बिहार की राजनीति का कल: भाजपा और तेजस्वी

ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) को मिली पांच सीटें इस बार सबको चौंका रही हैं. एआईएमआईएम ने इस बार 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. जिनमें 14 सीमांचल की थीं.

Source: News18 Bihar Last updated on: November 11, 2020, 2:08 PM IST
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बिहार की राजनीति का कल: भाजपा और तेजस्वी
बिहार में नई सरकार का गठन आज होना है
कोविड काल के दौरान हुआ चुनाव इतनी सरगर्मी लेकर आएगा, इसका आकलन मुश्किल था. अब जब मतगणना शुरू होने के 24 घंटे बाद तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई है और 243 सीटों वाली विधानसभा में 125 सीटें लाकर एनडीए की सरकार बननी तय है, तो इस चुनाव परिणाम के संकेतों को समझा जा सकता है. एग्जिट पोल के उलट चुनाव परिणाम सबको अचंभित तो कर रहा है, पर यह स्पष्ट है कि बिहार के मतदाता दिग्भ्रमित तो कतई नहीं दिखे. उनका जनादेश स्पष्ट है. पर आप ऐसा नहीं कह सकते कि यह सीधे तौर पर राजग गठबंधन के पक्ष में और महागठबंधन को खारिज करने वाला रहा. कांटे के मुकाबले का यह परिणाम बिहार का आज ही नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति के कल का भी आईना है. इस चुनाव में भाजपा और तेजस्वी का उभार सबसे अहम है.

अब तक थर्ड प्लेयर के तौर पर खेल रही वर्तमान में देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा जिसने 74 सीट पर जीत हासिल की है, पहली बार सत्ता में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर होगी, जाहिर है सत्ता में बड़ी भागीदार भी होगी. वहीं 43 सीट लाकर भी नीतीश कुमार भले ही मुख्यमंत्री रहें पर अब भाजपा सहयोगी की भूमिका में नहीं रही. इसका असर सरकार की नीतियों, प्राथमिकता से लेकर कार्यप्रणाली में दिखना स्वाभाविक ही रहेगा. दूसरी ओर, राज्य में सबसे बड़े दल के तौर पर एक बार फिर उभरे राजद को एक स्थापित नेता मिल गया है. अब तक जो भी तेजस्वी यादव के नेतृत्व क्षमता या योग्यता पर सवाल उठाते रहे हैं, उन्हें अपने तरकश में नए तीर तलाशने होंगे. बिना अपने पिता लालू यादव की छत्रछाया के सर्वाधिक 23 फीसदी वोट लाकर तेजस्वी ने यह साफ कर दिया है कि अब वह बिहार की राजनीति के नए केंद्र बनने जा रहे हैं. 2015 की तुलना में भले ही राजद को 5 सीटें कम मिली हों, लेकिन वोट शेयर करीब 5 फीसदी बढ़ाने में कामयाब रहे.

नीतीश के खिलाफ मोर्चाबंदी काम कर गई
इस जनादेश ने राजग को फिर सत्ता में लाकर जरूर बैठा दिया हो, लेकिन भाजपा के लिए यह जितना मुफीद रहा, जदयू के लिए उतना ही निराशाजनक. 2015 में 101 सीटों पर चुनाव लड़कर 71 सीटें लाने वाली पार्टी इस बार 115 सीटों पर मुकाबला कर महज 43 सीटों पर सिमट गई. हालांकि वोट शेयर के हिसाब से देखा जाए तो यह नुकसान इतना बड़ा नहीं दिखता है. 2015 में जदयू को वोट प्रतिशत 16.8 रहा था, वहीं इस बार यह 15.4 फीसदी रहा है. पर अपेक्षाकृत अधिक सीटों पर लड़कर भी वोट प्रतिशत का घटना पिछले चुनाव के मतदाताओं का उससे दूर जाने का नतीजा है. पिछले चुनाव में वह राजद के साथ महागठबंधन का हिस्सा थी, जिसका फायदा यादव और मुस्लिम वोट के रूप में उसे मिला, लेकिन इस बार यह एडवांटेज उसके साथ नहीं रहा. नीतीश के खिलाफ की गई मोर्चाबंदी पूरी तरह से कामयाब रही.
भाजपा के वोटर लोजपा के कारण दिग्भ्रमित रहे
अपने कोर वोटर को इंटैक्ट रखने के बावजूद वह उसे परिणाम में बदल नहीं सकी. यादव और मुस्लिम वोटों के नुकसान की भरपाई उसे भाजपा के वोटरों खासकर सवर्ण वोटरों से करनी थी. पर भाजपा के वोटर लोजपा के कारण दिग्भ्रमित रहे. भाजपा की बी टीम के तौर पर खुद को बखूबी प्रचारित कर लोजपा अपने खाते में भाजपा के वोटरों को लाने में कुछ हद तक कामयाब रहा. भले ही लोजपा के खाते में महज एक सीट गई हो लेकिन जदयू की सीटों पर वह कई जगह त्रिकोणीय मुकाबले में रही, तो लगभग हर जगह तीसरे नंबर पर रही. कई सीटों पर नजदीकी मुकाबला होने के कारण कई सीटों पर जदयू की हार का अंतर लोजपा को मिले वोटों से काफी कम रहा. जिन सीटों पर लोजपा लड़ी वहां उसे औसतन आठ से दस हजार वोट मिले. यह नीतीश की हार का बडा कारण रहा.

यानी नीतीश के प्रत्याशी जहां लगभग हर सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले में थे, वहीं भाजपा के प्रत्याशी जहां कि लोजपा ने अपने उम्मीदवार नहीं दिए थे, वह सीधी टक्कर में रही. यहां भागलपुर के चुनाव परिणाम का जिक्र करना रोचक होगा. भाजपा की सीट होने के बावजूद यहां लोजपा ने अपना उम्मीदवार उतारा था. इस सीट पर कांग्रेस ने अपनी सीट बरकरार तो रखी पर अंतर सिर्फ 1113 वोटों का रहा. दूसरे नंबर पर भाजपा रही, लेकिन रोचक यह है कि तीसरे नंबर पर रहे लोजपा उम्मीदवार को यहां 20 हजार से अधिक वोट मिले. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि लोजपा यदि भाजपा की सीटों पर भी अपने उम्मीदवार देती तो उसे नुकसान हो सकता था.
वामदलों और ओवैसी की जीत के मायने
इस बार महागठबंधन में शामिल वामदलों को चुनाव में भरपूर समर्थन मिला. 28 सीटों पर चुनाव लड रहे वामदलों को 18 सीटों पर कामयाबी मिली है. जबकि पिछली बार वामदलों के गठबंधन को सिर्फ तीन सीटें मिली थीं, जो कि सीपीआईएमएल की थीं. सीपीआईएमएल ने इस बार 19 सीटों पर चुनाव लड़कर 12 में जीत हासिल की. दो-दो सीटें सीपीआई और सीपीआईएम के खाते में गई हैं. गरीब-गुरबा और मजदूरों के लिए संघर्ष करने वाली पार्टी माने जाने वाली सीपीआईएमएल का यह उभार कई मायनों में महत्वपूर्ण है. उन इलाकों में जहां वामदलों का अस्तित्व है, वहां महागठबंधन दलितों के वोटों को एकजुट रखने में कामयाब रहा और लोजपा कुछ खास नहीं कर सकी. लेकिन ऐसी सीटों पर जहां वामदल प्रभावी नहीं रहे, महागठबंधन दलितों को बांधे नहीं रख सका. शायद इसका कारण तेजस्वी के साथ किसी बड़े दलित नेता या महागठबंधन में दलित आधार वाली पार्टी का ना होना रहा. अंत समय में वीआईपी का अलग होना तेजस्वी के लिए झटका ही साबित हुआ. लोजपा और बसपा ऐसी सीटों पर अपने कोर वोटर जोडे रख सकी.

ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को मिली पांच सीटें इस बार सबको चौंका रही हैं. एआईएमआईएम ने इस बार 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. जिनमें 14 सीमांचल की थीं. सीमांचल में उसने पांच सीटें जीती हैं. पिछले साल अमौर के उपचुनाव से बिहार में अपना खाता खोलने वाली एआईएमआईएम इतनी जल्दी अपना ऐसा विस्तार कर लेगी ऐसा किसी राजनीतिक पंडित ने सोचा नहीं था. इन इलाकों में तीसरे और अंतिम चरण में मतदान हुआ. पहले चरण में महागठबंधन को मिलती बढत तीसरे चरण जाते-जाते धुमिल हो गई.


मुस्लिमों ने ओवैसी की पार्टी पर भरोसा दिखाया
पहले चरण के रोजगार के एजेंडे से शुरू हुआ चुनाव प्रचार तीसरे चरण तक ध्रुवीकरण में बदल गया. यहां तक कि नीतीश कुमार भी यह बयान देते नजर आए कि किसी को देश से बाहर नहीं भेजा जा सकता. जिन पांच सीटों पर ओवैसी की पार्टी ने जीत दर्ज की है उनमें से चार सीटों अमौर, कोचाधमान, बहादुरगंज, बैसी पर महागठबंधन के प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहे हैं, जबकि जौकीहाट में दूसरे नंबर पर रही राजद भाजपा से महज दो हजार वोटों से आगे रही. यानी सीमांचल में मुकाबला एआईएमआईएम और राजग में रहा, वह भी तब जब 2015 में इनमें से तीन सीटें महागठबंधन के पास थीं. मुस्लिमों ने ओवैसी की पार्टी पर भरोसा दिखाया और एकजुट वोट किया, जिसका सीधा-सीधा नुकसान कई सीटों पर महागठबंधन को हुआ. बिहार में एआईएमआईएम अल्पसंख्यक समुदाय के लिए नए विकल्प के तौर पर उभरा है, जो कि आगे भी बिहार के राजनीतिक समीकरण को तय करती रहने की स्थिति में होगी. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
रंजीत प्रसाद सिंह

रंजीत प्रसाद सिंहपत्रकार

दो दशक से पत्रकारिता जगत में सक्रिय. प्रभात खबर और हिंदुस्तान में संपादक रह चुके हैं. समसामयिक विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं. फोटोग्राफी का शौक रखते हैं.

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First published: November 11, 2020, 1:42 PM IST
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