किसानों की आमदनी बढ़ेगी, तो इसमें किसे और क्यों ऐतराज़ है?

क्या आप इस बात को जायज़ मानेंगे कि आप 80 रुपये किलो सब्ज़ी ख़रीदें और किसान को उस 80 रुपये में से सिर्फ़ दो-चार रुपये ही मिलें? बाक़ी के 70-75 रुपयों में से 60-65 रुपये मंडी में पक्की छत, कूलर या एसी में बैठे आढ़ती की जेब में बिना कोई मेहनत किए जाएं? 10-15 रुपये मंडी से आपके घर के पास सब्ज़ी बेचने वाले की जेब में जाते हैं, तो समझ में आता है, लेकिन इस पूरे अर्थ तंत्र में सबसे ज़्यादा घाटे में मेहनतकश किसान ही रहता है, जो अगर पसीना और पैसा बहाकर अपने खेत में सब्ज़ी न उगाए, तो न आढ़ती की जेबें चौड़ी हों और न ठेले वालों के बच्चे पल सकें.

Source: News18Hindi Last updated on: September 20, 2020, 6:14 PM IST
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किसानों की आमदनी बढ़ेगी, तो इसमें किसे और क्यों ऐतराज़ है?
प्रतीकात्मक तस्वीर
अगर आप दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं, तो आपके घर के आसपास की मंडी या गली-मोहल्लों के ठेलों पर आपको टमाटर 80 रुपये किलो (थोड़ा कम या ज़्यादा) मिल रहा होगा. इसी तरह प्याज़ 40-45 रुपये किलो और आलू भी इसी क़ीमत पर मिल रहा है. ये तीनों ही जिस बेसिक सब्ज़ियों में शुमार होती हैं यानी इन तीनों के ही बिना चाहे शाकाहारी परिवार हों या मांसाहारी, रसोई का रोज़मर्रा काम नहीं चलता. अब आप सोचेंगे कि टमाटर, आलू-प्याज़ अगर इतना महंगा मिल रहा है, तो इनकी खेती करने वाले किसानों की तो पौ-बारह होगी! काश! यह सच होता. सब्जियों के इतना महंगा होने के बावजूद किसानों की जेब में चार-पांच (कुछ ज्यादा या कम) रुपये प्रति किलो के हिसाब से ही पैसा आता है.

सवाल यह है कि किसान से चार-पांच रुपये प्रति किलो ख़रीदी जाने वाली सब्ज़ी आपकी रसोई तक पहुंचने में इतनी महंगी क्यों हो जाती है? अब दूसरा गणित भी जान लीजिए. बहुत कम किसानों से सब्ज़ियों के बड़े व्यापारी सीधे फ़सल ख़रीदते हैं यानी खेत पर जाकर ख़रीद करते हैं. ऐसे किसानों को अपना माल मंडियों तक लाने के लिए ट्रांसपोर्टेशन पर कुछ ख़र्च नहीं करना पड़ता. लेकिन ज़्यादातर किसानों को अपनी फ़सल मंडियों तक ढोकर लानी पड़ती है और वहां आढ़तियों के आदमियों से मोल-भाव करना पड़ता है. किसानों के उत्पाद कितने ही अच्छे हों, उन्हें अपना माल समय से बेचने के लिए आढ़ितियों के दलालों की मेहरबानी पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

फ़र्ज़ कीजिए कि कोई किसान यूपी के आगरा से ट्रक में भरकर आलू ग़ाज़ियाबाद मंडी लाया है, लेकिन अगर सही दाम के चक्कर में उसे दो-तीन दिन तक वहां रुकना पड़े, तो तीसरे दिन अपेक्षाकृत अच्छे दाम मिलने पर भी उसे कोई ख़ास लाभ नहीं होगा, क्योंकि ट्रक का भाड़ा और रुकने में होने वाला ख़र्च इसमें से कम हो जाएगा. फिर तीसरे दिन इसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि माल की क़ीमत अच्छी मिल ही जाएगी. इसलिए किसान प्रयास करता है कि पहले ही दिन उसका आलू बिक जाए. भले ही ऊंची क़ीमत न मिले. दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मंडी में ट्रक में भरा आलू कितने दिन तक रुक सकता है? प्याज़ और आलू जैसी जिसे तो तीन-चार दिन तक टिक भी सकती हैं, लौकी, भिंडी, तोरई, कद्दू, हरी मिर्च, पालक, हरा धनिया, पोदीना जैसी मुख्य या सहायक तरकारियां तो शाम तक भी नहीं टिकतीं, लिहाज़ा सब्ज़ी के किसानों को मंडी के दलालों और उनके आका आढ़तियों की मनमर्ज़ी पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

क्या आप इस बात को जायज़ मानेंगे कि आप 80 रुपये किलो सब्ज़ी ख़रीदें और किसान को उस 80 रुपये में से सिर्फ़ दो-चार रुपये ही मिलें? बाक़ी के 70-75 रुपयों में से 60-65 रुपये मंडी में पक्की छत, कूलर या एसी में बैठे आढ़ती की जेब में बिना कोई मेहनत किए जाएं? 10-15 रुपये मंडी से आपके घर के पास सब्ज़ी बेचने वाले की जेब में जाते हैं, तो समझ में आता है, लेकिन इस पूरे अर्थ तंत्र में सबसे ज़्यादा घाटे में मेहनतकश किसान ही रहता है, जो अगर पसीना और पैसा बहाकर अपने खेत में सब्ज़ी न उगाए, तो न आढ़ती की जेबें चौड़ी हों और न ठेले वालों के बच्चे पल सकें. एक बात और समझ लें कि आलू-प्याज़ और कई दूसरी बेसिक सब्ज़ियों को सहेज कर रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज़ में रखना पड़ता है. सही दाम नहीं मिलने पर बहुत बार किसानों को ट्रक के ट्रक आलू सड़कों पर फेंक कर आने पड़ते हैं. ऐसे में कोल्ड स्टोरेज़ के महंगे किराए भी वे अपनी जमा-पूंजी में से ही भरते हैं. अब ज़रा सोचिए कि ये सारी व्यवस्था बदल जाए और 80 रुपये किलो की कोई सब्ज़ी ख़रीदने पर 70 रुपये किसान की जेब में जाएं, तो कितना अच्छा होगा! देश के किसान की हालत सुधर जाएगी. लेकिन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इसकी कोशिश शुरू की है, तो विपक्षी पार्टियां इसमें रोड़े अटकाने में लगी हैं. आप टीवी न्यूज़ चैनलों और अखबारों में किसानों के आंदोलन की ख़बरें देख-पढ़ रहे होंगे. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपील की है कि किसान किसी के बहकावे में नहीं आएं, लेकिन हमारे देश के मौजूदा राजनैतिक स्वरूप की विडंबना यही है कि जिस तबके को फ़ायदा पहुंचाने के प्रयास किए जाते हैं, वह बिना सोचे-समझे राजनैतिक पार्टियों के बहकावे में आ जाता है और फिर शुरू हो जाता है नकारात्मक राजनीति का अंतहीन सिलसिला.
किसी सियासी पार्टी को इस बात से क्या ऐतराज़ हो सकता है कि यूपी का किसान अपने प्रदेश में दाम ज़्यादा नहीं मिलने पर किसी दूसरे राज्य में अपनी फ़सल बेचे? ऐसा करने के लिए उसे अपना माल लेकर मंडियों-मंडियों की ठोकरें न खानी पड़ें, इसके लिए किसान ऑनलाइन मंडियों की स्थिति का आकलन करे कि किस प्रदेश में उसे अपेक्षाकृत अच्छे दाम मिल रहे हैं, तो इसमें किसी को क्या ऐतराज़ हो सकता है? केंद्र सरकार ऐसी व्यवस्था के लिए ही नया क़ानूनी प्रावधान करने का प्रयास कर रही है, तो किसानों की हालत सुधारने वाले इस प्रावधान का विरोध क्यों किया जा रहा है? असल में देश के किसान देख की मनचाही मंडी में या मंडी के बाहर अपनी फ़सल बेचेंगे, तो बहुत अंदर तक घर कर चुके बिचौलिये सिस्टम की कमर पूरी तरह टूट जाएगी और विपक्ष के सियासी विरोध की वजह यही है. बिना खेतों में पसीना बहाए, बिना कुछ भी जोख़िम में डाले आढ़तिया फ़र्मों का मकड़जाल किसानों का शोषण करे, तो कोई बात नहीं, क्योंकि आढ़तों के राजनीति आंगनों से सीधे संबंध हैं, लिहाज़ा उनके हितों की रक्षा के लिए कुछ सियासी पार्टियां किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. हरियाणा और पंजाब में मंडियों की स्थिति बहुत मज़बूत है और पंजाब में शिरोमणि अकाली दल का दबदबा आढ़त कारोबार में है, लिहाज़ा हर सिमरत कौर ने कैबिनेट मंत्री का पद तक त्याग दिया, तो इसे उनकी पार्टी की सियासी मजबूरी ही कहा जाएगा.

लेकिन केंद्र सरकार इस मामले में किसानों को भरोसे में नहीं ले पाई, यह उसकी कमी ही कही जाएगी. नया कृषि विधेयक अचानक नहीं लाया गया. इससे जुड़े प्रावधान करने के लिए संसद के बजट सत्र के बाद अध्यादेश लाया गया था. मज़े की बात यह रही कि उस समय न तो सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने बहुत ऐतराज़ जताया और न ही विपक्ष ने बहुत हंगामा किया. आपयो याद भी नहीं होगा कि मोदी सरकार संबंधित विधेयक कब लेकर आई थी. अगर विपक्ष को किसानों की भलाई वाले उपायों पर कोई बेसिक ऐतराज़ होता, तो क्यों नहीं विपक्ष न अध्यादेश लाए जाने के तुरंत बाद से अभी तक देश भर में किसानों को लामबंद करने के प्रयास किए? ऐसे में अगर अब कई राज्यों में किसान आंदोनल का असर दिखाई दे रहा है, तो किसानों को जागरूक नहीं कर पाना केंद्र सरकार की नाकामी ही कही जाएगी.

केंद्र सरकार यह आरोप भी लगा रही है कि उसने नए कृषि बिल में जो प्रावधान किए हैं, वैसा ही करने का वादा कांग्रेस ने अपने पिछले चुनाव घोषणा पत्र में भी किया था. प्रधानमंत्री मोदी ने साफ़-साफ़ कहा कि जो लोग दशकों तक देश की सत्ता पर क़ाबिज़ रहे, वे ही अब किसानों को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं. आरोप-प्रत्यारोप की बातों को अलग रखें, तो यह तो सही है कि आज़ादी के समय भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य तौर पर कृषि पर ही आधारित थी, लेकिन धीरे-धीरे किसानों की हालत बदतर होती गई और आज देश की आबादी में से 60 करोड़ लोग खेती से जुड़े हैं. खेती का रक़बा आज़ादी के समय से काफ़ी घट गया है. छोटे-मंझोले किसानों की अगली पीढ़ियां खेती-किसानी छोड़ चुकी हैं या फिर छोड़ने का इरादा कर रही हैं. ऐसे में कृषि की तरफ़ ध्यान देना सरकारों की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. देश में सिर्फ़ सात हज़ार मंडियां हैं, लेकिन होनी चाहिए 42 हज़ार मंडियां. गांवों को सड़कों से जोड़ने की गति मोदी सरकार ने बढ़ाई है, जिसके और तेज़ रफ़्तार पकड़ने की दरकार है. किसानों की अगली पीढ़ियां अच्छी शिक्षा ग्रहण कर सकें, इसके लिए ग्रामीण इलाक़ों के आसपास ही अच्छे स्कूल होने चाहिए, स्वास्थ्य के लिहाज़ से ग्रामीण इलाक़ों पर बहुत ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है... इत्यादि-इत्यादि. ऐसे में किसानों के मुद्दे पर नकारात्मक राजनीतिक की बजाए पक्ष और विपक्ष को मिल-बैठ कर विचार करने की ज़रूरत है. टकराव से किसी का भला नहीं होता.केंद्र सरकार ने साफ़ किया है कि मौजूदा क़ानून का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है. एमएसपी भी जारी रहेगा और सरकारी ख़रीद की व्यवस्था भी जस की तस रहेगी. फिर भी किसानों को भ्रम में डालने के प्रयास हो रहे हैं, तो किसानों को भी यह समझना पड़ेगा कि उनका असली हतैषी कौन है? कांग्रेस को यह भी याद रखना चाहिए कि राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए जब देश में कंप्यूटरीकरण की योजना पर अमल शुरू किया था, तब पूरे देश में इसका विरोध इस तर्क के साथ किया गया कि इससे बेरोज़गारी संकट पैदा हो जाएगा. लेकिन आज क्या स्थिति है. आज कंप्यूटर की जानकारी बिना कोई अच्छा रोज़गार मिलता ही नहीं. तो तात्कालिक आधार पर विरोध के बादलों में विकास की किरणों को ढंकने की कोशिशें करना अक्सर सही नहीं होता, यह समझने की ज़रूरत है. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: September 19, 2020, 7:42 PM IST
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