कोरोना ने बुज़ुर्गों पर चलाई है दोधारी तलवार, क्या हम उनके ज़ख़्म भर सकते हैं?

ज़रा सोचिए! जहां दो जून की रोटी का जुगाड़ नहीं हो, वहां परिवार का बेरोज़गार हो चुका मुखिया पहले बच्चों और जवानों के बारे में सोचेगा कि बुज़ुर्गों के बारे में? इस सवाल का उत्तर बहुत स्वाभाविक लगता तो है, लेकिन उसे लेकर मुखर हो पाना जीवन के सबसे दुष्कर कृत्यों में से एक होता है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 17, 2021, 4:37 PM IST
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कोरोना ने बुज़ुर्गों पर चलाई है दोधारी तलवार, क्या हम उनके ज़ख़्म भर सकते हैं?
कोविड की मार तो एक दिन थम जाएगी, लेकिन जिन बुज़ुर्गों ने अपनों की उदासीनता और क्रोध इस दौरान झेला है, वे मरते दम तक उसे भूल नहीं पाएंगे.


कोविड-19 के वायरस ने पूरी दुनिया को भयावह संदेश दिया है. कोविड-19 नहीं फैलता, तो दुनिया जीवित रहने के लिए नए सिरे से आसमान सिर पर नहीं उठाती. सिर्फ़ भारत की बात करें, तो कोविड-19 ने ऐसे सभी लोगों को बहुत कुछ ऐसा अनुभव करा दिया है, जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे. करोड़ों युवाओं ने जो देखा, पढ़ा, सुना, उस पर उन्हें सहज ही विश्वास नहीं हो रहा होगा. उन लाखों बुज़ुर्गों पर तो कोरोना दोधारी तलवार बनकर टूटा है, जो सामान्य समय में भी अपनों की उपेक्षा का शिकार रहते हैं.

जो जन्मता है, उसकी मृत्यु निश्चित है, यह सभी जानते हैं. फिर भी परिवार में किसी स्वजन का निधन कुछ समय के लिए सबको बहुत दुखी करता है. मृत्यु के बाद विधि-विधान से अंतिम संस्कार और उसके बाद भी परिवार और समाज में बहुत से संस्कार किए जाते हैं. लेकिन कोरोना ने बताया कि अंतिम संस्कार भी पैसे के अभाव में दुर्लभ हो जाता है. बहुत से ग़रीब परिवारों ने कोरोना संक्रमण से मृत्यु के बाद अपनों के शव सड़कों पर, श्मशानों-क़ब्रिस्तानों के प्रेवश द्वारों पर या फिर नदियों-नहरों में बहा दिए. कोरोना ने सबसे पहले कमाई छीनी और फिर महंगे इलाज ने कमर तोड़ कर रख दी.

तब आंसू भाप बनकर उड़ जाएंगे...
इंसानियत के दुश्मनों की लूट-खसोट ने ग़रीब घरों के शवों को अंतिम ठिकानों तक पहुंचाना असंभव कर दिया. एक-दो-तीन किलोमीटर तक शव ले जाने के लिए जिस तरह हज़ारों रुपये की मांग की गई, ऐसे में मजबूरन लोग अपनों के शवों को जहां-तहां छोड़ कर भाग निकले. वे मातम भी न मना पाए. अपराधबोध ने उनका शेष जीवन विषाक्त कर दिया. जीवन ढंग से चलाने के लिए कुछ सौ रुपये जेब में नहीं हों, तब शव के अंतिम संस्कार के लिए हज़ारों का जुगाड़ कहां से किया जाए?

श्मशान में चिता जलाई जाए या घर पर चूल्हे में आग, जब गर्मागर्म सुर्ख़ दहकती असंख्य आंखों वाला यह मौलिक प्रश्न पूरे उद्दीप्त संवेग के साथ ज़ेहन में कौंधने लगे... घुमड़ने लगे, तब आंसू भाप बनकर उड़ ही जाएंगे.


आजकल हर सूचना अति-द्रुत गति वाले पंख लगाकर पैदा होती है. क्या अमीर, क्या ग़रीब, सूचना क्रांति के मौजूदा युग में हर पल या तो ख़बरदार रहता है या फिर भ्रमित रहता है. सूचना अगर बुरी तरह बौखलाए शहरों में पड़ी एक-दो ही सही, लावारिस लाशों से जुड़ी हो या फिर किसी पवित्र नदी में डूबते-उतराते शवों को तटों से घूरती लावारिस भूख की अदम्य लालसा से जुड़ी हो, तो उसके समूचे जहान में फैलने में देर नहीं लगती. शहरों के पिचके हुए डिब्बों जैसे ठिकानों में पहले से ही उपेक्षित जीवन गुज़ारने वाले बुज़ुर्गों को कोरोना के निष्ठिर काल में ऐसी संवेदनहीन सूचनाओं से कितनी झुरझुरी पैदा होती होगी.आखिर क्‍या है इस मानवीय त्राससदी की वजह?
ज़रा सोचिए! जहां दो जून की रोटी का जुगाड़ नहीं हो, वहां परिवार का बेरोज़गार हो चुका मुखिया पहले बच्चों और जवानों के बारे में सोचेगा कि बुज़ुर्गों के बारे में? इस सवाल का उत्तर बहुत स्वाभाविक लगता तो है, लेकिन उसे लेकर मुखर हो पाना जीवन के सबसे दुष्कर कृत्यों में से एक होता है. बहरहाल, कोरोना काल में बुज़ुर्गों पर उनके सगे-संबंधियों ने जिस क़दर ज़ुल्म ढाया है, उसके आंकड़े आए हैं. समाज की यह मानवीय त्रासदी क्या मात्र आर्थिक कारणों से है या फिर बज़रिया समाज हर व्यक्ति स्वार्थों के नम अंधेरों में आत्मकेंद्रित होकर सिकुड़ता जा रहा है?

इस प्रश्न की पड़ताल आसान नहीं है. क्या ग़रीब ही इस वृत्ति के शिकार हैं या फिर संपन्न परिवारों में भी यह प्रवृत्ति पनपने लगी है? यह भी बड़ा प्रश्न है, जिसका उत्तर धीरे-धीरे मिलने लगा है. एकदम विपन्न समाज में बड़े-बूढ़ों के प्रति आदर, आग्रह अब भी नज़र आता है, लेकिन मध्यवर्ग की मानसिकता बदलती जा रही है. कोरोना जैसी वैश्विक महामारी सदियों में एक बार ही आती है, लिहाज़ा ऐसे दौर में इस प्रश्न से पर्दा थोड़ा सरकता तो है कि क्या परस्पर संबंधों की सामाजिकता का मूलाधार आर्थिक धरातल पर ही अंतिम तौर पर टिका रहता है?

संकट काल में ही परिवार और समाजों के आपसी संबंधों का महत्व सही माइने में समझ में आता है. पुराने समय से मानव मनोविज्ञान और समाज की मानसिकता को लेकर चली आ रही यह मान्यता कोविड-19 के क़हर के बीच ज़्यादा असरदार तरीक़े से समझ में आ रही है, तो चौंकने वाली बात नहीं है.


ऊपर हम ज़िक्र कर चुके हैं कि कोरोना से स्वर्गीय हुए बहुत से बुज़ुर्गों को उनके अपनों ने लावारिस छोड़ दिया. लेकिन कुछ को छोड़कर अधिकांश का अंतिम संस्कार हुआ, यह भी सुखद सच्चाई है. यह कर्तव्य सामाजिक संस्थाओं या पुलिस जैसी सरकारी संस्थाओं को निभाना पड़ा. नकारात्मकता से इतर बहुत से दरियादिल क़िस्से भी सामने आए, जब अनाथ हो गए बच्चों को लोगों ने लपक कर अपना लिया, गले से लगा लिया.

बुजुर्गों ने झेला है अपनों की उदासीनता और क्रोध
कोविड की मार तो एक दिन थम जाएगी, लेकिन जिन बुज़ुर्गों ने अपनों की उदासीनता और क्रोध इस दौरान झेला है, वे मरते दम तक उसे भूल नहीं पाएंगे. एजवेल फ़ाउंडेशन के सर्वे में 73 प्रतिशत बुज़ुर्गों ने माना है कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उन्हें अपने सगे-संबंधियों के दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ा. बुज़र्गों के साथ दुर्व्यवहार लॉकडाउन के दौरान भी हुआ और अनलॉक के दौरान भी. 61 प्रतिशत बुज़ुर्गों ने दावा किया कि उनके साथ ग़लत बर्ताव आपसी संबंध सही नहीं होने की वजह से पहले से ही होता आ रहा था. 65 फ़ीसदी बुज़ुर्ग मानते हैं कि परिवार के दूसरे सदस्यों की अपेक्षा उन्हें उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है. 58 प्रतिशत बुज़ुर्ग परिवार के साथ ही समाज के दुर्व्यवहार के शिकार हो रहे हैं.

सर्वे में शामिल हर तीसरे बुज़ुर्ग ने (35.1 फ़ीसदी) माना कि बुढ़ापे की वजह से वे घरेलू हिंसा के शिकार होते हैं. 52.2 प्रतिशत बुज़ुर्गों की आमदनी कोरोना काल में घटी है. 34.9 प्रतिशत बुज़ुर्गों की नौकरी कोरोना की वजह से छूट गई, 30.2 प्रतिशत बुज़ुर्गों के परिवार में किसी सदस्य की नौकरी चली गई. कोरोना काल में बुज़ुर्गों में सेहत से जुड़ी समस्याओं के निराकरण में परेशानिया आईं. कुल मिलाकर 82 प्रतिशत बुज़ुर्गों ने माना कि कोरोना काल में उनका जीवन प्रभावित हुआ है. सर्वे में देश भर के 5000 बुज़ुर्गों को शामिल किया गया.

एक तो वैसे ही बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान घटता जा रहा है. एकल परिवारों में बुज़ुर्गों की उपेक्षा नई बात नहीं है. देश भर में वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या यही बताती है. ऊपर से कोरोना जैसी महा-विपदा ने भी बुज़ुर्गों के प्रति लोगों का मोह कम कर दिया है.


बहुत से लोगों ने बुज़ुर्गों के मुक़ाबले अपने बीवी-बच्चों को तरज़ीह दी. पैंशनभोगी, बचत खातों में अच्छी रक़म वाले या अच्छा निवेश कर चुके बुज़ुर्गों को अपेक्षाकृत कम परेशानी झेलनी पड़ी. चल-अचल संपत्ति के मालिक बुज़ुर्ग भी ज़्यादा परेशान नहीं हुए, लेकिन कम कमाई वाले परिवारों में रह रहे ज़्यादातर बुज़ुर्गों के लिए कोरोना बुरे पैग़ाम लेकर ही आया. वे पैग़ाम बताते हैं कि इंसानों के पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की डगर आख़िरी तौर पर विपन्नता और संपन्नता के आर्थिक पहियों पर ही सवार रहती है.

बुज़ुर्गों के प्रति परिवार और समाज का रवैया
एक सवाल मन में और कौंधता है कि क्या आधुनिक काल में ही बुज़ुर्गों के प्रति परिवार और समाज का रवैया बदल जाता है या फिर यह मूल मानवीय प्रवृत्तियों में से एक है, जो अनुकूल मौसम पाकर उभरती ही है? इस पहली को थोड़ा सुलझाते हैं. बुज़ुर्ग माता-पिता को दो पलड़ों में बैठाकर तीर्थाटन को निकलने वाले श्रवण कुमार जैसा उदाहरण पौराणिक काल में भी दूसरा नहीं मिलता.

हां, माता-पिता की आज्ञा के पालन और उनकी इच्छापूर्ति के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले बेटों के उदाहरण अलग-अलग युगों के राज परिवारों में राम और भीष्म के रूप में मिल जाएंगे, लेकिन सामान्य समाज के श्रवण कुमार अगर आज भी श्रेष्ठ पुत्र का उदाहरण है, तो यह साबित हो जाता है कि प्राचीन काल में भी बुज़ुर्गों के प्रति परिवार में उपेक्षा का ही भाव रहता होगा. हम कब अपने जन्मदाताओं के प्रति अनिवार्य रूप से उदार हो पाएंगे.

श्रवण कुमार जैसा उदाहरण बताता कि बुज़ुर्गों के साथ परिवार और समाज का व्यवहार चिरकाल से ही ख़राब रहा है. माता-पिता को इस तरह तीर्थाटन पर ले जाना सामान्य परिघटना नहीं थी. तभी तो जब श्रवण घर से चला, तो इसकी चर्चा आनन-फानन में चारों ओर फैल गई और समाज ने उसे सर्वश्रेष्ठ पुत्र का दर्जा दे दिया.


श्रवण के रूप में बुज़ुर्ग माता-पिता की सेवा करने वाले पुत्र की कल्पना में आज कई युग बाद भी कोई खरोंच नहीं आई है. युवा बेटे से ऐसी कामना करना आज भी जस की तस है. साफ़ है कि माता-पिता के प्रति श्रवण कुमार जैसा स्नेह, सम्मान और संकल्प तब भी अति-दुर्लभ रहा होगा. प्रकारांतर से कहें, तो आज भी अगर माता-पिता की सेवा के मामले में श्रवण कुमार का उदाहरण दिया जाता है, तो साफ़ है कि वह तब भी अपवाद ही रहा होगा.

एक बात और ध्यान देने लायक है कि समाज के अधिसंख्य युवा सदस्यों ने श्रवण कुमार को अनुकरणीय घोषित नहीं किया होगा, बल्कि बुज़ुर्गों ने ही उसे महान सुपुत्र की उपाधि दी होगी. उनके मन में लालसा रही होगी कि उनके बेटे भी श्रवण कुमार जैसा व्यवहार उनके साथ करें. इसलिए ही श्रवण कुमार का उदाहरण आज भी जीवित है.

अनाथ बच्चों के लिए कई सरकारों ने महत्वपूर्ण योजनाएं
कोरोना काल में माता-पिता, दोनों की असमय मृत्यु के कारण अनाथ बच्चों के लिए कई सरकारों ने महत्वपूर्ण योजनाएं बनाई हैं. उसी तरह अनाथ बुज़ुर्गों को भी सरकारों का संरक्षण मिलना चाहिए. वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजनाएं तो हैं, लेकिन ये ऊंट के मुंह में ज़ीरा ही साबित हुई हैं. इनमें सुधार की बहुत गुंजाइश है. ऐसा नहीं है कि सरकारों ने बुज़ुर्गों के लिए कुछ किया ही नहीं हो. बहुत सी योजनाएं बनाई गई हैं. लेकिन उनके क्रियान्वयन के प्रति नए सिरे से सोचे जाने की आवश्यकता है.

बुज़ुर्गों को प्रताड़ित करना क़ानूनी रूप से आपराधिक कृत्य है. बालिग़ बच्चे अगर ऐसा करते हैं, तो उन पर आर्थिक दंड लगाकर उन्हें जेल भी भेजा सकता है. इस क़ानून के पालन के लिए सरकारी मैकेनिज़्म भी बनाया गया, लेकिन बहुत से बुज़ुर्ग आज भी बदहाल हैं.


वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में बुज़ुर्गों की संख्या 10 करोड़ से ज़्यादा थी. अमूमन 60 वर्ष की उम्र के व्यक्ति को हम बेहिचक बुज़र्ग कहते हैं. इन बुज़ुर्गों की उपेक्षा की बजाए अगर सरकारें, स्वयंसेवी संस्थाएं और हम-आप क्या ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कर सकते हैं, जिसमें बुज़ुर्ग देश के चिंतनशील संसाधन के तौर पर उपयोगी हो जाएं. उनके अनुभवों का लाभ समाज निर्माण में लिया जाए. बदले में हम उन्हें सम्मानजनक जीवन भर दे दें. जो बुज़ुर्ग परिवारों में पीड़ित हैं, उन्हें सेहतमंद छत का सहारा दे दिया जाए, तो वे बेकार नहीं, देश का गौरव बढ़ाने वाले साबित हो सकते हैं.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
रवि पाराशर

रवि पाराशरवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. नवभारत टाइम्स, ज़ी न्यूज़, आजतक और सहारा टीवी नेटवर्क में विभिन्न पदों पर 30 साल से ज़्यादा का अनुभव रखते हैं. कई विश्वविद्यालयों में विज़िटिंग फ़ैकल्टी रहे हैं. विभिन्न विषयों पर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में शामिल हो चुके हैं. ग़ज़लों का संकलन ‘एक पत्ता हम भी लेंगे’ प्रकाशित हो चुका है।

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First published: June 17, 2021, 4:37 PM IST
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