कांग्रेस के ‘निगेटिव अभियान’ पर भारी पड़ा ‘शिवराज पर विश्वास’!

कांग्रेस ने शुरू से ही भाजपा के विरुद्ध ‘आक्रामक रवैया’ अपनाया. कभी ‘ग़द्दार’ तो कभी ‘बिकाऊ’ कह कर कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में गए विधायकों और उनके मुखिया ज्योतिरादित्य सिंधिया पर मुखर होकर हमला बोला. इसके विपरीत भाजपा ने शिवराज के नेतृत्व में सधी हुई रणनीति पर काम करते हुए शिवराज सिंह चौहान को पूरे चुनाव की धुरी बना कर रख दिया.

Source: News18Hindi Last updated on: November 18, 2020, 12:48 PM IST
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कांग्रेस के ‘निगेटिव अभियान’ पर भारी पड़ा ‘शिवराज पर विश्वास’!
शिवराज सिंह चौहान. (फाइल फोटो)
हाल ही मध्यप्रदेश की 28 विधानसभा सीटों पर हुआ उप-चुनाव कोई आम उप-चुनाव नहीं था. ये चुनाव था सरकार बचाने का और गिराने का, ये चुनाव था शिवराज की विश्वसनीयता और नेतृत्व को परखने का, ये चुनाव था कमलनाथ के दावों को जांचने का, ये चुनाव था सिंधिया की साख बचाने का, ये चुनाव मध्यप्रदेश की राजनीति के सबसे अहम चुनाव में एक था.

कांग्रेस ने शुरू से ही भाजपा के विरुद्ध ‘आक्रामक रवैया’ अपनाया. कभी ‘ग़द्दार’ तो कभी ‘बिकाऊ’ कह कर कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में गए विधायकों और उनके मुखिया ज्योतिरादित्य सिंधिया पर मुखर होकर हमला बोला. कभी मतदाताओं को गंगाजल देकर उसे ‘स्वच्छ’ करने का अभियान चलाया तो कभी ‘लोकतंत्र’ को बचाने की गुहार लगाई.

इसके विपरीत भाजपा ने शिवराज के नेतृत्व में सधी हुई रणनीति पर काम करते हुए शिवराज सिंह चौहान को पूरे चुनाव की धुरी बना कर रख दिया. भाजपा ने तर्क दिया कि हमारी कथनी और करनी में फर्क नहीं है और कमलनाथ द्वारा किए जाने वाले आरोपों पर हमला किया. भाजपा ने कांग्रेस सरकार आते ही बंद हुई तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं के बारे में लगातार जनता से चर्चा जारी रखी, विभिन्न माध्यमों से शिवराज केंद्रित पॉज़िटिव कैम्पेन पर फ़ोकस बनाए रखा.


‘आत्मनिर्भर भारत’ के सुर में सुर मिलाते हुए शिवराज ने भी ‘आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश’ अभियान की शुरुआत की और कांग्रेस द्वारा किसानों और युवाओं को ठगे जाने को मुद्दा बनाने में कामयाब रहे. ग़ौरतलब है कि बड़ी संख्या में जिन किसानों का कर्ज़ माफ नहीं हुआ, उन्हें दंड ब्याज भरना पड़ा था, किसका दर्द शिवराज सिंह चौहान बखूबी समझते थे और वे इसे आक्रोश में बदलने में कामयाब रहे. वहीं शिवराज ने  मुख्यमंत्री किसान कल्याण निधि जैसी योजना को अमली जामा पहना दिया. पीएम मोदी के ₹ 6000 में अपनी तरफ़ से ₹ 4000 जोड़ कर किसानों के खाते में पैसे पहुंचाने शुरू कर दिए!
शिवराज सिंह चौहान ने अपनी हर रैली और सभा में कांग्रेस से सवाल किया संबल, लाड़ली लक्ष्मी, कन्यादान योजना, आदि क्यों बंद की? बेटियों के लिए, मज़दूरों के लिए, किसानों के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं को बंद कर राज्य में IIFA कराने के पीछे क्या तर्क था? कांग्रेस इन आरोपों को नजरअन्दाज करती रही. आधी आबादी में एक अलग पहचान रखने वाले शिवराज ने कमलनाथ सरकार द्वारा महिला हितैषी योजनाओं से समझौता करने को एक बड़ा मुद्दा बनाया. संबल जैसी योजना जिससे हर गरीब को नया संबल मिला था वह भी फिर शुरू कर दी.

जनता के बीच ‘शिवराज है, तो विश्वास है’ नारे के साथ भाजपा मैदान में उतरी. एक तरफ शिवराज ने चुनावी अभियान में दिन-रात एक कर खूब मेहनत की तो दूसरी ओर उन्होंने हाईटेक अभियान की भी शुरुआत की. डिजिटल रथ, सोशल मीडिया आदि के माध्यम से गांव-गांव तक मुख्यमंत्री शिवराज यह संदेश लेकर गए कि भरोसे का दूसरा नाम भाजपा है. और जब तक भाजपा है, तब तक सभी योजनाओं का फ़ायदा जनता को मिलता रहेगा. एक तरफ जहां शिवराज के नेतृत्व में भाजपा ने सधा और संगठित अभियान चलाया दूसरी तरफ कांग्रेस के नेताओं और उनके विचारों में बिखराव साफ दिखा. जिसका नतीजा रहा 19-9 की विजय. ऐसी विजय जो भाजपा को कभी नहीं मिली.

मध्यप्रदेश की राजनीति में शिवराज सिंह चौहान अब शोध का विषय बन चुके हैं. उन पर यह अध्ययन किया जा सकता है कि कैसे बहुत स्वाभाविक तरीके से अस्वाभाविक सफलताओं को भी हासिल किया जा सकता है. राजनीति में कैसे जमीन से जुड़े रहकर बुलंदियों को छुआ जा सकता है. वो क्या बात है जो आम लोगों में से निकले एक बेहद आम प्रकृति के भी किसी शख्स को सबसे हटकर खड़ा कर सकती है.
ताजा उपचुनाव में राज्य की 28 में से 19 सीटों पर भाजपा की जीत कतई आसान नहीं थी. यह उन्नीस सभी वो सीटें हैं जो 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने जीती थीं. इसलिए सिंधिया या उनके समर्थकों के कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी के पाले में आ जाने से भी यह आसान नहीं था. सामने थी आक्रामक होने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार कांग्रेस. दलबदल से बनी सत्ता के कारण बीजेपी आरोपों से घिरी थी, लेकिन शिवराज ने अपने शालीन और तथ्यपरक पलटवार से माहौल को भाजपा के पक्ष में परिवर्तित कर दिया. कहते हैं कि यदि आप मर्यादित रहें तो परिस्थितियां स्वयमेव आपके हक में होती चली जाती हैं. शिवराज पर यह बात पूरी तरह लागू होती है.

तेरह साल के लगातार रिकॉर्ड मुख्यमंत्रित्व काल का चला जाना वाकई असहनीय क्षति थी. किन्तु शिवराज ने जनमत को आसानी से स्वीकार किया. और दूसरे ही दिन से अपनी भूमिका को भी बदल लिया. वे एक विपक्षी नेता के तौर पर जनता के बीच उसी रफ्तार से पहुंचते रहे जैसे वे मुख्यमंत्री के तौर पर पहुंचते थे. वह मुख्यमंत्री नहीं रहे, मगर पंद्रह महीने की कमलनाथ सरकार के दौर में किसी मुख्यमंत्री से ज्यादा वाली सक्रियता को उन्होंने अपनी पहचान बना लिया. इसका ही असर रहा कि इस उपचुनाव के पहले प्रदेश की जनता को शिवराज और कमलनाथ के बीच अंतर करने का मौका मिल गया. आवाम ने पाया कि सत्ता का परिवर्तन भले ही उसकी इच्छा रही हो, लेकिन यह प्रक्रिया उसके लिए इच्छा के अनुरूप नतीजे नहीं ला सकी. दिसंबर, 2018 से लेकर मार्च, 2020 तक के बीच की  सरकार को मतदाता ने इन उपचुनाव में सिरे से खारिज कर दिया. एक सशक्त लेकिन सहज और सरल नेता के नेतृत्व में राजनीतिक स्थायित्व को उसने प्राथमिकता दी.

शिवराज की खूबी निर्विकार भाव से सफलता और असफलता, दोनों को अपनाना रहा. वे न तो कामयाबी के दम्भ में डूबे और न ही नाकामयाबी की सूरत में बौखलाए. आम इंसान में यह भाव बिरले ही देखने को मिलता है, लेकिन शिवराज ने जैसे इसे अपने स्वभाव में ढाल रखा है. राजनीति के लोहे जैसे सख्त, निर्दय और बेजान भाव में शिवराज पारस पत्थर साबित हुए हैं. भारतीय जनता युवा मोर्चा ने उनके प्रदेशाध्यक्ष कार्यकाल में पार्टी में जो कद हासिल किया था, सफलताएं हासिल कीं, वैसी स्थिति युवा मोर्चा के किसी और अध्यक्ष की कभी नहीं बनी. सांसद रहते हुए उन्होंने दिग्विजय सिंह सरकार के खिलाफ विदिशा से लेकर रायसेन तक जो माहौल बनाया था, वह हमेशा याद किया जाता रहेगा. फिर मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज ने तेरह साल की लगातार पारी खेली, उससे सभी परिचित हैं.

शिवराज ने अपनी सरकार का चेहरा सामाजिक सरोकारों वाली सरकार का बनाया. ब्राह्मण-बनियों की पार्टी को गरीब और कमजोर वर्ग की समर्थक पार्टी के तौर पर उसकी पूरी पहचान बदल दी. वो ऐसा राजनेता बनने में भी कामयाब हुए जिन्होंने पार्टी या सरकार के भीतर अपने व्यवहार से विरोधियों को खड़ा ही नहीं होने दिया. शिवराज उतने ही सरल आज भी हैं, जितने पहली या चौथी बार मुख्यमंत्री की शपथ लेते हुए थे. यही उनकी लगातार सफलता का राज है और उनके और अधिक सफल होने का संकेत भी.


लेकिन हां, अब वे जब चौथी बार फिर एक स्थिर सरकार के मुखिया के तौर पर मैदान में हैं. शिवराज को अपने ब्रांड को नए रूप में मजबूती देने के लिए मेहनत और भाषण की जगह प्रशासन पर पकड़ का नया अंदाज विकसित करना होगा. तमाम सफलताओं के बावजूद अब भी माना यही जाता है कि ब्यूरोक्रेसी उन पर हावी हो जाती है. चौथी बार में बहुत बदलाव देखने को मिल भी रहा है लेकिन इस बदलाव को पुख्ता रूप देना अभी बाकी है. मुझे तो इसमें भी अब कोई शक नहीं लगता कि बीजेपी 2023 में फिर से बहुमत की सरकार प्रदेश में बना ले जाएगी. इसका बड़ा कारण प्रदेश में कांग्रेस की दुर्गति होना है. लेकिन कारण यह भी हो सकता है कि इस सरकार के बाकी के तीन सालों में शिवराज का एक नया रूप जनता देखें. निश्चित तौर पर प्रदेश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है. ऐसे में कम से कम अगले दो साल बहुत गंभीरता से शिवराज को सरकार के अहम फैसले लेने में दिखाना चाहिए.

कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आकर उनकी सरकार में मंत्री बने नए साथियों के राजनीतिक संस्कारों को बदलने की क्षमता भी शिवराज को दिखाना होगी. अपने पिछले कार्यकाल में खासकर (2013 से 2018) में सिंहस्थ से लेकर सरकार के आखिरी दौर तक ऐसा लगा जैसे प्रदेश सरकार का जनसंपर्क विभाग शिवराज को एक ब्रांड के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. नतीजा उनकी छवि प्रचार और प्रसिद्धि के भूखे एक राजनेता के तौर पर उभर कर सामने आई. इस बार सरकार का प्रचार विभाग शिवराज के पास ही है. लिहाजा, अपनी सरकार के जनसंपर्क विभाग का कैसा और किस तरीके से अपने हित में शिवराज फायदा उठा पाएंगे, यह उनके लिए एक नयी चुनौती होगा. शिवराज अगर एक ब्रांड के तौर पर स्थापित हुए हैं तो उसमें उनकी अपनी क्षमताएं हैं. मेहनत करने की ताकत और जनता से सीधा जुड़ने की ललक. इसके आगे कोई भी प्रचार तंत्र फेल है. लिहाजा, यहां भी शिवराज को नए तौर तरीके विकसित करना होंगे.

मत प्रतिशत में 10% से ज़्यादा का अंतर जनता का साफ़ संदेश का शिवराज के प्रति उनके विश्वास का. भाजपा के कई प्रत्याशी भारी अंतर से जीते. यह जीत स्पष्ट कर देती है कि शिवराज पर जनता का विश्वास बना हुआ है. यह विश्वसनीयता उन्होंने 15 वर्षों के कार्यकाल में अर्जित की है. जनता के बीच जाकर, उनकी समस्याओं के निदान की योजना बनाकर, उनके बीच नेता नहीं ‘बेटा और मामा’ बनकर. शिवराज इस पीढ़ी के उन आख़िरी नेताओं में से हैं जिन्होंने कभी बदले की राजनीति नहीं की, जो सबको साथ लिए चलते हैं, तभी ‘शिवराज है, तो विश्वास है’ सच साबित हो गया. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: November 18, 2020, 12:48 PM IST
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