कोरोना काल में चुनाव पर सुविधा के हिसाब से सवाल उठाना क्यों सही नहीं है?

अगर मुहावरा प्रचलित है-चित भी मेरी, पट भी मेरी, तो फिर यह सोचने वाली बात है कि ऐसा कैसे हो सकता है? गौर करें, तो पाएंगे कि ऐसा तभी हो सकता है, जब ऐसा ऐलान करने वाला बेहद ताकतवर हो या तर्क करने की उसकी मानसिकता बच्चों जैसी हो यानी नासमझ हो.

Source: News18Hindi Last updated on: April 20, 2021, 12:36 AM IST
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कोरोना काल में चुनाव पर सुविधा के हिसाब से सवाल उठाना क्यों सही नहीं है?
केंद्रीय चुनाव आयोग (फाइल फोटो)
नई दिल्ली. दुनिया में क्या कोई तर्क ऐसा हो सकता है, जो परस्पर धुर-विरोधी परिस्थितियों में एक समान रूप से एक ही व्यक्ति या समूह द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है? यकीनन, ऐसा कोई तर्क नहीं हो सकता. लेकिन अगर मुहावरा प्रचलित है-चित भी मेरी, पट भी मेरी, तो फिर यह सोचने वाली बात है कि ऐसा कैसे हो सकता है? गौर करें, तो पाएंगे कि ऐसा तभी हो सकता है, जब ऐसा ऐलान करने वाला बेहद ताकतवर हो या तर्क करने की उसकी मानसिकता बच्चों जैसी हो यानी नासमझ हो.

भारत में लोकतंत्र खतरे में है, समय-समय पर यह ऐलान देश और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किया जाता रहा है. इसी तरह भारत में असहिष्णुता बढ़ने की बात होती रही है. अलग-अलग तरह के लोग सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को लेकर सेलेक्टिव राय रखते हैं.

हम जानते हैं कि पूरी दुनिया इस समय कोविड-19 का कहर झेल रही है. ऐसे कठिन समय में देश में दो परिघटनाएं चल रही हैं. एक है पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया और दूसरी महत्वपूर्ण परिघटना है देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर जारी कथित किसान आंदोलन. जाहिर है कि कोरोना काल में विधानसभा चुनाव और उसे अपने पक्ष में करने के लिए प्रचार को लेकर विभिन्न पार्टियों के बीच नैतिकता और जिम्मेदारी की भावना को लेकर घमासान चल रहा है.

चार राज्यों में वोटिंग की प्रक्रिया संपन्न हो चुकी है. पश्चिम बंगाल में कुछ चरण अभी बाकी हैं और 2 मई को पांचों राज्यों के चुनाव परिणाम घोषित हो जाएंगे. ऐसे में चुनाव और कोरोना की विभीषिका को लेकर चर्चा गर्म है. तीन कृषि कानूनों की वापसी की मांग पर अड़ा किसान आंदोलन हालांकि अब भी जारी है, लेकिन उसे लेकर मीडिया और संबंधित समाज में चर्चा चुनाव के मुकाबले कम हो रही है. कोरोना का कहर रोज़ बढ़ता जा रहा है, ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारें नियमित बैठकें कर रही हैं. दिनोंदिन बचाव के नए-नए तौर-तरीके अपनाए जा रहे हैं.
कोरोना से लड़ाई को लेकर अपनी पीठ थपथपाते विज्ञापन
हालात के गंभीर होते जाने पर गैर-बीजेपी शासित राज्य सरकारें केंद्र की मोदी सरकार के सिर पर ठीकरा फोड़ने में व्यस्त हैं. दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने करीब हफ्ते भर का लॉकडाउन घोषित करते हुए केंद्र सरकार से मदद मांगी है. लेकिन वहीं केजरीवाल सरकार पिछले दिनों हालात ठीक लगने का आभास होने के बाद अरबों रुपए के विज्ञापन अपनी पीठ ठोंकने के लिए जारी कर चुकी है. ऐसा नहीं है कि केजरीवाल सरकार ने दिल्ली और एनसीआर के मीडिया की ही झोली विज्ञापनों से भरी हो, यूपी और पंजाब में भी आप के विज्ञापन जारी किए गए हैं.

सैद्धांतिक तौर पर इसमें कुछ गलत भी नहीं है. यूपी समेत कई राज्य सरकारों ने कोरोना से प्रभावी तौर पर निपटने का काफी ढिंढोरा पीटा है. लेकिन पीठ ठोकने की बजाए अगर हालात को भांपते हुए दूसरी लहर से निपटने के इंतजाम किए गए होते, तो कोरोना को लेकर नकारात्मक राजनीति की नौबत नहीं आती.दिल्ली की सीमाओं पर 2020 में 26 नवंबर को जब कथित आंदोलन शुरू किया गया, तो एक पक्ष ने कहा कि किसानों को कोरोना की विभीषिका को समझते हुए समाज हित में आंदोलन जल्द खत्म करना चाहिए. उस समय गैर-बीजेपी विचारों यानी कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बीएसपी, एसपी और करीब 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस तर्क के पक्ष में जमकर ढिंढोरा पीटा कि लोकतंत्र में असहमति जताने, आंदोलन करने, धरना-प्रदर्शन करने का अधिकार सभी को है. उनकी दलील है कि फिर किसानों के लोकतांत्रिक अधिकारों का अपमान क्यों किया जा रहा है? ऐसे लोगों को तब कोरोना वायरस भारतीय समाज के लिए बिल्कुल भी खतरा नजर नहीं आ रहा था.

लेकिन पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में चुनाव प्रक्रिया के दौरान अगर संवैधानिक ढांचे की रक्षा के लिए आवश्यक कदम चुनाव आयोग उठा रहा है, तो गैर-बीजेपी विचारों को इस पर ऐतराज है. सोशल मीडिया पर लोग प्रश्न उठा रहे हैं कि कोरोना के कहर को देखते हुए चुनाव क्या बाद में नहीं हो सकते थे? यह माहौल भी बनाया जा रहा है कि राजनीतिक पार्टियों को वर्चुअल रैलियों पर जोर देना चाहिए था, क्योंकि रैलियों में उमड़ रही भीड़ कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं कर रही है. बात बिल्कुल सही है. सभी राजनीतिक पार्टियों को इस ओर खास ध्यान रखना चाहिए.

'कोरोना काल में अवसरवादी नैतिकता की पीपीई किट'
सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में इस बार बीजेपी की रैलियों में अपार भीड़ उमड़ रही है. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में नतीजे बीजेपी के लिए राज्य में आशा की नई किरणें लेकर आए थे और उसके बाद पार्टी ने वहां हो चुके सियासी दलदल में कमल की जड़ें बहुत गहरे तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कोरोना काल में अवसरवादी नैतिकता की पीपीई किट पहन कर सबसे पहले कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ रहे लेफ्ट फ्रंट ने चुनावी रैलियां नहीं करने का ऐलान किया. इसके बाद अब राहुल गांधी ने भी रैलियां नहीं करने की घोषणा की है, तो तृणमूल कांग्रेस ने रैलियां सीमित समय तक करने का ऐलान करते हुए भारतीय जनता पार्टी पर दबाव बनाने का प्रयास किया है.

सभी जानते हैं कि लेफ्ट और कांग्रेस की स्थिति पश्चिम बंगाल में क्या है? उनकी रैलियों में कितनी भीड़ उमड़ रही है? भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच ही बंगाल में चुनावी युद्ध हो रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के सभी स्टार प्रचारकों की रैली में इस बार अभूतपूर्व भीड़ उमड़ रही है, इसमें कोई शक ममता बनर्जी को भी नहीं है. टीएमसी समेत सभी गैर-बीजेपी पार्टियों ने बाकी के चरणों का मतदान एक साथ करने की अपील की थी, जिसे चुनाव आयोग ने कठोर प्रोटोकॉल जारी करते हुए रद्द कर दिया. चुनाव आयोग अगर यह मांग मान भी लेता, तो क्या कोरोना पश्चिम बंगाल से भाग जाता?

सही है कि महामारी के समय बहुत सी जरूरी सावधानियां राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों बरतनी चाहिए. यह भी सही है कि पश्चिम बंगाल समेत पांचों राज्यों के चुनाव प्रचार में कोविड प्रोटोकॉल का संपूर्ण रूप से पालन नहीं किया गया. ऐसे में नियमों का पालन जरूरी है और उन्हें नहीं मानने वालों पर सख्ती जरूरी है या फिर यह माहौल बनाना कि चुनाव आयोग को विधानसभा चुनाव कराना ही नहीं चाहिए? आप संवैधानिक लोकतंत्र में दिए गए आंदोलन और असहमति जताने के हक का तो पुरजर समर्थन करते हैं और दूसरी ओर देश में लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने वाली चुनाव प्रक्रिया पर अपनी सुविधानुसार और नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले एनडीए की संभावित जीत से डर कर इस तरह की अलोकतांत्रिक मानसिकता का प्रदर्शन ही करते हैं.

कोविड-19 से पहले दुनिया ने किसी महामारी का विनाश नहीं झेला?
सवाल यह है कि क्या कोविड-19 से पहले दुनिया ने किसी महामारी का विनाश नहीं झेला? समाज के लिए नकारात्मक परिस्थितियां पैदा होती रहती हैं. उनसे निपटने के उपाय हर बार तलाश लिए जाते हैं. इंसानियत की यही जिजीविषा दुनिया को लगातार आगे बढ़ाती रहती है. क्योंकि आप राजनीतिक तौर पर हाशिये पर आकर खड़े हो गए हैं, तो नैतिकता की एक ही परिभाषा को हर परिस्थिति में अपने ही पक्ष में कैसे रख सकते हैं?

कोरोना अचानक आई महामारी है. कोरोना काल में भारत में पहला चुनाव बिहार विधानसभा के लिए कराया गया. तब भी बिहार में एनडीए विरोधी विपक्षी पार्टियों ने चुनाव समय पर नहीं कराने की मांग की थी, जिसे चुनाव आयोग ने नहीं माना था. ऐसा नहीं है कि कोरोना के दौरान केवल भारत में ही चुनाव प्रक्रिया चली हो या चल रही हो. अमेरिका समेत बहुत से देशों में चुनाव प्रक्रिया कोरोना के दौरान ही संपन्न हुए हैं.

यह समझने की बात है कि चुनाव आयोग का काम देश में चुनाव कराना है और यह अधिकार उसे देश के संविधान ने बाकायदा विस्तृत प्रक्रिया के माध्यम से दिया है. विधायिका उचित संवैधानिक तरीके से मौजूदा व्यवस्था में परिवर्तन करे, तभी चुनाव प्रणाली को लेकर प्रश्न करने का अधिकार विपक्षी पार्टियों को हो सकता है. चुनाव आयोग स्वायत्त संवैधानिक व्यवस्था है, उसे जो करने के लिए संविधान ने निर्देश दिए गए हैं, वह उनसे इतर कैसे जा सकता है? वह तो देश में लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है. लेकिन अगर राजनीतिक पार्टियां लोकहितों से दूर जाकर स्वहित की सोचती हैं, तो ही लोकतंत्र को असल खतरा होता है. बहुत सी गैर-बीजेपी पार्टियां अब इसी मानसिकता की शिकार होती जा रही हैं.

कोरोना से सावधानी पूर्वक निपटने की जरूरत
कोरोना से डरने की जरूरत नहीं है. उससे सावधानी पूर्वक निपटने की जरूरत है. पलायनवादी मानसिकता की बजाए आगे आकर कोरोना से भिड़ने की जरूरत है. अगर हमें सफलता पूर्वक कोरोना को हराना है, तो मिलजुल कर काम करना होगा. केंद्र अपनी कमियां राज्यों पर नहीं थोपे और राज्य अव्यवस्था के लिए केंद्र को ही जिम्मेदार न ठहराते हुए तालमेल के साथ काम करें, यह बहुत जरूरी है. कोरोना के खिलाफ जंग में दलगत राजनीति जारी रही, तो स्थिति और भयावह होती जाएगी.

अखिलेश यादव जैसे नेता अगर कोवैक्सीन और कोविशील्ड के टीकों को बीजेपी के टीके बताएंगे, तो फिर वे देश को आगे नहीं, बल्कि बहुत पीछे ले जाने की मानसिकता का परिचय दे रहे हैं. सरकारों के साथ-साथ आम लोगों को भी कोरोना से जंग में पूरी सावधानी से शरीक होना है. आप किसी भी पार्टी के समर्थक हैं, कोरोना से निपटने के उपायों से लैस होकर ही रैली या दूसरे स्तरों पर होने वाले चुनाव प्रचार में शामिल होना चाहिए. अगले वर्ष भी कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. क्या हम सभी इस बार हुए गलतियों से तब सबक लेंगे? कोविड से डर कर कब तक हम घरों में ही कैद रह सकते हैं?

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
ब्लॉगर के बारे में
रवि पाराशर

रवि पाराशरवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. नवभारत टाइम्स, ज़ी न्यूज़, आजतक और सहारा टीवी नेटवर्क में विभिन्न पदों पर 30 साल से ज़्यादा का अनुभव रखते हैं. कई विश्वविद्यालयों में विज़िटिंग फ़ैकल्टी रहे हैं. विभिन्न विषयों पर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में शामिल हो चुके हैं. ग़ज़लों का संकलन ‘एक पत्ता हम भी लेंगे’ प्रकाशित हो चुका है।

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First published: April 20, 2021, 12:28 AM IST
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