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नए कानून से एमएसपी व्यवस्था और मजबूत होगी, दोबारा विचार करें किसान

विपक्ष कह रहा है कि नए कृषि कानूनों से मंडियों की व्यवस्था बदहाल होगी. न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की व्यवस्था पर भी यह बड़ी चोट साबित होगी. दूसरी तरफ़ पीएम नरेंद्र मोदी जोर देकर कह रहे हैं कि नए कानूनों का एमएसपी या मंडी व्यवस्था को चौपट करने से कोई लेना-देना नहीं है.

Source: News18Hindi Last updated on: September 25, 2020, 2:23 PM IST
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नए कानून से एमएसपी व्यवस्था और मजबूत होगी, दोबारा विचार करें किसान
केंद्र सरकार ने खेती से जुड़े तीन नए कानून बनाए हैं.
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी है कि इसमें असहमति को सहमति के बराबर का दर्जा दिया गया है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की परिकल्पना ही लोक को निरंकुश होने से बचाने के लिए की गई है. लेकिन क्या ‘विपक्ष’ या फिर ‘असहमति’ को ‘विरोध’ की संज्ञा दी जा सकती है? क्या आवश्यकता पड़ने पर असहमति जताने के लिए व्यवस्थित किए गए तंत्र के एक हिस्से को किसी भी मसले पर सहमति नहीं जतानी चाहिए? इन दो मूल प्रश्नों पर अगर गंभीरता से विचार करेंगे, तो हमें आज केंद्र की राजनीति में विपक्षी पार्टियों के रवैये को समझने में ख़ासी मदद मिल सकती है. मोदी सरकार (Modi Govt) जो भी फ़ैसले कर रही है, कांग्रेस नीत विपक्षी पार्टियां उसका विरोध कर रही हैं. न तो वे चीन को लेकर मौजूदा भारतीय विदेश नीति से सहमत हैं, न रफाल जैसे रक्षा सौदों से जुड़ी रक्षा नीति से और न ही किसानों की हालत सुधारने के लिए की गई पहलकदमी से. अब लगता है कि विपक्ष का अर्थ सिर्फ और सिर्फ विरोध करना ही रह गया है, वह भी बिना सोचे-समझे.

संसद के मॉनसून सत्र में मोदी सरकार ने किसानों से जुड़े तीन बिल पास कराए, तो विपक्ष इतना हमलावर हो गया कि संसदीय मर्यादा तक ताक पर रख दी गई. राज्यसभा में सभापति का हर तरह से अपमान किया गया. जब मर्यादा की सीमा-रेखा लांघने की वजह से आठ विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित किया गया, तो संसद भवन परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के नीचे अभूतपूर्व रात्रि जागरण किया गया. आजादी के बाद से अभी तक ऐसा नहीं हुआ था. किसान उत्पाद और अनुबंध से जुड़े नए कानूनों के जरिये सरकार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पहली बार किसानों को आजादी देने का दावा कर रही है, तो विपक्षी पार्टियां तर्क दे रही हैं कि इससे पहले से ही बर्बाद किसान और बेहाल हो जाएंगे, वे अकूत दौलत वालों के गुलाम बन कर रह जाएंगे. हालांकि विपक्ष के तर्कों में धार नहीं है.

विपक्ष कह रहा है कि नए कानूनों की वजह से मंडियों की व्यवस्था तो बदहाल होगी ही साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की व्यवस्था पर भी बड़ी चोट होगी. दूसरी तरफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जोर देकर कह रहे हैं कि नए कानूनों का एमएसपी या मंडी व्यवस्था को चौपट करने से कोई लेना-देना ही नहीं है. सरकार बार-बार कह रही है कि एमएसपी व्यवस्था बाकायदा बनी रहेगी, सरकारी खरीद भी होती रहेगी, मंडियां भी बदस्तूर चल सकती हैं. इतना ही नहीं, अपने कथन के समर्थन में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कमेटी ने खरीफ की फसलों का नया समर्थन मूल्य निर्धारित भी कर दिया है. फिर क्या वजह है कि एमएसपी को लेकर देश भर में किसानों में भ्रम फैलाने की कोशिशें की जा रही हैं? वैसे इस बार किसान आंदोलन देशव्यापी है, ऐसा कहना सही नहीं होगा. सिर्फ़ पंजाब और हरियाणा में ही ज्यादा शोर-शराबा दिख रहा है. इसकी वजह भी यही है कि इन दोनों प्रदेशों में किसान मंडियों से जुड़ा बुनियादी ढांचा काफी मजबूत है और वहां का आढ़ती समाज काफी रसूखदार है, उसकी व्यापक पहुंच सियासत तक है.

सरकार की दलील है कि अगर किसानों को बाजार में अपने उत्पाद बेचने की खुली छूट दी जा रही है, तो इससे उनकी हालत अच्छी ही होगी. अभी तक दूसरे उद्योगों को अपने उत्पादों की तर्कसंगत कीमत तय करने का अधिकार था. लेकिन अब किसानों को भी अपनी फसलों के दाम तय करने का अधिकार यानी आजादी दे दी गई है.
तो फिर इससे विपक्षी पार्टियां बेचैन क्यों हो रही हैं? किसान चाहे तो मंडी में अपने उत्पाद बेचे या फिर एमएसपी से ज्यादा मूल्य पर खुले बाजार में या फिर एमएसपी पर सरकार को. विरोध करने वालों की दलील है कि एमएसपी तय होने के बावजूद किसान को अक्सर कम ही मूल्य मिलता रहा है. ऐसे में विपक्ष से यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि अगर किसानों को एमएसपी तक नहीं मिल पा रहा है, तो फिर मंडियों की मौजूदा व्यवस्था पर वह सवाल क्यों खड़े नहीं कर रहा है? मंडियों में माल लेकर पहुंचने वाले किसानों का शोषण आखिर करता कौन है? उत्तर साफ है कि बिचौलिये करते हैं, आढ़तियों के गुट करते हैं. ऐसे में अगर सरकार ने बाजार और किसान के बीच से बिचौलिये हटाने की व्यवस्था की है, तो फिर इसमें किसी को क्या दिक्कत है? अभी होता यह है कि किसान ट्रकों में अपनी फसल लेकर पहुंचता है, तो उसे उचित भाव कोई देने को तैयार होता ही नहीं है. किसान कितने दिन तक घर से बहुत दूर मंडी में पड़ा रहे, कितने दिन तक ट्रक का भाड़ा सहता रहे... तंग आकर वह औने-पौने दाम में फसल बेचकर घर लौट आता है.

नए कानूनों के बाद अगर किसान को उसकी मनचाही कीमत पर फसल बेचने का अवसर देश भर में कहीं भी मिलेगा, इससे तो किसान को खुश होना चाहिए और ऐसा है भी. यही वजह है कि विपक्ष ने सरकार को घेरने के लिए देशव्यापी बंद जरूर बुलाया, लेकिन बिहार जैसे प्रदेश में इसका कोई असर देखने को उस सूरत में भी नहीं मिला, जबकि कुछ दिन बाद ही वहां चुनाव होने हैं. नए कानून के तहत किसान अब कंपनियों के साथ अनुबंध पर खेती कर पाएंगे. यह व्यवस्था कहीं-कहीं पहले से ही लागू है, लेकिन अब इस पर कानून होने की मुहर लग गई है. अनुबंध के तहत होने वाली खेती की सूरत में प्राकृतिक कारणों से होने वाले नुकसान की भी पूरी मार किसान पर नहीं पड़ेगी. फसलों को ढोने और उनके भंडारण की समस्या से भी उन्हें दो-चार नहीं होना पड़ेगा.

पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री के अनुसार मोदी सरकार जो कानून लेकर आई है, उनकी अवधारणा नई नहीं है. काफी पहले भी किसानों की हालत सुधारने के लिए यही व्यवस्था करने का प्रयास किया गया था. 26 जुलाई, 1990 को उच्चाधिकार संपन्न समिति ने तत्कालीन वीपी सिंह सरकार के सामने ऐसी ही सिफारिशें प्रस्तुत की थीं. उस समय चौधरी देवीलाल उप-प्रधानमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री थे. शास्त्री के अनुसार तब से लेकर करीब दो दर्जन बार इन सिफारिशों पर संसदीय समतियों और दूसरी समितियों ने विचार किया, लेकिन किसी सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. शास्त्री जी के कथन से साफ हो जाता है कि आढ़ती व्यवस्था की जड़ें राजनीति में गहरी होने की वजह से अभी तक किसी सरकार की हिम्मत ही नहीं पड़ी कि वह उनका विरोध मोल ले सके. एनडीए के सहयोगी अकाली शिरोमणि दल ने अपने कोटे का मंत्री पद छोड़कर पंजाब के आढ़ती समाज का गुस्सा शांत करने का ही प्रयास किया है.किसानों को जागरूक करने की बजाए अगर विपक्ष उन्हें भड़का रहा है, तो उसकी हताशा साफ झलक रही है. आपके पास मुद्दे नहीं हों, तो शांत बैठ जाना चाहिए. किसी कानून से अगर भारत जैसे कृषि प्रधान देश की अधिसंख्य आबादी का फायदा होने वाला हो, तो ऐसी सूरत में सरकार के फैसले का विरोध करने का कोई मतलब नहीं है. विरोध के नाम पर आप किसानों को रेल की पटरियों पर बैठा रहे हैं, देश के आम लोगों के स्वतंत्र आवागमन के अधिकारों पर डाका डाल रहे हैं, सरकारी संपत्तियों को बंधक बना रहे हैं या नुकसान पहुंचा रहे हैं, तो ऐसा विरोध सकारात्मक तो नहीं कहा जा सकता. विरोध के नाम पर अगर खेती-किसानी से जुड़े उत्पादों को सड़कों पर फेंक कर बर्बाद किया जा रहा है, तो ऐसा विरोध सिर्फ और सिर्फ नकारात्मकता ही पैदा करता है. चलिए, आप किसी कानून के किसी प्रावधान का विरोध करते हैं और नई मांग सामने रखते हैं, तो भी विरोध शांतिपूर्ण ढंग से किया जा सकता है. विरोध के नाम पर दूध, फल-सब्ज़ियां सड़कों पर फेंकने की बजाय अगर जरूरतमंदों को मुफ्त में बांट दी जाएं, तो कितना अच्छा हो!

देश के किसानों को चाहिए कि वे केंद्र के नए कानूनों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी लें. किसान संगठनों को चाहिए कि वे किसानों को घर-घर जाकर कानूनों के फायदे समझाएं. भारतीय जनता पार्टी ने जागरूकता अभियान चलाने का फैसला किया भी है. लेकिन अगर यही फैसला तब कर लिया जाता, जब मोदी सरकार ने बजट सत्र के बाद अध्यादेश लाकर नए कानून लागू किए थे, तो शायद विपक्ष को एमएसपी को लेकर भ्रम फैलाने का मौका नहीं मिलता. किसान उत्पाद खरीद की नई व्यवस्था लागू होने के बाद देश में भंडारण के बुनियादी ढांचे के विकास में भी मदद मिलेगी. इससे भी एमएसपी पर खरीद व्यवस्था और मजबूती पकड़ेगी. क्योंकि अभी भंडारण सुविधा अधिक नहीं होने की वजह से सरकारें किसानों के उत्पाद मनचाही मात्रा में खरीद नहीं पातीं. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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First published: September 25, 2020, 2:23 PM IST
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