क्या नंदीग्राम के संग्राम से सियासी सबक लेंगी ममता दीदी?

West Bengal Assembly Elections : दीदी को समझना चाहिए कि अगर उन्होंने सियासी ग़लतियां की हैं, तो ख़ामियाज़ा भी उन्हें ही भुगतना पड़ेगा. वर्ष 2011 में वे राज्य की भवानीपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीती थीं. वर्ष 2016 में भी उन्होंने भवानीपुर से जीत क़ायम रखी, लेकिन जीत का अंतर आधे से भी कम रह गया.

Source: News18Hindi Last updated on: April 2, 2021, 11:27 PM IST
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क्या नंदीग्राम के संग्राम से सियासी सबक लेंगी ममता दीदी?
वर्ष 2019 में लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में बीजेपी के अभ्युदय ने ममता को बेचैन कर दिया.
पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण के विधानसभा चुनाव में बंपर वोटिंग हुई है. लेकिन नंदीग्राम में चौतरफ़ा घिर जाने के बाद मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने राज्य में लोकतंत्र पर ख़तरे के बादल मंडराने का आरोप भारतीय जनता पार्टी के सिर मढ़ दिया है. उन्होंने कोई नया आरोप नहीं लगाया है. आजकल देश भर में राजनैतिक पार्टियां वक़्त-वक़्त पर लोकतंत्र पर ख़तरा मंडराने की बात करती रहती हैं. वामपंथी और कांग्रेस नेताओं को तो भारतीय जनता पार्टी के उभार की शुरुआत से ही भारतीय लोकतंत्र ख़तरे में दिखाई देने लगा था. सवाल यह है कि ‘लोकतंत्र’ का असल अर्थ होता क्या है?

लोकतंत्र दो शब्दों से मिलकर बना है. लोक और तंत्र. इसका सीधा सा अर्थ है कि लोक का तंत्र यानी लोक द्वारा ख़ुद के लिए तैयार किया गया तंत्र. लोक का अर्थ है लोग यानी भारत के आम लोग. अब दूसरा सवाल यह है कि जब किसी चुनाव में 80 से 90 प्रतिशत मतदाता वोट डालने पोलिंग बूथ पर पहुंच रहा हो, तो कोई कैसे कह सकता है कि देश में लोकतंत्र ख़तरे में है? लोक तो अपना काम सही तरह से कर रहा है. लोक आपको पसंद करता है, तो आपकी सरकार बना देता है. उसी लोक को अगर लगता है कि सरकार की कुर्सी पर बैठने के बाद आपने उसकी अपेक्षा के अनुसार काम नहीं किया, तो वही लोक आपको कुर्सी से उतार कर दूसरे को उस पर बैठा देता है.

जब आप जीतते हैं, तब तो लोकतंत्र ख़तरे से उबर जाता है और जब अपनी कारगुज़ारियों की वजह से आप हारते हैं, तो लोकतंत्र पर ख़तरा मंडराने की दुहाई देने लगते हैं. क्या आप लोकतंत्र पर ख़तरे के बादल मंडराने का आरोप लगाकर ख़ुद अलोकतांत्रिक काम तो नहीं कर रहे होते?
अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार के तहत आप देश के चुने हुए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, क्या तब आपकी सोच लोकतांत्रिक होती है? क्या व्यापक अर्थों में ऐसा करना जनमत का अपमान नहीं है? लोकतंत्र में लोक ही सर्वोच्च शक्ति है. जिस पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला हो, उस पर अलोकतांत्रिक होने का आरोप लगाना बचकानी और खिसियानी हरकत तो है ही, साथ ही ऐसा करना कहीं न कहीं आपकी सोच में तानाशाही प्रवृत्ति को ही झलकाता है.

ममता बनर्जी यह आरोप लगातार लगाती रही हैं कि भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बाहरी व्यक्तियों का इस्तेमाल अपनी धमक बढ़ाने के लिए कर रही है. इन आरोपों में तड़का यह लगता है कि बीजेपी के बाहरी बांग्ला भाषा भी नहीं बोल पाते हैं. जब ममता दीदी ऐसा आरोप लगाती हैं, तो क्या यह भारत के संविधान की मूल आत्मा के ख़िलाफ़ नहीं होता? कोई भी भारतीय देश में कहीं भी आ-जा सकता है. भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारक अगर बंगाल निवासी नहीं है, तो क्या वे भारतीय भी नहीं हैं? जिन्हें बांग्ला भाषा बोलना-पढ़ना नहीं आती, वे क्या पश्चिम बंगाल में नहीं रह सकते? ध्रुवीकरण के लिए ऐसी बातें करना लोकतांत्रिक सोच नहीं कही जा सकती.
बीजेपी पर बाहरी लोगों के ज़रिए चुनाव जीतने की कोशिश करने का आरोप लगाने वाली दीदी ख़ुद ही विरोधाभासों का शिकार भी नज़र आती हैं. पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र ख़तरे में होने की दुहाई लगाने वाली ममता लोकतंत्र की बहाली के लिए देश भर की ग़ैर-बीजेपी पार्टियों को चिट्ठी लिखकर लोकतंत्र बचाने के लिए एकजुट होने की अपील करती हैं. सवाल है कि उन्होंने जिन नेताओं को चिट्ठी लिखी है, क्या वे पश्चिम बंगाल निवासी हैं या फिर उनकी पार्टियों की जड़ें पश्चिम बंगाल की ज़मीन पर रोपी गई हैं? उन्होंने जिन ग़ैर-बीजेपी पार्टियों के नेताओं को चिट्ठी लिखी है, उनमें से कितने नेता बांग्ला भाषी हैं?

ममता बनर्जी का एक आरोप और है कि चुनाव आयोग उनकी शिकायत नहीं सुन रहा है. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी है. टीएमसी का बटन दबाने पर भी वोट बीजेपी कैंडीडेट के पक्ष में पड़ रहा है. केंद्रीय अर्धसैनिक बल भी निष्पक्षता से काम नहीं कर रहे. टीएमसी समर्थकों को वोट नहीं डालने दे रहे हैं. ममता के अनुसार केंद्रीय बल गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर काम कर रहे हैं. अगर ऐसे एक भी आरोप सही है, तो ममता दीदी कृपया बताएं कि फिर 80 से 90 प्रतिशत वोट कैसे पड़ रहे हैं?

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवान चुनाव के समय ही तैनात किए जाते हैं. उन्हें यह कैसे पता चलता है कि कौन टीएमसी समर्थक है, कौन बीजेपी का समर्थक? केंद्रीय बलों की ज़िम्मेदारी शांतिपूर्ण तरीक़े से मतदान कराना यानी माहौल को हिंसक होने से बचाना भर है. उनकी तैनाती पोलिंग बूथों के बाहर होती है, अंदर नहीं. क्या ममता दीदी नहीं जानतीं कि पोलिंग बूथों के अंदर राज्य सरकारों के ही कर्मचारी-अधिकारी तैनात किए जाते हैं? तो क्या मतदान में गड़बड़ी का आरोप लगाने वाली ममता दीदी यह जताना चाहती हैं कि उन्हें अपनी ही स्टेट मशीनरी पर भी भरोसा नहीं है? हम सब जानते हैं, समझते हैं कि अब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी का आरोप सियासी चुटुकुला भर लगता है. चुनाव आयोग जब मशीनों में ख़ामी निकालने की चुनौती राजनैतिक पार्टियों को देता है, तो कोई सामने नहीं आता. वर्ष 2016 में तृणमूल कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में 294 सीटों में 211 पर जीत मिली, तब क्या वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी नहीं थी? अगर अब चुनाव आयोग केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहा है, तो 2016 में क्यों ऐसा नहीं कर रहा था? तब भी तो केंद्र में अच्छे बहुमत वाली मोदी सरकार थी. मोदी सरकार क्या दो साल के कार्यकाल के बाद चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की हैसियत में नहीं थी?संवैधानिक संस्थाओं, चुनी हुई सरकारों पर आरोप और सिर्फ़ आरोप लगाने की नकारात्मक राजनीति से लोकतंत्र पर ख़तरा नहीं मंडराता. जैसे ही आप हार के कगार पर पहुंचते हैं या ऐसी कोई आशंका आपको परेशान करने लगती है, तो सारा का सारा तंत्र ही आपको दाग़दार नज़र आने लगता है. इस तरह की सत्तापरक सुविधाभोगी राजनीति एक न एक दिन हाशिये की ओर सरक ही जाती है. पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनाव में कांटे का मुक़ाबला है. नतीजे 2 मई को ही पता चलेंगे. हो सकता है कि बीजेपी और टीएमसी के बीच कुछ ही सीटों से हार-जीत हो, लेकिन ममता दीदी अगर इसी तरह उग्र और नकारात्मक राजनीति करती रहीं, तो एक दिन वह भी आएगा, जब तृणमूल कांग्रेस का वजूद सिर्फ़ तृण में ही बदला हुआ दिखाई देगा.

देश भर में कांग्रेस का सियासी रसूख अगर सूखता जा रहा है, तो इसका भी कारण है. आप अपनी पार्टी में अंदरूनी तौर पर लोकतंत्र बहाल नहीं कर सकते और देश में लोकतंत्र पर ख़तरे का खटारा राग अलापते रहते हैं, तो यह आपका दोहरा चरित्र ही है.
अपने अंदर कमियां तलाश कर उन्हें दूर करना चाहिए. दूसरे के शक्तिशाली होने के कारणों की समीक्षा करते हुए उन्हें अपनाने की सोच रखनी चाहिए. अन्यथा आप स्वयं ही क्षरण की ओर बढ़ते जाएंगे, यही क़ुदरत का नियम भी है.

अंत में ममता दीदी के एक और आरोप की बात कर लें. उनका आरोप है कि वोटिंग वाले दिन प्रधानमंत्री रैली क्यों करते हैं? दीदी इसे आचार संहिता का उल्लंघन करार देती हैं. वोटिंग से एक दिन पहले चुनाव प्रचार थम जाता है. लेकिन अब कई चरणों में अलग-अलग तारीख़ों में वोटिंग होती है. ऐसे में एक चरण में चुनाव प्रचार भले ही थम जाता हो, अगले चरणों का चुनाव प्रचार दूसरे क्षेत्रों में चलता रहता है. क्योंकि आज की दुनिया डिजिटल दौर में जी रही है, इसलिए विभिन्न चरणों में संपन्न होने वाली चुनाव प्रक्रिया में एक क्षेत्र में प्रचार थमने का कोई अर्थ रह नहीं जाता. सबके हाथों में स्मार्ट फ़ोन हैं. किसी भी पार्टी के स्टार प्रचारकों के भाषण लाइव देखने की सुविधा है. चुनाव आयोग प्रचार थमने वाले क्षेत्र में लोगों को इंटरनेट आधारित स्मार्ट फ़ोन, कंप्यूटर, लैपटॉप और टीवी वगैरह देखने से रोक नहीं सकता. ऐसे में यथार्थ यही है कि अंतिम चरण का चुनाव संपन्न होने से पहले चुनाव प्रचार अनवरत चलता ही रहता है. प्रधानमंत्री को चुनाव प्रचार से रोकने की मंशा जता कर क्या ममता दीदी किसी व्यक्ति का अपने पक्ष में प्रचार करने का लोकतांत्रिक अधिकार छीनना चाहती हैं?

दीदी को समझना चाहिए कि अगर उन्होंने सियासी ग़लतियां की हैं, तो ख़ामियाज़ा भी उन्हें ही भुगतना पड़ेगा. वर्ष 2011 में वे राज्य की भवानीपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीती थीं. वर्ष 2016 में भी उन्होंने भवानीपुर से जीत क़ायम रखी, लेकिन जीत का अंतर आधे से भी कम रह गया. वर्ष 2019 में लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में बीजेपी के अभ्युदय ने ममता को बेचैन कर दिया. लिहाज़ा उन्हें भवानीपुर सीट छोड़नी ही थी. ऐसे में ख़ुद को जुझारू नेता के तौर पर फिर से साबित करने के लिए उनके पास सिंगूर और नंदीग्राम, दो ही विकल्प थे.

तेज़तर्रार नेता शुवेंदु अधिकारी के टीएमसी छोड़ कर बीजेपी में जाने के बावजूद दीदी ने नंदीग्राम को चुनावी संग्राम के लए चुना, तो यह उनकी सियासी ग़लती ही कही जाएगी. 2019 में जब बंगाल में बीजेपी ने 18 लोकसभा सीटें जीती थीं, तब भी नंदीग्राम में टीएमसी को 63 प्रतिशत वोट मिले थे. लेकिन दीदी को याद रखना चाहिए था कि उनकी पार्टी ने नंदीग्राम में ऐसा करिश्मा शुवेंदु अधिकारी के पार्टी में रहते हुए किया था. अब वे दीदी के ख़िलाफ़ मैदान में हैं, तो हारे-जीते कोई भी, नंदीग्राम में टीएमसी को करारा झटका लगना तय है.

सियासी गतिविधियों पर पैनी नज़र रखने वाले कुछ विश्लेषक मित्र मानते हैं कि नंदीग्राम के बोयल गांव बूथ पर मतदान में गड़बड़ी का आरोप लगाकर दो-ढाई घंटे धरने पर बैठकर भी दीदी ने सियासी गलती की. उन्होंने वहां से राज्यपाल को फ़ोन कर गड़बड़ी का आरोप लगाया. धरने पर बैठते ही मीडिया के कैमरे वहां जम गए. मीडिया ने लोगों से बातचीत शुरू की, तो लगने लगा कि दो समुदायों के बीच ध्रुवीकरण की धार बहुत तेज़ है. बोयल गांव की कवरेज घंटों तक होती रही. बाक़ी के छह चरणों में अगर बोयल बूथ का संदेश प्रतिध्विनित हुआ, तो भारतीय जनता पार्टी को ही इसका फ़ायदा मिलेगा. श्रीराम के नारे पर भड़क कर, चंडीपाठ कर, ख़ुद का गोत्र बता कर, मंदिरों में पूजा-अर्चना कर दीदी बीजेपी को अच्छी-ख़ासी तरज़ीह पहले ही दे चुकी हैं.

चुनाव में हार-जीत होती है और जो जीतता है, वही सिकंदर भी कहलाता है. लेकिन हर हाल में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए अमर्यादित, अनैतिक, अलोकतांत्रिक हथकंडे अपनाना ग़लत है, फिर चाहे कोई भी ऐसा करे. चुनावी नफ़े-नुकसान के लिए लोक की मर्यादा मत लांघिए, उसकी लाज हर हाल में रखिए. जनमत का सम्मान कीजिए. पश्चिम बंगाल भारत का राज्य है, उसे शेष भारत से अलग साबित करने का प्रयास करेंगे, तो आप ही अलग-थलग पड़ जाएंगे, दीदी को यह समझ में आना ही चाहिए.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
रवि पाराशर

रवि पाराशरवरिष्ठ पत्रकार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. नवभारत टाइम्स, ज़ी न्यूज़, आजतक और सहारा टीवी नेटवर्क में विभिन्न पदों पर 30 साल से ज़्यादा का अनुभव रखते हैं. कई विश्वविद्यालयों में विज़िटिंग फ़ैकल्टी रहे हैं. विभिन्न विषयों पर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में शामिल हो चुके हैं. ग़ज़लों का संकलन ‘एक पत्ता हम भी लेंगे’ प्रकाशित हो चुका है।

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First published: April 2, 2021, 11:26 PM IST
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