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Opinion : लड़कियों की शादी की उम्र को लेकर खाप की दोहरी मानसिकता, शर्तों पर किया समर्थन

खाप ने यह मांग भी की है कि क़ानून में एक ही गांव या पड़ोस के गांवों और एक ही गोत्र में शादी को मान्यता नहीं देने का प्रावधान भी होना चाहिए. खाप की बैठक में अच्छी बात यह रही कि फ़ैसला भले ही सर्वसम्मति के नाम पर किया गया हो, लेकिन छह घंटे तक चली बैठक में लड़कियों की शादी की उम्र 21 साल करने के पक्ष में भी आवाज़ें बुलंद हुईं.

Source: News18Hindi Last updated on: December 24, 2021, 2:45 PM IST
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Opinion : लड़कियों की शादी की उम्र को लेकर खाप की दोहरी मानसिकता, शर्तों पर किया समर्थन
लड़कियों की शादी की उम्र तय करने के लिए बनी टास्क फ़ोर्स ने उम्र बढ़ाने की सिफ़ारिश की थी. (सांकेतिक तस्वीर

लड़कियों की शादी की उम्र 21 साल करने का मोदी सरकार का फ़ैसला फ़ौरी तौर पर लोकसभा में नकारात्मक राजनीति का शिकार हो गया. सामाजिक तौर पर भी इस पर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं. हरियाणा की सर्व खाप पंचायत तो दोराहे पर दिख रही है. सर्व खाप इसे सैद्धांतिक तौर पर सही मानती है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर उसका यह भी मानना है कि अगर माता-पिता 18 साल की लड़की की शादी करना चाहते हैं, तो उन्हें इसकी क़ानूनी इजाज़त मिलनी चाहिए.


खाप का खटोला वहीं बिछेगा

आपको नहीं लगता कि हरियाणा की सर्व खाप पंचायत का निर्णय इस तरह का है कि पंचों की राय सिर-माथे, पर खटोला वहीं बिछेगा? खाप का विचार है कि कोर्ट मैरिज के लिए तो लड़कियों की 21 साल की उम्र सही है, लेकिन सामाजिक तौर पर सही नहीं है. ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि माता-पिता की सहमति से 18 साल की लड़कियों की शादी अगर मान्य होगी, तो फिर कम से कम 21 साल उम्र में शादी का क़ानून बनाने का क्या फ़ायदा? दूसरी उलझन यह होगी कि 18 साल की लड़की की शादी अगर ग़ैर-क़ानूनी नहीं मानी जाएगी, तो ऐसी शादियों का रजिस्ट्रेशन तीन साल बाद ही हो पाएगा. ऐसे में 18 से 21 वर्ष पूरे होने से एक दिन पहले तक अगर लड़की के साथ कुछ ग़लत होता है (जैसे पति की मृत्यु, लड़का लड़की को छोड़ दे इत्यादि), तो उसके सम्मान और सामाजिक उत्तराधिकार का सवाल कैसे हल होगा? उसका भविष्य सुरक्षित कैसे होगा?


नहीं बदल पा रही मानसिकता

खाप ने यह मांग भी की है कि क़ानून में एक ही गांव या पड़ोस के गांवों और एक ही गोत्र में शादी को मान्यता नहीं देने का प्रावधान भी होना चाहिए. खाप की बैठक में अच्छी बात यह रही कि फ़ैसला भले ही सर्वसम्मति के नाम पर किया गया हो, लेकिन छह घंटे तक चली बैठक में लड़कियों की शादी की उम्र 21 साल करने के पक्ष में भी आवाज़ें बुलंद हुईं. समर्थन करने वालों की दलील थी कि इससे लड़के-लड़कियों के घर से भाग कर शादी करने के मामले कम होंगे. यानी लड़कियों की शादी कम से कम 21 साल में करने का समर्थन उन्हें सामाजिक बराबरी देने की मानसिकता की वजह से नहीं, परिवार की इज्ज़त यानी झूठी आन-बान-शान की रक्षा की मानसिकता के कारण किया गया.

एक और बात. खापों की मानसिकता नहीं बदलने के कारण प्रेम विवाहों के बाद लड़के-लड़कियों की हत्या के बहुत से मामले सामने आ चुके हैं.ऑनर किलिंग की वारदात इतनी बढ़ीं कि मीडिया को इसके लिए ऑनर किलिंग जैसा शब्द अपनाना पड़ा. ताकि इस तरह के अपराध को ऑनर यानी इज्ज़त के नाम पर करने की मान्यता पर सटीक कुठाराघात हो सके. हर अपराध सिद्ध होने पर सज़ा मिलती है, लेकिन ऑनर किलिंग के अपराध को किसी समूह विशेष के स्वभावगत कृत्य की तरह मान्यता नहीं दी जा सकती.


ग़ैर-बराबरी को हो चुके 75 साल





बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक, 2021 फ़िलहाल संसद की स्थायी समिति के पास विचार मंथन के लिए भेज दिया गया है. वहां सभी संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श के बाद मिले सुझाव शामिल कर बिल दोबारा संसद में रखा जाएगा. मौजूदा सूरत में बिल क़ानून बनता, तो यह सभी समुदायों पर लागू होता. यानी अगर संबंधित मौजूदा प्रावधान बरक़रार रहा, तो सभी समुदायों के विवाह क़ानूनों में संशोधन करना होगा. केंद्र की मोदी सरकार का मानना है कि लड़कियों को शादी के मामले में लड़कियों को सामाजिक बराबरी मिलनी चाहिए. केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने बिल पेश करते हुए लोकसभा में कहा भी कि महिलाओं और पुरुषों को शादी के लिए बराबरी का हक़ देने में हमने 75 साल की देरी कर दी है.


समानता का अधिकार ज़रूरी

स्मृति ने बताया कि वर्ष 1940 तक देश में लड़कियों की शादी की उम्र 10 साल थी. इसे बढ़ाकर 12, फिर 15 और उसके बाद 18 साल किया गया. उन्होंने जानकारी दी कि क़ानून के बल पर 2015 से लेकर 2020 के दौरान भारत में 20 लाख बाल विवाह रुकवाए गए. उन्होंने यह भी कहा कि बिल का विरोध करने वालों को सुप्रीम कोर्ट का 2010 का वह फ़ैसला पढ़ना चाहिए. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और हिंदू मैरिज एक्ट के तहत भी सभी महिलाओं को शादी के मामले में समानता का अधिकार मिलना चाहिए.


विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?

एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने बिल को पीछे ले जाने वाला करार दिया. उनका तर्क था कि यह आर्टिकल 19 के तहत मिले आज़ादी के अधिकार पर चोट करता है. 18 साल की कोई लड़की देश का प्रधानमंत्री चुन सकती है, लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकती है, तो फिर उसका शादी का अधिकार क्यों छीना जा रहा है?


सर्वे के बाद तैयार हुआ बिलअब यह भी जान लेते हैं कि केंद्र सरकार पर सभी संबंधित पक्षों की राय जाने बिना बाल विवाह संशोधन बिल लाने का आरोप सही नहीं है. लड़कियों की शादी की उम्र तय करने के लिए बनी टास्क फ़ोर्स ने उम्र बढ़ाने की सिफ़ारिश की थी. जून, 2020 में 10 सदस्यों वाली टास्क फ़ोर्स जया जेटली के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बनाई थी. इस पैनल ने 16 विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं की राय जानने के बाद लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाकर 21 साल करने का सुझाव सरकार को दिया था. 15 एनजीओ की मदद से किए गए टास्क फ़ोर्स के सर्वे में शामिल ज़्यादातर युवाओं ने माना कि लड़कियों की शादी कम से कम 21 साल की जाएगी, तो इससे परिवारों, महिलाओं और बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. यह भी जान लें कि सर्वे में सभी धर्मों के युवाओं को शामिल किया गया और शहरी के साथ-साथ ग्रामीण इलाक़ों में भी रायशुमारी की गई.


सर्वे में शामिल हुए 16 विश्वविद्यालय

टास्क फ़ोर्स में शामिल जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की कुलपति नजमा अख़्तर ने 16 विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच विस्तृत प्रश्नावली बांटी. लगभग 2,300 विद्यार्थी सर्वेक्षण का हिस्सा बने, जिनमें 52 प्रतिशत छात्राएं थीं. 16 विश्वविद्यालयों के लगभग 70 प्रतिशत विद्यार्थियों ने लड़कियों की शादी की क़ानूनी उम्र 18 से 21 वर्ष करने का समर्थन किया. समर्थन करने वालों में 60 प्रतिशत लड़के थे और 80 प्रतिशत लड़कियां.


शादी की आदर्श उम्र 26 से 30 वर्ष

सर्वे में यह निष्कर्ष भी सामने आया कि ज़्यादातर युवा (67 प्रतिशत) शादी की आदर्श उम्र 26 से 30 तक मानते हैं. जबकि 21 और 25 साल के बीच शादी के इच्छुक युवा सिर्फ़ 20 प्रतिशत थे और 12 फ़ीसदी युवा 30 साल के बाद शादी को आदर्श मानते हैं. यह जानना भी महत्वपूर्ण होगा कि सर्वे में 24 प्रतिशत छात्र-छात्राओं का मानना था कि लड़कियों की शादी की उम्र में कोई बदलाव नहीं किया जाना चाहिए.


खाप की दकियानूसी मानसिकता

इस तरह मोदी सरकार पर यह आरोप ग़लत ही कहा जाएगा कि बिल लाने से पहले संबंधित पक्षों की राय नहीं जानी गई. जहां तक खाप पंचायतों का सवाल है, तो शादी और कई मामलों में उनकी दकियानूसी मानसिकता से सभी परिचित हैं. कभी खापें लड़कियों को मोबाइल फ़ोन नहीं देने का फ़ैसला करती हैं, तो कभी उनके पहनावे को लेकर फ़रमान जारी किए जाते हैं. प्रेम विवाहों को लेकर तो खापों का रवैया पूरी तरह नकारात्मक है. इसलिए लड़के-लड़कियों की मर्ज़ी से अगर उनकी शादी की उम्र एक समान करने का निर्णय नरेंद्र मोदी सरकार ने लिया है, तो इसमें किसी को नकारात्मक राजनीति नहीं करनी चाहिए.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
रवि पाराशर

रवि पाराशरवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. नवभारत टाइम्स, ज़ी न्यूज़, आजतक और सहारा टीवी नेटवर्क में विभिन्न पदों पर 30 साल से ज़्यादा का अनुभव रखते हैं. कई विश्वविद्यालयों में विज़िटिंग फ़ैकल्टी रहे हैं. विभिन्न विषयों पर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में शामिल हो चुके हैं. ग़ज़लों का संकलन ‘एक पत्ता हम भी लेंगे’ प्रकाशित हो चुका है।

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First published: December 24, 2021, 2:45 PM IST
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