OPINION: राजनीति की ज़मीन पर अमित शाह ने खींची हैं अमिट लकीरें

Amit Shah Birthday Special: जुलाई, 2014 में अमित शाह ने राजनाथ सिंह से बीजेपी अध्यक्ष का चार्ज लिया. इस पद पर वे 20 जनवरी, 2020 तक रहे. हम जानते हैं कि उनके पार्टी अध्यक्ष चुने जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी के जनाधार में बहुत विस्तार हुआ है. देश के उन क्षेत्रों में भी बीजेपी की पैठ हो गई है, जहां पहले ऐसा सोच पाना भी संभव नहीं था.

Source: News18Hindi Last updated on: October 22, 2020, 7:47 PM IST
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OPINION: राजनीति की ज़मीन पर अमित शाह ने खींची हैं अमिट लकीरें
साल 2019 में गृह मंत्री उस वक्त सबसे ज्यादा सुर्खियों में आए जब 5 अगस्त को उन्होंने राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर लद्दाख को अलग-अलग कर केंद्र शासित प्रदेश और राज्य से अनुच्छेद 370 के कई प्रावधानों को हटाने और आर्टिकल 35 ए को निरस्त करने का प्रस्ताव पेश किया. (PTI Photo/Ashok Bhaumik)
अमित अनिलचंद्र शाह! देश के गृह मंत्री अमित शाह का पूरा नाम है अमित अनिलचंद्र शाह. भारतीय जनता पार्टी को सफलताओं के शिखर पर ले जाने का श्रेय तो उन्हें जाता ही है, साथ ही भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में की गई सबसे बड़ी भूलों में से एक को दुरुस्त करने का श्रेय भी अमित शाह को ही जाता है. वह बड़ी राजनैतिक भूल थी जम्मू-कश्मीर के लिए संविधान में अस्थाई अनुच्छेद 370 का प्रावधान किया जाना. साथ ही 1954 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हस्ताक्षरों से जारी किए गए अनुच्छेद 35-ए का संविधान में जोड़ा जाना भी ऐतिहासिक भूल थी, जिसे नरेंद्र मोदी सरकार के गृह मंत्री के तौर पर अमित शाह ने मास्टर स्ट्रोक लगाकर दूर कर दिया.

मोदी सरकार की इच्छा शक्ति की वजह से अब अनुच्छेद 370 के दांत टूट चुके हैं. अनुच्छेद 35-ए अतीत की बात बन चुका है और केंद्र शासित प्रदेश के तौर पर जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन हो चुका है, तब फ़ारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसे अलगाववादी सोच वाले नेता फिर से अनुच्छेद 370 की बहाली के सपने देख रहे हैं. लेकिन उनका यह सपना कभी पूरा नहीं होने वाला है, क्योंकि चंद लोगों को छोड़कर पूरा भारत कश्मीर के मामले में मोदी सरकार के साथ खड़ा है. इतनी अहम राजनैतिक चेष्टा के लिए भारत के गृह मंत्री के तौर पर अमित शाह के नाम का ज़िक्र विश्व राजनीति के आगामी अध्यायों में सदैव होता रहेगा, यह तय है.

22 अक्टूबर को अमित शाह के जन्मदिन पर उनकी उपलब्धियों पर नज़र डालना महज़ औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र में लोक की शक्ति को महसूस करने की दृष्टि से आवश्यक हो जाता है. 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, तो छोटी-बड़ी 565 रियासतों के सुर अलग-अलग थे. ये रियासतें ब्रिटिश भारत के अधीन नहीं थीं. भारत और पाकिस्तान के बंटवारे का फ़ैसला हो चुका था. देश के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जिस राजनैतिक कौशल से सारी रियासतों का विलय भारत में किया, उसके लिए उनका नाम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा जा चुका है. लेकिन उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आग्रह की वजह से जम्मू-कश्मीर को लेकर सबसे बड़ी राजनैतिक भूल भी हुई. आज़ादी के सात दशक बाद अब वह भूल अमित शाह ने दूर कर दी है. ये मात्र संयोग हो सकता है कि सरदार पटेल भी गुजरात की धरती से देश की राजनीति के शिखर पर पहुंचे, तो अमित शाह भी उसी गुजरात से आते हैं.

वर्ष 2014 में देश की राजनीति की धुरी बदली, तो उसमें नरेंद्र मोदी का राजनैतिक कौशल केंद्र बिंदु बना. उस समय राजनाथ सिंह बीजेपी अध्यक्ष थे. मोदी सरकार जो भी कठिन लेकिन आवश्यक निर्णय कर पाई, उसके लिए दृढ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति के साथ-साथ मज़बूत जनाधार वाली सरकार होनी भी जरूरी थी. जुलाई, 2014 में अमित शाह ने राजनाथ सिंह से बीजेपी अध्यक्ष का चार्ज लिया. इस पद पर वे 20 जनवरी, 2020 तक रहे. हम जानते हैं कि उनके पार्टी अध्यक्ष चुने जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी के जनाधार में बहुत विस्तार हुआ है. देश के उन क्षेत्रों में भी बीजेपी की पैठ हो गई है, जहां पहले ऐसा सोच पाना भी संभव नहीं था. यह सही है कि बीजेपी के उफान के लिए किसी एक नेता को उत्तरदायी बताना सही नहीं होगा, लेकिन जीत का सेहरा तो तत्कालीन कप्तान के सिर ही बंधता है, यह भी व्यावहारिक बात है.
अमित शाह की दूरदर्शिता, रणनैतिक कौशल और सूझबूझ ही है कि आज सारी राजनैतिक पार्टियां संगठन मज़बूत करने के लिए उनका ही फ़ॉर्मूला अपनाने लगी हैं. अमित शाह ने पहली बार बूथ स्तर पर बीजेपी को मज़बूत करने के लिए पन्ना प्रमुख जैसे पद के गठन पर ध्यान दिया. हर पन्ना मज़बूत हो जाएगा, तो फिर किताब अपने आप बेहद शक्तिशाली हो जाएगी, यह बहुत बुनियादी बात है, लेकिन संगठन को मज़बूत बनाने के लिए इस मूल-मंत्र को अमल में लाने की सोचना अमित शाह के ही बूते की बात हो सकती है. चुनाव आयोग ने भी हालांकि मतदाताओं के बीच वोटिंग के लिए जागरूता अभियान चलाए हैं. नतीजतन वोटिंग प्रतिशत इधर कुछ-कुछ सुधरा है. लेकिन पन्ना प्रमुख का पद सृजित करने और उसे अत्यधिक महत्व देने वाले अमित शाह के हिस्से भी इस श्रेय में से बड़ा हिस्सा जाना चाहिए.

वर्ष 2019 के आम चुनाव में बीजेपी को क़रीब 38 प्रतिशत वोट मिले, तो इसके लिए कलफ़ लगी शानदार, चमकदार पगड़ी अमित शाह के सिर पर बांधी ही जानी चाहिए. खुद में बड़ा व्यक्तित्व होने के गुण होना तो कामयाबी के लिए ज़रूरी होता ही है, लेकिन सबको साथ लेकर चलने यानी सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े कार्यकर्ता में कंधे से कंधा मिलाकर चलने का हौसला भरने की शक्ति जिसमें होती है, वह बड़ा नेता होता है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि अमित शाह ऐसे ही नेता हैं. मोदी सरकार अगर सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास के सूत्र तक पूरी मज़बूती से पहुंची है, तो इसमें अमित शाह की भूमिका बहुत बड़ी है.

आज़ादी के बाद क़रीब पांच दशक तक कांग्रेस का ही बोलबाला राजनीति में रहा, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि लोग मानते थे कि पार्टी ने देश को आज़ाद कराने में बड़ी भूमिका निभाई थी. वे कांग्रेस का बड़ा एहसान मानते हुए बदले में उसे वोट दे दिया करते थे. असल में उस समय चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के पालन के लिए तो होते थे, लेकिन व्यावहारिक रूप से देखें, तो चुनाव एकतरफ़ा मानसिकता से होते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. लोकतंत्र का असल स्वरूप तो अब निखर कर सामने आया है. अब बहुत सी पार्टियां हो गई हैं. मतदाता के पास गुणा-भाग करने के विकल्प हैं, ऐसे में हम कह सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा की दो सीटों से 303 सीटों तक पहुंचाने के इतिहास में अमित शाह मील के एक ऐसे पत्थर की तरह हैं, जो बहुत ऊंचाई पर लगा हुआ है, जो बहुत दूर से स्पष्ट दिखाई देता है, जिस पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ देश के अधिसंख्य संवेदनशील लोगों को बहुत भरोसा है.पन्ना प्रमुख बनाने के साथ ही अमित शाह ने एक महत्वपूर्ण काम यह भी किया कि पार्टी में समभाव को बढ़ावा दिया. पार्टी की सरकार बनी, तो उन्होंने दूसरी पार्टियों यानी विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ताओं के साथ भेदभाव की नीति नहीं अपनाई. उन्हें समान दृष्टिकोण से देखा. उनकी परेशानिया को भी उतनी ही गंभीरता से लिया, जितनी अपनी पार्टी के लोगों की. अमित शाह ने सकारात्मक विपक्ष की राजनीति भले ही की हो, लेकिन नकारात्मक विरोध की राजनीति कभी नहीं की. उनके इस नज़रिये ने भी बीजेपी की स्वीकार्यता बढ़ाने का काम किया. बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ा है, तो वह कहीं बाहर से नहीं, बल्कि देश के अंदर से ही बढ़ा है.

कांग्रेस से इतर भारतीय जनता पार्टी ने लोकतंत्र की असल भावना को भी निखारा है. अमित शाह जैसे कुशाग्र राजनेता को अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि पार्टी में कोई सामान्य कार्यकर्ता भी शिखर पर बैठ सकता है. जन्मदिन के अवसर पर अमित अनिलचंद्र शाह के बारे में कुछ और बातें आपको जाननी चाहिए. मसलन, वे गुजरात के एक संपन्न परिवार से संबंध रखते हैं, लेकिन बीजेपी कार्यकर्ता के तौर पर उन्होंने पार्टी के पक्ष में दीवारों पर पोस्टर तक चिपकाए हैं. वह हर छोटे से छोटा काम पूरी निष्ठा से किया है, जो किसी राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता को करना चाहिए. अमित शाह गुजरात के मनसा में प्लास्टिक का पाइप बनाने वाली पुश्तैनी कंपनी का काम संभालते थे. उन्होंने बायोकैमिस्ट्री विषय से बीएससी तक पढ़ाई की है. बचपन से ही आरएसएस से जुड़े अमित शाह कॉलेज के दिनों में सार्वजनिक जीवन में बहुत सक्रिय थे. 1982 में उनकी मुलाक़ात नरेंद्र मोदी से हुई और फिर दोनों की कामयाब जोड़ी बन गई. 1983 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी से जुड़े. 1986 में वे भारतीय जनता पार्टी के सदस्य बने. 1987 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा का काम शुरू किया. फरवरी 1997 में वे विधानसभा चुनाव जीते. 1998 में फिर विधायक बने. वर्ष 2009 में वे गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और 2014 में अध्यक्ष चुने गए. लंबे समय तक वे गुजरात की मोदी सरकार में मंत्री रहे. जन्मदिन पर अमित शाह को बहुत-बहुत शुभकामनाएं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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First published: October 22, 2020, 6:28 PM IST
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