विश्व जल दिवस: जरूरी होता जा रहा है पानी का मोल पहचानना, लेकिन...

पानी की बर्बादी के साथ ही जो पानी और पानी के स्त्रोत को प्रदूषण से भी बचाया जाना चाहिए. ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986’ और ‘जल प्रदूषण रोकथाम एवं नियंत्रण अधिनियम 1974’ के प्रावधानों के अनुसार औद्योगिक इकाइयों को अपशिष्ट शोधन संयंत्र लगाना चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: March 22, 2021, 4:05 PM IST
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विश्व जल दिवस: जरूरी होता जा रहा है पानी का मोल पहचानना, लेकिन...
फोटो क्रेडिट- UNREFUGEE
कुछ साल पहले तक पानी की बर्बादी वाले विज्ञापन खूब और लगातार आते थे. अभी उस तरह कुछ ज्यादा दिखाई नहीं देता। सामान्यत: पानी की कोई बहुत चिंता भी नजर नहीं आती. इसका एक मतलब तो यह है कि हमने पानी की वह बेहतर स्थिति हासिल कर ली है. जहां हमें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं हैं या दूसरा हमने अपनी तकनीकों को उतना संपन्न बना लिया है कि हम किसी भी परिस्थिति में अपने लिए पानी का जुगाड़ (दोहन) कर ही लेते हैं. पर ऐसा है नहीं, जहां से विषयों के विमर्श तय होकर आगे जाते हैं वहां निश्चित ही इन बुनियादी चीजों का अभाव नहीं होता होगा, वहां यह बुनियादी आवश्यकताएं सुभीते से पूरी हो जाती होंगी. इसलिए ऐसे विषयों पर संवेदनशीलता नहीं बनती होगी और वह व्यापक बहस में नहीं आ पाते हैं. आप टीवी चैनल देख लीजिए, नेताओं के भाषण सुन लीजिए, नीति—नियंताओं के एजेंडे देख लीजिए.

पानी की चिंता को दो सिरों से देखने की जरूरत है, एक वह शहर जहां कि तेजी से आबादी बढ़ रही है. शहरों की जरूरतें बढ़ रही हैं और दूसरा ग्रामीण भारत, जिसकी बुनियाद खेती पर टिकी है और खेती के लिए पानी की जरूरत है. 2001 तक देश की आबादी का महज 28 प्रतिशत हिस्सा शहरों में रहता था, लेकिन इसके अगले दशक में शहरी आबादी बढ़कर 30 प्रतिशत तक पहुंच गई है. ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि यह 2030 तक बढ़कर 40 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी. यानी एक मोटे अनुमान के तहत 2030 तक शहर में तकरीबन 60 करोड़ लोग रहने लगेंगे.

ऐसे में शहरी आबादी को बुनियादी जरूरतें भी बढ़ेंगी और इनका पूरा कर पाना भी एक चुनौती होगा. दूसरी ओर कृषि में भी लगातार ऐसी फसलें ज्यादा ली जा रही हैं, जिनमें पानी अधिक लगता है. जाहिर है कि चाहे शहर हो या गांव पानी आने वाले वक्त का प्रमुख मसला होगा. यह भी सही है कि पानी का उत्पादन मनुष्य के हाथ में नहीं है. इसलिए इसे कुशल प्रबंधन के जरिए ही पूरा किया जा सकता है.
देश में पानी की उपलब्धता लगातार घट रही है, इसलिए इस पर बहुत सचेत होकर सोचने की जरूरत है. केंद्रीय जल शक्ति व सामाजिक न्याय व सशक्तिकरण राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया ने मार्च, 2020 में जानकारी दी कि साल 2001 में देश में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1,816 घनमीटर थी, जो साल 2011 में घटकर 1,545 हो गई. साल 2021 में ये घटकर 1,486 घनमीटर और साल 2031 में 1,367 घनमीटर हो सकती है.


दूसरी ओर नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के सहयोग से हाइड्रोलॉजिकल मॉडल और वाटर बैलेंस के जरिए सेंट्रल वाटर कमीशन ने 2019 में “रिअसेसमेंट ऑफ वाटर एवलेबिलिटी ऑफ वाटर बेसिन इन इंडिया यूजिंग स्पेस इनपुट्स” रिपोर्ट में बताया है कि देश जल संकट के दौर से गुजर रहा है. सीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट कहती है कि देश में हर साल भूजल की मात्रा 0.4 मीटर घट रही है. इन सभी का मतलब यह है कि हमें पानी के मसले पर बेहतर प्रबंधन के माध्यम से आगे बढ़ना चाहिए. बेहतर प्रबंधन पर्यावरण और हमारे प्राकृतिक संसाधनों को लंबे समय तक बचाए रखने की चेतना पर आधारित होना चाहिए.

इसी देश में कई इलाके ऐसे हैं जहां लोग अपने—अपने प्राकृतिक वातावरण में अपने देसज ज्ञान के सहारे पानी का बेहतर प्रबंधन कर रहे हैं. बाड़मेर जैसे अत्यंत कम वर्षा वाले इलाकों में भी वह पानी का रोना नहीं रोते हैं, जितना मिलता है, उसको वह अपने घर—खेत में ऐसे रमाते हैं कि उन्हें कभी मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता. लेकिन सभी जगह ऐसे उदाहरण नहीं मिलते. समाज अपने स्तर पर काम करते कम दिखता है और जब दिक्कतें आती हैं तो सरकार की तरफ टुकर—टुकर देखने लग जाता है.

सारी जिम्मेदारी सरकार के सिर आ जाती है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि जिस अनुपात में हमारी जरूरतें बढ़ रही हैं, उस अनुपात में अगर संसाधनों का संरक्षण नहीं किया गया तो इन मुश्किलों का हल करना किसी के भी बस में नहीं रहेगा. आज भले ही भोपाल, इंदौर जैसे शहरों में हम सत्तर—अस्सी किलोमीटर दूर नर्मदा से पानी ला रहे हो, लेकिन एक नर्मदा किस—किस का और कब तक पेट भरेगी. दिल्ली में यमुना की चिंता कौन करेगा. हर शहर की अपनी नदियां, अपने तालाब, अपने कुएं बाबड़ियां हैं, उनमें केवल पानी नहीं हमारी संस्कृति भी रची—बसी है. हम उसे बचाने की ईमानदार पहल कब शुरू करेंगे. हम खेती के ऐसे कौन से तौर तरीकों का इस्तेमाल करेंगे जिससे पानी कम से कम बर्बाद हो.


पानी की बर्बादी के साथ ही जो पानी और पानी के स्त्रोत को प्रदूषण से भी बचाया जाना चाहिए. ‘पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986’ और ‘जल प्रदूषण रोकथाम एवं नियंत्रण अधिनियम 1974’ के प्रावधानों के अनुसार औद्योगिक इकाइयों को अपशिष्ट शोधन संयंत्र लगाना चाहिए. जो भी अपशिष्ट कारखानों से बाहर जाएगा उसके लिए तमाम मानक निर्धारित किए गए हैं, लेकिन किसी भी ऐसे किसी भी औद्योगिक इलाके में जाकर देखा जा सकता है कि उनका पालन नहीं किया जा रहा है.

कई ऐसी भी खबरें मिली हैं कि औद्योगिक इकाईयों ने अपने कारखानों के अंदर गहरे बोलवेल करके अपशिष्ट उसमें डाल रहे हैं, यह निश्चित तौर पर पर्यावरण और पानी के लिए नुकसानदायक है. कानून तो हैं, पर जब तक इन कानूनों का क्रियान्वयन तेजी से नहीं होगा तब तक कोई बुनियादी बदलाव नहीं हो पाएगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
राकेश कुमार मालवीय

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: March 22, 2021, 4:05 PM IST
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