है, क्योंकि सरकार बच्चों को ऐसा भोजन पहले से ही उपलब्ध करवा रही है. सरकार टीबी मरीज को इलाज के दौरान पांच सौ रुपए की सहायता राशि हर महीने उपलब्ध करवाती है. यह राशि बढ़ाकर भी टीबी को दोगुनी गति से रोकने और समाज से उखाड़ फेंकने में एक बड़ी कोशिश की जा सकती है.

सरकार की ओर से टीबी का निशुल्क इलाज है. यह इलाज किसी भी गैर सरकारी इलाज से कमतर नहीं है. इसके बावजूद पिछले सालों में प्राइवेट अस्पतालों में टीबी पेशेंट की संख्या बढ़ी है और दूसरी ओर सरकारी संस्थानों में लोगों का आना कम हुआ है. यानी लोगों में कहीं न कहीं एक भ्रांति है, जिसकी वजह से वह महंगे इलाज को चुन रहे हैं. टीबी का इलाज गरीबी में और गरीब करने का काम करता है. इसके इलाज के लिए घर—बार, जमीन बेचने की खबरें भी लगातार आती हैं, जरुरत इस बात की है कि लोगों को समझाया जाए कि टीबी का सरकार बेहतर और निशुल्क उपचार कर रही है.

कोविड के बाद लोगों ने टीके की अहमियत को भी नए सिरे से समझा है. कोविड की रोकथाम केवल टीके के माध्यम से की जा सकती है, सभी लोग उस टीके का बेसब्री से इंतजार भी कर रहे थे, लेकिन हैरत की बात है कि जिन बीमारियों का टीका देश में उपलब्ध था, उनके प्रति लोगों की अरुचि अब तक क्यों रही ? आंकड़े बताते हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद देश में टीकाकरण में पर्याप्त सुधार नहीं हो पाया और अब भी वह शत-प्रतिशत के आंकड़े को नहीं छू रहा है. देश में तकरीबन 35 प्रतिशत बच्चों का पूर्ण टीकाकरण आज भी नहीं हो रहा है. टीबी जैसे बीमारी का टीका भी देश में उपलब्ध है, लेकिन उसके प्रति समाज के एक बड़े तबके में उदासीनता क्यों है? कोविड का एक सबक यह भी है कि हमारी स्वास्थ्य चेतना को भी हम एक श्रेष्ठ स्तर तक पहुंचाएं और ऐसी हर पहल का दिल खोलकर स्वागत करें, जिससे भारत एक स्वस्थ भारत बन पाए. टीबी जैसी बीमारी को 2025 तक लात मारकर भगाएं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

और भी पढ़ें

facebook Twitter whatsapp
First published: March 24, 2021, 11:00 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर