OPINION: 2018 में ही इंसाफ़ हुआ होता, तो बल्लभगढ़ की निकिता की हत्या न होती!

बल्लभगढ़ में निकिता की सरेराह दिनदहाड़े हत्या कई बड़े सवाल खड़े कर रही है. पहला सवाल तो यही है कि क्या हरियाणा पुलिस का ख़ौफ़ अपराधियों में कम हो रहा है? हालांकि पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए 20 घंटे बाद ही आरोपितों की मुश्कें कस दीं, इसके लिए हरियाणा पुलिस की तारीफ़ भी की जानी चाहिए.

Source: News18Hindi Last updated on: October 29, 2020, 7:03 PM IST
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OPINION: 2018 में ही इंसाफ़ हुआ होता, तो बल्लभगढ़ की निकिता की हत्या न होती!
निकिता हत्याकांड सुर्ख़ियों में आने के बाद जब यह पता चलता है कि वर्ष 2018 में भी तौसीफ़ ने उसका अपहरण किया था.
हरियाणा के बल्लभगढ़ में बीकॉम की छात्रा निकिता तोमर की हत्या के आरोपितों तौसीफ़ वगैरह को पकड़ लिया गया है, लेकिन इस हत्याकांड पर बवाल जल्द थमने वाला नहीं है, यह तय है. मामला हिंदू बनाम मुसलमान हो गया है. कांग्रेस हरियाणा सरकार पर तो सवाल उठा रही है, लेकिन जिस तरह उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलित लड़की की हत्या के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका वाड्रा ने हंगामा खड़ा किया था, वैसा कुछ वे इस बार नहीं कर रहे हैं. क्या इसकी वजह यह है कि मुख्य आरोपी तौसीफ़ का चचेरा भाई कांग्रेस एमएलए है?

अगर ऐसा है, तो कांग्रेस के डीएनए में सेलेक्टिव राजनीति के कीटाणु अब भी बाक़ी हैं, एक बार फिर यह साबित करने के लिए और किसी तथ्य की आवश्यकता नहीं है. फिर से यह साबित हो रहा है कि इमरजेंसी के दौरान विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी में 42वां संविधान संशोधन पारित करा कर संविधान के प्रिएंबल यानी प्रस्तावना का मूल चरित्र क्यों बदल दिया गया था. 1976 में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में इंदिरा गांधी सरकार ने सेक्यूलर और सोशलिस्ट शब्द जोड़ दिए थे. मज़े की बात यह थी कि इन दोनों शब्दों की कोई परिभाषा तय नहीं की गई थी. लिहाज़ा सेक्यूलर शब्द का अर्थ आज धर्मनिरपेक्ष के रूप में लोकप्रिय कर दिया गया है, जबकि इसका सही हिंदी अनुवाद पंथनिरपेक्ष होना चाहिए.

बहरहाल, 1976 में ही साफ़ हो गया था कि गांधी परिवार मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति को अपना मुख्य सियासी हथियार बनाना चाहता था. अब हाथरस और बल्लभगढ़ जैसे हत्याकांडों पर कांग्रेस का भविष्य तय करने वाले नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रिया यह साफ़ कर देती है कि कांग्रेस अब भी तुष्टीकरण की राजनीति में ही विश्वास करती है. दूसरी तरफ़ भारतीय जनता पार्टी इसे लव जेहाद का एक और मामला मान रही है. पूरा मामला किस रंग में रंगा है, यह जांच करने वाली स्पेशल टास्क फ़ोर्स की टीम की चार्जशीट से ही पता चलेगा. एसआईटी को जांच के लिए 30 दिन दिए गए हैं और यह घोषणा भी कर दी गई है कि मामले की सुनवाई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी. इससे इतना तो तय है कि इस केस के अपराधियों को जल्द ही सज़ा मिल जाएगी. हत्याकांड क्योंकि सीसीटीवी कैमरे में क़ैद हो गया है, लिहाज़ा आरोपितों के बचने की कोई गुंजायश भी नहीं लगती. आरोपितों के लिए फांसी की सज़ा की मांग की जा रही है, लेकिन यह कोर्ट को तय करना होगा कि एकतरफ़ा प्यार में नाकामी के बाद अपरहरण और उसमें नाकाम रहने पर हत्या कर देने का ये केस रेयररेस्ट ऑफ़ रेयर यानी दुर्लभतम है या नहीं. जहां तक हिंदूवादी संगठनों के इसे लव जेहाद का मामला करार देने का प्रश्न है, तो इसकी विवेचना सामाजिक तौर पर ही हो सकती है. आईपीसी के तहत अदालत के लिए तो यह हत्या का ही एक और केस है.

बल्लभगढ़ में निकिता की सरेराह दिनदहाड़े हत्या कई बड़े सवाल खड़े कर रही है. पहला सवाल तो यही है कि क्या हरियाणा पुलिस का ख़ौफ़ अपराधियों में कम हो रहा है? हालांकि पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए 20 घंटे बाद ही आरोपितों की मुश्कें कस दीं, इसके लिए हरियाणा पुलिस की तारीफ़ भी की जानी चाहिए. एक और बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या किसी समूची पार्टी या सरकार को महज़ इसलिए ही कटघरे में खड़े कर दिया जाना चाहिए कि उसके किसी नेता या अधिकारी/कर्मचारी ने कोई अनैतिक, ग़ैरकानूनी काम किया है?
बल्लभगढ़ मामले में जिस तरह कांग्रेस पर सवाल उठाए जा रहे हैं, अंतिम तौर पर वे सही नहीं ठहराए जा सकते. हत्यारोपित तौसीफ़ का चचेरा भाई कांग्रेस विधायक है, तो क्या पूरी कांग्रेस कटघरे में खड़ी की जानी चाहिए? लेकिन सियासत में अब नैतिक-अनैतिक पैमानों पर सोचा ही नहीं जाता. दूसरी बात और ज्यादा परेशान करने वाली है कि कांग्रेस नेताओं ने इस मामले पर चुप्पी क्यों साध रखी है? क्या उन्हें भी लग रहा है कि किसी अपराधी का चचेरा भाई एमएलए है, तो इससे पूरी पार्टी पर दाग़ लग जाता है? यह सोच और इसकी वजह से बैकफ़ुट पर चले जाना सियासत के नैतिक पतन की ओर स्पष्ट इशारा है.

निकिता हत्याकांड सुर्ख़ियों में आने के बाद जब यह पता चलता है कि वर्ष 2018 में भी तौसीफ़ ने उसका अपहरण किया था, तो हैरत होती है कि तभी उसे क़ानून का डंडा इतनी ज़ोर से क्यों नहीं पड़ा, जिसकी याद उसे अभी तक रहती और एक मेधावी छात्रा इस तरह उसकी कुंठा का शिकार नहीं हो पाती? कहा जा रहा है कि तब निकिता के परिवार से माफ़ी मांग लेने के बाद ये मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया था. लेकिन निकिता के परिवार वाले कह रहे हैं कि उन्होंने दबाव में आकर समझौता कर लिया था. अब इस मामले की जांच के लिए बनाई गई एसआईटी 2018 की पर्तें भी उधेड़ेगी, तो पता चल पाएगी कि तब क्या हुआ था? इस पूरे मामले में हैरत की बात यह है कि सिविल मामलों की तरह क्रिमिनल मामलों में पक्षकारों के बीच समझौते का कोई प्रावधान आईपीसी में नहीं है.

आपराधिक मामले पीड़ित और आरोपित, दो पक्षों के बीच नहीं, बल्कि आरोपित बनाम सरकार के बीच चलते हैं. इस मामले में यह जानना दिलचस्प होगा कि 2018 में एक लड़की के अपहरण का मामला चुपचाप कैसे सुलट गया, जबकि लड़की की बाक़ायदा बरामदगी पुलिस ने की थी और आरोपित को पकड़ लिया गया था? इसमें अगर तौसीफ़ के रसूख़दार विधायक भाई की कोई भूमिका रही हो, तो उस पर राजनैतिक प्रहार करना और उसके बहाने पूरी कांग्रेस पर प्रहार करना समझ में आ सकता है.
हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के वाले दृष्टिकोण को एक बार को किनारे करके देखें, तो ये मामला नई पीढ़ी के दिमाग़ में विकसित होती जा रही विकृति का सुबूत है. प्यार जबरन तो नहीं किया जा सकता. क्या कोई आपसे प्यार करने से इनकार कर दे, तो आप उसे गोली मार देंगे? या फिर अपनी जान ले लेंगे?
निकिता के परिवार वाले यह आरोप भी लगा रहे हैं कि तौसीफ़ के परिवार वाले यह दबाव बना रहे थे कि वे निकिता का धर्म-परिवर्तन करा कर तौसीफ़ के साथ उसकी शादी करा दें. अगर यह सही है, तो फिर तौसीफ़ के परिवार वालों के ख़िलाफ़ भी क़ानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए. उन्हें तौसीफ़ पर लगाम लगाने का काम करना चाहिए था. न कि निकिता के परिवार पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाकर तौसीफ़ की हौसला अफ़ज़ाई करने का.

कुल मिलाकर परिवारों, समाज और पुलिस के स्तर पर लापरवाही न बरती गई होती, तो निकिता आज जीवित होती. निकिता को तौसीफ़ की रसूख़दार कुंठा ने तो गोली मारी ही, साथ ही उसके परिवार के दब्बू स्वभाव ने भी उसकी जान ली, यह कहा जाए, तो ग़लत नहीं होगा. 2018 में ही तौसीफ़ को सबक़ सिखा दिया जाता, तो एक बेटी का ख़ून बल्लभगढ़ की सड़क के साथ-साथ करोड़ों दिलों में न बहता.



(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)




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First published: October 29, 2020, 6:59 PM IST
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