एक साथ मिलकर पहले आग बुझा लीजिए, फिर तय हो जाएगा कि लापरवाही किसकी थी?

राजनीति अपनी जगह है, लेकिन यह सही है कि राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों में कोरोना के गंभीर मरीज़ों के लिए ऑक्सीज़न की क़िल्लत की ख़बरें डरा रही हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने ऑक्सीज़न की सप्लाई में होने वाली सभी अड़चनें तत्काल दूर करने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से जवाब तलब कर लिया है.

Source: News18Hindi Last updated on: April 24, 2021, 4:09 PM IST
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एक साथ मिलकर पहले आग बुझा लीजिए, फिर तय हो जाएगा कि लापरवाही किसकी थी?
देश में जब लाखों लोग सेहत भरी सांसों के लिए जूझ रहे हैं, अस्पतालों में बिस्तरों की कमी पड़ती जा रही है, तब सियासी पार्टियां जिस तरह तू-तू, मैं-मैं में लगी हैं (सांकेतिक तस्वीर)
भारत में कोविड-19 की दूसरी जानलेवा लहर भयानक क़हर बरपा रही है. जगह-जगह से हालात और ख़राब होते जाने की ख़बरें मिल रही हैं. साथ ही बहुत सी ऐसी ख़बरें भी मिल रही हैं, जिनसे इंसानियत की सकारात्मक जिजीविषा के प्रबल होते जाने का विश्वास भी हो रहा है. यह बात अलग है कि देश का कथित मुख्यधारा के मीडिया की नज़रें ऐसे सकारात्मक प्रयासों कम ही पड़ती हैं. बहरहाल, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि कोरोना महामारी ने भारत में विकराल रूप ले लिया है. ऑक्सीज़न की भारी किल्लत अस्पतालों में मरीज़ों की सांसों की दुश्मन बन रही है.

देश में जब लाखों लोग सेहत भरी सांसों के लिए जूझ रहे हैं, अस्पतालों में बिस्तरों की कमी पड़ती जा रही है, तब सियासी पार्टियां जिस तरह तू-तू, मैं-मैं में लगी हैं, इसे देख-सुन कर बहुत अफ़सोस हो रहा है. ग़ैर-बीजेपी पार्टियां केंद्र सरकार पर कोरोना से निपटने की रणनीति नहीं बना पाने का आरोप लगा रही हैं. इनमें सबसे ज़्यादा मुखर हैं दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और ज़ाहिर है कि अपनी सियासी रणनीति का नतीजा भुगत रही कांग्रेस पार्टी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मीटिंग में अपनी बारी आने पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के संबोधन को लाइव करने से ही साफ़ हो गया कि वे हर मौक़े का सियासी फ़ायदा उठाने का ही प्रयास कर रहे हैं. सरकारी ख़ज़ाने का जितना पैसा वे अपना चेहरा चमकाने के लिए ख़र्च कर रहे हैं, उतने से कम से कम ऑक्सीज़न के मामले में दिल्ली को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता था.
लेकिन आप केंद्र सरकार को ही कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं और इसके लिए हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. दिल्ली के अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ाकर दिल्लीवासियों की जान बचाने में उनकी उतनी दिलचस्पी नहीं है. यह अलग बात है कि पीएमओ के ऐतराज़ के बाद दिल्ली के सीएमओ ने केजरीवाल का संबोधन लाइव होने पर माफ़ी मांग ली और बहाना बना दिया कि उन्हें पता नहीं था कि लाइव नहीं जाना था.

कांग्रेस शासित राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पीएम के साथ बैठक में शामिल हुए, लेकिन कोरोना के मामले में भी केंद्र पर भेदभाव का आरोप लगाने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एक बार फिर ऐसी बैठक से दूर ही रहीं.
राजनीति अपनी जगह है, लेकिन यह सही है कि राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों में कोरोना के गंभीर मरीज़ों के लिए ऑक्सीज़न की क़िल्लत की ख़बरें डरा रही हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने ऑक्सीज़न की सप्लाई में होने वाली सभी अड़चनें तत्काल दूर करने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से जवाब तलब कर लिया है. दिल्ली के साथ ही राजस्थान सरकार ने भी केंद्र से ऑक्सीज़न की सप्लाई बढ़ाने का अनुरोध किया है. यह बात भी सही है कि देश में कोई आपदा आने के बाद उससे निपटने में अगर नाकामी की बात आती है, तो केंद्र सरकार कटघरे में खड़ी की ही जाएगी. अब यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि राज्यों के साथ ही केंद्र सरकार ने भी कोरोना की दूसरी लहर के इतना प्रचंड होने का अनुमान लगाकर पूर्व में ही तैयारियां करने में देर की. इसका ही नतीजा आज सामने है.

लेकिन इस समय इस विश्लेषण का सही समय नहीं है कि किसने लापरवाही की, समय पर फ़ैसले नहीं किए, स्थिति की भयावहता का सटीक अनुमान लगाने में कौन असफल रहा? जब घर में आग लगी हो, तो पहले उसे बुझाने के प्रयास करना ही बुद्धिमानी होती है. अगर हम उस समय यह विश्लेषण करने लगेंगे कि आग किसकी लापरवाही से लगी और यह तय हो जाने के बाद उसे बुझाने की कोशिश करेंगे, तो फिर जब लपटें सब कुछ स्वाहा कर चुकी होंगी, तब हम पानी की बाल्टी तलाश रहे होंगे. जो हुआ, सो हुआ. अब तो ज़रूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्य मिलकर पूरे सटीक तालमेल के साथ कोरोना से जंग करने में जुट जाएं. देश के नागरिकों का कर्तव्य है कि सरकारें जो नियम बना रही हैं, उनका पालन सख़्ती से किया जाए. तभी हम कोरोना के वायरस का परास्त कर सकेंगे. मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात पर ज़ोर भी दिया कि जब सभी मिलकर एक राष्ट्र की तरह समस्या से मुठभेड़ करेंगे, तो संसाधनों की कमी का प्रश्न ही नहीं उठेगा. सवाल है कि इसके लिए पहल करेगा कौन?

सुविधाओं की किल्लतों के बीच केंद्र सरकार ने युद्ध स्तर पर काम शुरू कर दिया है, यह भी देशवासियों को पता होना चाहिए. फ़ौज के सारे अस्पताल कोरोना पीड़ितों के लिए खोल दिए गए हैं. डीआरडीओ ने भी कई अस्पतालों के संचालन की शुरुआत कर दी है. डीआरडीओ देश भर में ऑक्सीज़न प्लांट स्थापित करने में जुट गया है. ऑक्सीज़न की सप्लाई में कमी नहीं रहे, इसके लिए रेलवे की सेवाएं भी ली जा रही हैं और अब तो भारतीय वायु सेना ऑक्सीज़न की सप्लाई में जुट गई है.
सुप्रीम कोर्ट ने हालात पर नज़र रखना शुरू कर दिया है, तो इस बात की पूरी संभावना है कि अब सियासत कुछ कम होगी. लेकिन सवाल है कि क्या हर राज्य सरकार केंद्र से ऑक्सीज़न और ज़्यादा देने की मांग कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेगा? केंद्र सरकार भी आपकी नाकामी से पैदा हो रहे हालात से निपटने के लिए असीमित संसाधन कहां से लाएगी? हेल्थ यानी स्वास्थ्य राज्यों का विषय भी है. कोरोना की पहली लहर के बाद राज्य सरकारें क्यों चैन की बंसी बजाने लगी थीं?चलिए यह भी जान लेते हैं कि देश के राज्यों में ऑक्सीज़न उत्पादन की क्षमता हाल तक कितनी थी. ऑक्सीज़न की किल्लत बढ़ने के बाद अब ऑक्सीज़न का उत्पादन बहुत बढ़ा दिया गया है. इससे पहले महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा रोज़ाना 991 मीट्रिक टन ऑक्सीज़न का उत्पादन हो रहा था. गुजरात दूसरे नंबर पर है, वहां रोज़ 488 मीट्रिक टन ऑक्सीज़न का उत्पादन हो रहा था. तीसरे नंबर पर झारखंड है, जहां 434 मीट्रिक टन ऑक्सीज़न का उत्पादन रोज़ होता था. ओडिशा में 340, केरल में 298, कर्नाटक में 275, पश्चिम बंगाल में 264, तमिलनाडु में 249 मीट्रिक टन ऑक्सीज़न रोज़ बनाई जा रही थी. यूपी में 184, उत्तराखंड में 180, हिमाचल प्रदेश में 120, राजस्थान में 120 मीट्रिक टन ऑक्सीज़न का उत्पादन रोज़ हो रहा था. छत्तीसगढ़ में 85, पुड्डुचेरी में 84, तेलंगाना में 60 और हरियाणा में 40 मीट्रिक टन ऑक्सीज़न का उत्पादन रोज़ होता था.

उपरोक्त आंकड़े पढ़ लेने के बाद आप जानते ही हैं कि महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा, केरल, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में ग़ैर-बीजेपी सरकारें हैं. इन आठ राज्यों में रोज़ कुल 2,592 मीट्रिक टन ऑक्सीज़न का उत्पादन हो रहा था, जो ज़ाहिर है कि अब बहुत बढ़ गया होगा. आंकड़ों के हिसाब से बीजेपी शासित राज्यों में ऑक्सीज़न के रोज़ उत्पादन का आंकड़ा 1,620 मीट्रिक टन ही था और अब इसमें इज़ाफ़ा हुआ होगा, यह तय है. बड़ा सवाल यह है कि ऑक्सीज़न जैसे जीवनदायी तत्व के मामले में क्या ग़ैर-बीजेपी राज्यों के बीच भी कोई तालनेल नहीं है? क्या राजनैतिक स्वार्थों में घिर कर सिर्फ़ और सिर्फ़ मोदी को घेरने के इरादे से तालमेल बैठाने के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं? सवाल यह भी है कि बीजेपी शासित राज्यों में ऑक्सीज़न की किल्लत पर हाहाकार क्यों नहीं हो रहा है? साफ़ है कि कोई शक नहीं है कि ऑक्सीज़न की कमी तो है, लेकिन इस पर राजनीति ज़्यादा हो रही है, हायतौबा ज़्यादा मचाई जा रही है. ग़ैर-बीजेपी सरकारें तो केंद्र पर निशाना साध कर अपने लोगों की सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर सकती हैं, लेकिन देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश समेत उन तमाम राज्यों की सरकारें तो मोदी सरकार को कटघरे में भी खड़ा नहीं कर सकतीं.

कोई शक नहीं कि कोरोना के मरीज़ों के लिए ऑक्सीज़न की भारी कमी की ख़बरें दिल दहला रही हैं. लेकिन अगर सामान्य व्यक्ति के लिए सांस लेने के लिए साफ़ हवा ख़त्म होती जाएगी, तो हमारी अगली पीढ़ियों का जीवन कितना दर्दनाक होगा! क्या यह सोचना अब हम शुरू करेंगे? हम जिस रफ़्तार से पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं, हरियाली नष्ट कर रहे हैं, औद्योगिक गतिविधियों में असावधानियां बरत रहे हैं, उससे तो लगता है कि तीन-चार पीढ़ियों के बाद जीवन की डोर के पास उड़ने के लिए साफ़ हवा कम पड़ेगी, ज़िंदगी का गला तर करने के लिए ज़रूरी पीने का साफ़ पानी नहीं मिलेगा. ज़रा सोचिए, तब क्या होगा?

यह भी सही है कि जागरूकता की कमी की वजह से बहुत से संपन्न लोगों ने ऑक्सीज़न के सिलैंडर और आवश्यक दवाओं की जमाख़ोरी करना शुरू कर दिया है. स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोग भी जमाख़ोरी कर रहे हैं. दवाएं बहुत महंगे दामों पर बेची जा रही हैं. परेशान लोगों से एंबुलेंस वाले बहुत ज़्यादा किराया वसूल रहे हैं. ऐसे सभी लोग सामान्य अपराधी नहीं, इंसानियत के दुश्मन हैं. इन्हें सबक़ सिखाने के लिए सरकारों से राजनीति की नहीं, सख़्ती की दरकार है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
रवि पाराशर

रवि पाराशरवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. नवभारत टाइम्स, ज़ी न्यूज़, आजतक और सहारा टीवी नेटवर्क में विभिन्न पदों पर 30 साल से ज़्यादा का अनुभव रखते हैं. कई विश्वविद्यालयों में विज़िटिंग फ़ैकल्टी रहे हैं. विभिन्न विषयों पर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में शामिल हो चुके हैं. ग़ज़लों का संकलन ‘एक पत्ता हम भी लेंगे’ प्रकाशित हो चुका है।

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First published: April 24, 2021, 4:07 PM IST
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