बिहार चुनाव: रामविलास के बाद लोजपा-2 और चुनावी चक्रव्यूह

लोजपा (LJP) के गठन के बाद यह पहला मौका है जब वह बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election) में बिना पूर्व चुनावी गठबंधन के उतर रही है. वैसे, यह कहना कि लोजपा गठबंधन को साध न सकी, सही नहीं होगा. लोजपा ने यह राह खुद चुनी है. वोट बैंक के गुणा-भाग और राजनीतिक जोड़तोड़ (जिसमें गठबंधन दल की सहमति भी संभव हो) ने लोजपा को अकेले मैदान में ला खड़ा किया है. यह कुछ-कुछ 2005 की पुनरावृत्ति जैसा ही है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 10, 2020, 1:47 PM IST
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बिहार चुनाव: रामविलास के बाद लोजपा-2 और चुनावी चक्रव्यूह
लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान का गुरुवार को निधन हो गया.
20 साल की लोजपा (LJP) ने अपना अभिभावक ऐसे समय खोया है जब उसकी राजनीति एक और चुनावी चक्रव्यूह में फंसी है. व्यक्ति आधारित पार्टी का जनाधार उसके नेता के जीवन की राजनीतिक कमाई होती है. अब देखना यह कि रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) द्वारा कमाया गया यह जनाधार क्या लोजपा-2 (LJP-2) या कहें बेटे चिराग पासवान (Chirag Paswan) को विरासत में मिल पाता है या नहीं. चिराग के लिए यह पहला विधानसभा चुनाव होगा जब पार्टी की बागडोर उनके कंधों पर होगी और वह भी अपने राजनीतिक गुरु पिता के बिना. भारतीय राजनीति में पांच दशक गुजार चुके रामविलास पासवान ने अपने स्वास्थ्य कारणों को देखते हुए न सिर्फ अभिनेता बेटे चिराग पासवान को बिहार की राजनीति में, बल्कि लोजपा में भी स्थापित कराया.

राजनीति के मौसम विज्ञानी कहे जाने वाले रामविलास पासवान ने विभिन्न गठबंधन सरकारों में छह प्रधानमंत्रियों के साथ मंत्रिमंडल में काम किया. गठबंधन की राजनीति के खेल में इक्का हमेशा रामविलास के पास रहा. लोजपा के गठन के बाद यह पहला मौका है जब वह बिहार विधानसभा चुनाव में बिना पूर्व चुनावी गठबंधन के उतर रही है.

वैसे, यह कहना कि इस बार लोजपा गठबंधन को साध न सकी, सही नहीं होगा. लोजपा ने यह राह खुद चुनी है. जाहिर है वोट बैंक के गुणा-भाग और राजनीतिक जोड़तोड़ (जिसमें गठबंधन दल की सहमति भी संभव हो) ने लोजपा को अकेले मैदान में ला खड़ा किया है. यह कुछ-कुछ 2005 की पुनरावृत्ति जैसा ही है, जब रामविलास पासवान यूपीए का हिस्सा होते हुए भी बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ तो रहे, पर लालू यादव पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए राजद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ रही लोजपा को इसका जबरदस्त फायदा मिला और उसने 178 सीटों पर प्रत्याशी उतारकर 29 सीटों पर जीत हासिल की. हालांकि, वह इस राजनीतिक बढ़त को अवसर में बदलने से चूक गई और राज्य को राष्ट्रपति शासन की ओर धकेल दिया गया. लेकिन कुछ महीने बाद दुबारा हुए चुनाव में यह फॉर्मूला काम नहीं आया और लोजपा 29 सीटों से घटकर 10 पर आ गई. और यहीं से नीतीश मजबूत और लालू के विकल्प के रूप में उभरे.

इस चुनाव में भी लोजपा ने ‘भाजपा से बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं’ का नारा दिया है. अंतर है तो सिर्फ इतना कि लोजपा तो भाजपा को अपना कह रही है, और भाजपा अब तक इससे परहेज करते दिख रही है. पर अभी चुनाव तो शुरू हुआ है, प्रचार के दौरान भाजपा का शीर्ष नेतृत्व खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों में यदि रामविलास पासवान के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ शब्द भी गूंजते हैं तो वह लोजपा के लिए संजीवनी होगी.
भाजपा के कोर वोटर में ऐसे भी यह संदेश पैठ बना चुका है कि लोजपा को वोट देने से भाजपा ही मजबूत होगी. साथ ही रामविलास पासवान के निधन के बाद लोजपा को अपना वोट बैंक एकजुट रखना थोड़ा आसान हो सकता है. अब तक के टिकट बंटवारे को देखें तो लोजपा सवर्णों और दलितों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है, जो उसे भाजपा के वोटरों के और नजदीक ले जा रहा है. रामविलास पासवान ने अपने 2005 के अनुभवों से चिराग को इस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता जरूर बताया होगा.

लोजपा के लिए चिंता की बात यह भी है कि 2005 के फरवरी में 178 और अक्टूबर में 200 से ऊपर सीटों पर चुनाव लड़ने के अलावा वह सीमित सीटों पर चुनाव लड़ते आ रही है. 2010 में राजद के साथ उसने 75 सीटों पर प्रत्याशी उतारे. वहीं, 2015 में एनडीए में रहते हुए लोजपा के खाते में 42 सीटें आईं. इन दोनों चुनाव में उसे क्रमशः महज 3 और 2 सीटों पर जीत मिल सकी. घटती सीटों के कारण लोजपा के राज्य स्तर पर कुल वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आई. 2005 के फरवरी में 13 फीसदी और अक्टूबर में 11 फीसदी वोट हासिल करने वाली पार्टी 2010 में 6.74 फीसदी और 2015 में 4.83 फीसदी पर सिमटती चली गई. 15 सालों के लंबे अंतराल के बाद लोजपा करीब 150 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार है. पार्टी को फंड की कमी भले न आड़े आए, लेकिन संगठन की कमी सिरदर्द बन सकती है. हालांकि, चिराग ने चुनाव के पहले कई यात्राएं कर पूरे राज्य में संगठन बनाने की कोशिश जरूर की, लेकिन वह कितना कारगर होता है यह तो प्रचार और मतदान में ही नजर आएगा.

पर अब देखना यह होगा कि वर्तमान में महज 2 विधायकों वाली लोजपा 2005 का करिश्मा दुहराती है और किंगमेकर की भूमिका में आ पाती है या नहीं वह भी अपने सर्वेसर्वा नेता रामविलास पासवान के बिना. हालांकि इसका पता तो 10 नवंबर को ही चल पाएगा, पर यह तय है कि बिहार की राजनीति के सितारे रामविलास पासवान इस चुनाव में भी अपना प्रभाव जरूर छोड़ जाएंगे. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
रंजीत प्रसाद सिंह

रंजीत प्रसाद सिंहपत्रकार

दो दशक से पत्रकारिता जगत में सक्रिय. प्रभात खबर और हिंदुस्तान में संपादक रह चुके हैं. समसामयिक विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं. फोटोग्राफी का शौक रखते हैं.

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First published: October 10, 2020, 1:47 PM IST
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