यूपी चुनाव से पहले किसानों को समझा ले बीजेपी, तो हो सकता है बड़ा फ़ायदा

इस बार ‘एक राष्ट्र, एक MSP, एक DBT’ के तहत गेहूं की खरीद कर पैसा सीधे किसानों के खाते में भेजा जा रहा है. केंद्र सरकार ने सरसों का MSP 4650 रुपये क्लिंटल रखा है, लेकिन खुले बाज़ार में यह 7,900 रुपये के क़रीब तक बिका है. इस तरह के उदाहरणों के जरिए, APMC यानी मंडी व्यवस्था किसानों को भविष्य के प्रति आश्वस्त करना चाहती है.

Source: News18Hindi Last updated on: June 10, 2021, 3:28 PM IST
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यूपी चुनाव से पहले किसानों को समझा ले बीजेपी, तो हो सकता है बड़ा फ़ायदा
तीनों कृषि सुधार क़ानून सिरे से रद्द किए जाने की मांग को लेकर किसान संगठन दिल्‍ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं.
कोरोना की मार के बीच पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कुछ दूसरी जगहों के किसान राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन के नाम पर डटे हुए हैं. किसान अपनी पुरानी मांग पर अड़े हैं कि उनकी हालत सुधारने के इरादे से बनाए गए तीनों कृषि सुधार क़ानून सिरे से रद्द किए जाएं, तभी वे घर लौटेंगे. सत्ता पक्ष का आरोप है कि किसान विपक्ष के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं.

मोदी सरकार जब देश भर के किसानों की भलाई में जुटी है, तब किसान स्वार्थ की राजनीति के शिकार हो रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के इस आरोप को हवा राकेश टिकैत समेत कई किसान नेताओं के इस बयान से मिलती है कि किसान आंदोलन या तो 2022 में या फिर जून-जुलाई, 2024 में ख़त्म हो जाएगा. असल में जनवरी-फ़रवरी, 2022 में उत्तर प्रदेश में और मई, 2024 लोकसभा चुनाव होने हैं.

टिकैत के बयान से साफ़ है कि वे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को डगमगाना चाहते हैं और ज़ाहिर है कि बाद में वे मोदी सरकार को हरवाना चाहते हैं. दिलचस्प यह है कि 2022 में पंजाब में भी विधानसभा चुनाव होना है, लेकिन आंदोलनकारी किसान उसका ज़िक्र नहीं करते. जबकि हक़ीक़त यह है कि आंदोलन का ट्रिगर पंजाब के समृद्ध आढ़तियों ने ही नए कृषि विपणन क़ानूनों के विरोध में दबाया था.


बहरहाल... आइए एक नज़र डालते हैं कि इस समय जबकि कोरोना पूरे ज़ोर पर है, तब देश भर में किसानों के लिए क्या-क्या किया जा रहा है. न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर गेहूं की रिकॉर्ड ख़रीद की जा रही है. 1 अप्रैल, 2021 से देश भर में 411.12 लाख मीट्रिक टन गेहूं की रिकॉर्ड ख़रीद हो चुकी है. 2 जून, 2021 तक के आंकड़े के अनुसार क़रीब 44.43 लाख किसानों से MSP पर गेहूं ख़रीदा जा चुका था.
इस दौरान 76 हज़ार करोड़ से ज़्यादा रुपये डायरेक्ट बैंक ट्रांसफ़र यानी DBT के ज़रिए किसानों के खातों में सीधे भेजे गए. कुल ट्रांसफ़र किए गए पैसों में से सबसे ज़्यादा पंजाब के किसानों को मिले. पंजाब के किसानों के खाते में 26 हज़ार, 103 करोड़ रुपये से ज़्यादा भेजे गए. हरियाणा के किसानों को 16 हज़ार, 706 करोड़ रुपये केंद्र सरकार से गेहूं ख़रीद के बदले में मिले. पिछले साल यानी 2020 में इसी अवधि में 389.92 लाख मीट्रिक टन गेहूं MSP पर ख़रीदा गया था.

तथ्य यह है कि हरियाणा, यूपी, एमपी, बिहार, राजस्थान, हिमाचल, दिल्ली, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर समेत कई राज्यों में गेहूं ख़रीद जारी है. इस साल ‘एक राष्ट्र, एक MSP, एक DBT’ के तहत गेहूं ख़रीद का पैसा तुरंत सीधे किसानों के खातों में भेजा जा रहा है. इसके अलावा केंद्र सरकार ने सरसों का MSP रखा है 4650 रुपये क्लिंटल, लेकिन खुले बाज़ार में यह 7,900 रुपये के क़रीब तक बिका है. 24 मई, 2021 को कुछ मंडियों में गेहूं का भाव भी MSP से ऊपर पहुंच गया था. महाराष्ट्र की दौंड मंडी में गेहूं 2,000 रुपये और यूपी के शिकोहाबाद में 1985 रुपये प्रति क्विंटल तक जा पहुंचा था.

किसान आंदोलन के कारण केंद्र सरकार ने तीनों कृषि क़ानूनों पर अमल अभी रोक रखा है, फिर भी खुले बाज़ार में किसानों को एमएसपी से ज़्यादा दाम मिल रहे हैं. ज़ाहिर है कि कृषि क़ानूनों के दबाव में ही खुली मंडियों में गेहूं और सरसों का दाम इस सीज़न में MSP से ज़्यादा पहुंच रहा है. कहा जा सकता है कि ऐसा उदाहरण पेश कर APMC यानी मंडी व्यवस्था किसानों को भविष्य के प्रति आश्वस्त करना चाहती है.
किसानों को एक और बहुत बड़ा फ़ायदा कृषि क़ानूनों के दबाव में यह होने वाला है कि मंडियों से उन्हें होने वाला भुगतान बहुत लटकेगा नहीं. मंडियों से किसानों को भुगतान बड़ी समस्या थी. इसमें कई महीने लग जाते थे. लेकिन अब क्योंकि केंद्र सरकार फ़सल ख़रीद की क़ीमत सीधे किसानों के खाते में डाल रही है, लिहाज़ा खुले बाज़ार को भी ऐसा करने को मजबूर होना होगा.


किसानों को यह भी समझना चाहिए कि कोरोना से निपटने के लिए इंतज़ामों की वजह से सरकारी ख़ज़ाने पर भारी दबाव है, इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सम्मान निधि की राशि किसानों के खाते में डाली है. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी कह रही है कि केंद्र की मंशा पर सवाल उठाना महज़ राजनीति नहीं, तो क्या है?  ज़ाहिर है कि दिल्ली के गाज़ीपुर बॉर्डर पर जून-जुलाई, 2024 के आम चुनाव तक डटे रहने के जो बयान किसान नेताओं ने दिए हैं, उससे इस बात को बल मिलता है कि आंदोलन के नेतृत्व का उद्देश्य सिर्फ़ केंद्र और यूपी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बना कर आगामी चुनावों में राजनैतिक हित साधना भर है. किसानों की स्थाई बेहतरी से उनका कोई लेना-देना नहीं है.

अब सवाल यह उठता है कि क्या इस ख़रीद सीज़न में किसानों की पौबारह एक तरह से इस बात का पूर्वाभास है कि अगर तीनों क़ानून लागू कर दिए जाएं, तो किसानों को उनकी फ़सलों का अधिक प्रतियोगी मूल्य मिलने लगेगा? तथ्य यह है कि दिल्ली की सीमाओं पर क़रीब 40 किसान संगठनों से जुड़े किसानों के जुटने की बात शुरू से ही होती रही है. छह महीने से ज़्यादा समय के बाद अब तो संगठन और कम हो गए होंगे. देश में 500 से ज़्यादा किसान संगठन हैं. अगर तीनों क़ानून लागू हुए बिना देश भर के शेष संगठनों से जुड़े किसानों को अच्छा मूल्य मिलता रहा, तो क्या दिल्ली की सीमाओं पर कथित आंदोलन दबाव में नहीं आ जाएगा? ऐसे में अगर आंदोलन लंबा खींचा गया, तो दिल्ली के बाहर जुटे किसानों को आख़िरकार क्या मिलेगा?

किसानों की नाराजगी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार लगातार बातचीत के लिए दरवाज़े खुले रखने की बात कह रही है. (फाइल फोटो)
किसानों की नाराजगी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार लगातार बातचीत के लिए दरवाज़े खुले रखने की बात कह रही है. (फाइल फोटो)


एक तथ्य और जान लें. किसान आंदोलन का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद उसने हालात को समझने के लिए विशेषज्ञ कमेटी बनाई थी. उस कमेटी ने भी अपनी सिफ़ारिशें गत अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी हैं. माना जा रहा था कि अप्रैल में ही कोर्ट उन पर विचार कर सकता था, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है. सूत्रों के मुताबिक़ कमेटी ने किसानों की बेहतरी के लिए कई अहम सुझाव तो दिए हैं, लेकिन तीनों कानूनों को रद्द करने की सिफ़ारिश नहीं की है. कोर्ट जल्द ही (एक-दो या तीन महीने में) इन सिफ़ारिशों पर विचार करेगा, इसकी पूरी संभावना है. ऐसे में आंदोलनकारी किसानों पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से घर वापसी के लिए दबाव नहीं पड़ेगा? क्या किसान सुप्रीम कोर्ट का भी फ़ैसला नहीं मानेंगे?

बेहतर होगा कि कोरोना काल के बावजूद अच्छी परिस्थितियों को देखते हुए किसान कोई बीच का रास्ता सरकार के साथ बातचीत की पहल कर निकाल लें. किसानों का कोई सर्वमान्य नेता इस आंदोलन में अभी तक नहीं उभरा है. दिल्ली की सभी सीमाओं पर अलग-अलग नेतृत्व नज़र आ रहा है. ऐसे में अगर आंदोलन बहुत खिंचने के आसार बनते दिखाई दिए, तो इसके यकायक बिखरने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता. यह भी सही है कि इस ख़रीद सीज़न में नए क़ानून लागू हुए बिना किसानों की अच्छी आमदनी हुई है. इससे उन्हें आंदोलन को लंबा खींचने की ताक़त मिल गई होगी. लेकिन उन्हें घर-बार की भी चिंता देर-सबेर करनी होगी.

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान राकेश टिकैत के नेतृत्व में जुटे हैं. जून-जुलाई, 2024 तक आंदोलन को खींचने का बयान वे रणनीति के तौर पर दबाव बनाने के लिए दे रहे हैं. असल में उनका पूरा ज़ोर 2022 में होने वाले यूपी के विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र दबाव बनाने पर है. उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की ही साख़ दांव पर है, क्योंकि वहां उसकी सरकार है.

ऐसी ख़बरें भी आ रही हैं कि केंद्र और यूपी सरकार के बीच सब कुछ सही नज़र नहीं आ रहा है. ऐसे में अच्छा यही होगा कि यूपी विधानसभा चुनाव से पहले ही बीजेपी किसानों के साथ झगड़ा किसी तरह निपटा ले. यूपी में अगर किसानों के गुस्से की लपट बीजेपी के आगामी अग्निपथ को और गर्म करती है, तो फिर उसका सीधा असर 2024 के मंसूबों को झुलसाने वाला सकता है. केंद्र की सत्ता की राह उत्तर प्रदेश से होकर ही गुज़रती है, इस सिद्धांत में आज़ादी के बाद से अभी तक बड़ा उलटफेर देखने को नहीं मिला है.


ऐसे में किसानों और भारतीय जनता पार्टी के लिए यह अच्छा अवसर है कि मामले को किसी भी तरह निपटाया जाए. हालांकि केंद्र सरकार लगातार बातचीत के लिए दरवाज़े खुले रखने की बात कह रही है और यह भी तय है कि मोदी सरकार तीनों कृषि विपणन क़ानून सिरे से रद्द नहीं करने वाली है. किसानों को यह बात ध्यान में रखते हुए अपना रुख़ भी थोड़ा विनम्र करना होगा. गर्म लोहे पर वार करने पर ही मनचाहा आकार पाया जा सकता है, यह ध्यान में रखते हुए किसानों को भी बीच के रास्ते पर विचार करना चाहिए. इस समय लोहा वाक़ई गर्म है, तो किसानों को किसी निर्णय पर पहुंचने का संदेश सरकार को देना चाहिए.

किसान घर जाएं, तो सबको अच्छा लगेगा. वे अपने विवेक के अनुसार चुनावों में वोट दें, इसमें कोई उन्हें रोक नहीं सकता. उफ़नते दूध पर शीतल जल के छींटे मारने ही पड़ते हैं, यह ध्यान में रखते हुए बीजेपी भी अपने पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास करे, तो दोनों ही पक्षों की पौबारह हो सकती है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
रवि पाराशर

रवि पाराशरवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. नवभारत टाइम्स, ज़ी न्यूज़, आजतक और सहारा टीवी नेटवर्क में विभिन्न पदों पर 30 साल से ज़्यादा का अनुभव रखते हैं. कई विश्वविद्यालयों में विज़िटिंग फ़ैकल्टी रहे हैं. विभिन्न विषयों पर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में शामिल हो चुके हैं. ग़ज़लों का संकलन ‘एक पत्ता हम भी लेंगे’ प्रकाशित हो चुका है।

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First published: June 10, 2021, 11:27 AM IST
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