जितिन प्रसाद से पहले उनके पिता का भी कांग्रेस और गांधी परिवार से हुआ था मोहभंग

अब जब प्रसाद भाजपा में शामिल हो चुके हैं. तो ज़रूरी है कि उस गुजरे वक्त को याद किया जाए जब आज से दो दशक पहले वह राजनीति के अखाड़े में कूदे नहीं थे. ये वो घटनाक्रम हैं जो इस लेख के लेखक की दो किताबों ‘सोनिया ए बायोग्राफी’ (पेंगुइन) और ’24, अकबर रोड’[Hachette]. में दर्ज है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 9, 2021, 7:00 PM IST
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जितिन प्रसाद से पहले उनके पिता का भी कांग्रेस और गांधी परिवार से हुआ था मोहभंग
जितिन प्रसाद बुधवार को भाजपा में शामिल हो गए (फाइल फोटो)
आखिर कांग्रेस जितिन प्रसाद को भाजपा में शामिल होने से रोक नहीं सकी, इसके पहले उनकी 2019 में पार्टी छोड़ने की खबर उठी थी. उत्तर प्रदेश चुनाव से ठीक पहले जितिन प्रसाद का भाजपा में शामिल होना कांग्रेस के लिए एक बड़ा नुकसान साबित हो सकता है. 2019 के लोकसभा चुनाव में धौरहरा संसदीय सीट पर बुरी तरह हारने के बाद, प्रसाद परिवार की दूसरी पीढ़ी के कांग्रेस के साथ रिश्ते में लगातार खटास चल रही थी.

ज्योतिरादित्य सिंधिया जिन्होंने 2019 में लोकसभा चुनाव में गुना की सीट हारी थी, उन्होंने भी अपनी हार के लिए प्रसाद की तरह राहुल गांधी को ज़िम्मेदार ठहराया था. प्रसाद पार्टी के सभ्य और सशक्त नेताओं में से एक थे, जिन्हें यूपीए सरकार के दौरान सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, और सचिन पायलट की तरह टीम राहुल का हिस्सा माना जाता था. प्रसाद को पेट्रोलियम और नेचुरल गैस राज्य मंत्री और बाद में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री का प्रभार मिला था. 2014 से 2021 के बीच इन्हें संस्थान से जुड़ी कई जिम्मेदारियां दी गई जिसमें, यूपीसीसी का कार्यकारी अध्यक्ष, कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य और हाल ही में बंगाल चुनाव के दौरान ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के बंगाल के इंचार्ज बनाना शामिल था. वह राहुल गांधी के कई कामों में अहम भूमिका में रह चुके थे, जिसमें पार्टी का 2009 में वाय. एस. राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद जगन मोहन रेड्डी को पार्टी में रोक पाने का असफल प्रयास भी शामिल था.

प्रसाद की सोनिया और राहुल गांधी से दुश्मनी की फेहरिस्त बहुत लंबी थी. प्रसाद राहुल गांधी के एआईसीसी के सचिवालय में होने वाले पीढ़ी दर बदलाव को लेकर विमुखता से नाराज थे.

दिलचस्प यह है कि 23 मार्च, 2019 को इस पुरानी पार्टी के ब्राह्मण चेहरे को दल बदलने से रोकने का काम किया खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जो मार्च 2020 में बीजेपी में शामिल हो गए थे. बताया जाता है कि सिंधिया के पास प्रियंका गांधी का फोन आया था कि वह प्रसाद को ऐसा करने से रोकें. सिंधिया उस वक्त यूपी के पश्चिमी क्षेत्र के प्रभारी थे.
कुछ वक्त तक सिंधिया भी थे संपर्क में
सिंधिया पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रसाद के साथ उनके भाजपा में शामिल होने के कुछ वक्त पहले तक संपर्क में थे. पूर्व महाराजा ना सिर्फ प्रसाद के प्रेरणास्रोत थे बल्कि उन्होनें प्रसाद के मन में पनप रहे दुख को दूर करने का वादा भी किया था. ऐसा माना जाता है कि धौरहरा की लोकसभा सीट के उम्मीदवार प्रसाद अपने पड़ोसी सीतापुर और लखीमपुर खीरी सीट से कांग्रेस के अल्पसंख्यक समुदाय से उम्मीदवार कैसर जहान और ज़फर अली नकवी के चुने जाने को लेकर भी नाराज़ थे. जब उन्होंने पड़ोस के चुनावी क्षेत्रों में दो मुस्लिम की उपस्थिति को लेकर विरोध दर्ज किया, तो उन्हें लखनऊ से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव मिला जहां से वर्तमान के रक्षा मंत्री राजनाथ मैदान में थे. इस प्रस्ताव ने प्रसाद के गुस्से की आग में और घी डालने के काम किया.

अब जब प्रसाद भाजपा में शामिल हो चुके हैं. तो ज़रूरी है कि उस गुजरे वक्त को याद किया जाए जब आज से दो दशक पहले वह राजनीति के अखाड़े में कूदे नहीं थे. ये वो घटनाक्रम हैं जो इस लेख के लेखक की दो किताबों ‘सोनिया ए बायोग्राफी’ (पेंगुइन) और ’24, अकबर रोड’[Hachette]. में दर्ज है. पाठकों को पूरा घटनाक्रम समझाने के लिए जल्दी से इतिहास के कुछ पन्ने पलट लेते हैं, जिससे आज जो हुआ वो क्यों हुआ और उसकी जड़े कहां तक जाती हैं ये समझना आसान होगा. और सितंबर 2000 से 2001 एक के बीच ऐसा क्या हुआ था जब प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता थे.राजीव गांधी के राजनीतिक सचिव थे जितिन के पिता
जितेंद्र प्रसाद राजीव गांधी के राजनीतिक सचिव थे. राजीव की मृत्यु के बाद, जित्ती भाई (कांग्रेसी उन्हें अक्सर इसी नाम से संबोधित किया करते थे) पी.वी.नरसिम्हाराव के करीबी हो गए. और 1991 से 1996 तक उनके राजदार रहे. जित्ती भाई की राव के साथ निकटता 10 जनपथ और वहां के खास नेता जैसे अर्जुन सिंह को नागवार गुजरी. जब जितेंद्र प्रसाद की 16 जनवरी 2001 को मृत्यु हुई, उनका कांग्रेस और गांधी से पूरी तरह से मोहभंग हो चुका था. यही नहीं इससे पहले जितेंद्र प्रसाद ने 2000 में सोनिया गांधी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़ा था. ये बात कम ही लोग जानते होंगे कि पार्टी के अंदरूनी चुनाव में सोनिया के खिलाफ खड़े होने को लेकर वो राजनीतिक साज़िश का शिकार हुए थे.
1985 से 1989 के दौरान जब राजीव गांधी सत्ता में थे और वो कांग्रेस के महासचिव और राजीव के राजनीतिक सचिव की भूमिका में थे उसी दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक करियर को संवारा. इस का परिणाम उन्हें 1991 से 1996 तक राव के करीबी होने के रूप में मिला.

राव के दौर में प्रसाद को अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी, शील दीक्षित जैसे नेताओं पर नजर रखने के लिए कहा जाता. प्रसाद यह काम बखूबी करते लेकिन इस बीच कांग्रेस की यूपी में पकड़ ढीली होती गई. वह राज्य जो अपनी आबादी और क्षेत्रफल की वजह से राजनीति में मायने रखता है. 543 सदस्य की लोकसभा में जब कांग्रेस ने 85 संसदीय सीट से अपना अधिकार गंवा दिया, उसके बाद वो कभी भी राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बना पाई.

जितेंद्र प्रसाद सोनिया गांधी के खिलाफ जाने के दौरान राजनीतिक हालातों को भांप नहीं सके. प्रसाद को चुनाव में सोनिया को हराने को लेकर किसी तरह का कोई भ्रम नहीं था क्योंकि पूरा माहौल उनके पक्ष में था. पूरी चुनाव प्रक्रिया उनके हाथों में थी जिसमें पोल ऑबजर्वर से लेकर रिटर्निंग ऑफिसर तक शामिल था. प्रसाद को इस बात का भरोसा था कि सोनिया उनसे मैदान छोड़ने को कहेंगी और बदले में उन्हें पार्टी में वरिष्ठ पद मिलेगा. नटवर सिंह और दिग्विजय सिंह जैसे नेता थे जो चाहते थे कि प्रसाद चुनाव लड़ें, वहीं सोनिया कैंप के कुछ नेता जैसे अर्जुन सिंह और विन्सेंट जॉर्ज की कोई और ही योजना चल रही थी.


एक वक्त ऐसा आया कि अब प्रसाद के पास सोनिया के खिलाफ लड़ने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था. सभी एआईसीसी पदाधिकारियों को सोनिया के समर्थन के लिए आदेश जारी कर दिया गया था, यही नहीं भोपाल, हैदराबाद, जयपुर और कुछ और जगह पर जब प्रसाद चुनाव के कैंपेन के सिलसिले में गए तो उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दरवाजे बंद मिले और साथ में वहां काले झंडों से उनका स्वागत किया गया. इस बीच समझौते की बात करने वाले उनके घर और 10 जनपथ के बीच चक्कर लगाते रहे इस दावे के साथ किसी फॉर्मूले पर काम हो रहा है, जो कि असल में नहीं हो रहा था.

नामांकन वापस लेने वाली तारीख पर, जित्ती भाई आखरी वक्त तक दिल से ये सोचते रहे कि 10 जनपथ से नाम वापस लेने का आदेश आ जाए और उनकी इज्जत बच जाए, इस तरह से वो पूरी तरह से अलग थलग पड़ गए, जित्ती भाई को समझ में आया की उनकी चाल असफल हो गई है. उत्तरप्रदेश के कुछ नेताओं के साथ उन्होंने अपना नामांकन दाखिल किया और सोनिया गांधी ने 99 फीसद वोट के साथ जीत दर्ज की. इस दौरान शांति का अवतार बन कर उभरे और दूसरे नेता जिन्होंने प्रसाद को ये कहकर उत्साहित किया था कि इससे सोनिया गांधी को सबक मिलेगा, कहीं नज़र नहीं आए. प्रसाद हार का सदमा बर्दाश्त नहीं कर सके, कुछ महीने बाद ही ब्रेन हेमरेज हो जाने से उनकी मौत हो गई. वो आदमी जो महलों के अंदर की इस साजिश को बहुत अच्छे से जानता था वो खुद उसका शिकार हो गया था.

प्रसाद का परिवार सितंबर 2000 और जनवरी 2001 के बीच का वो वक्त, वो तारीख कभी नहीं भूल सकता, जिसने उन्हें इतने कड़वे अनुभव और गहरे घाव दिये.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
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First published: June 9, 2021, 6:41 PM IST
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