पहनावा आपकी सोच पर निर्भर है

पहनावा सोच का है, मस्तिष्क की उपज है. यह भी सच है कि सादगी और सम्मान की परिभाषा सरल शब्दों में पहनावे से दृष्टिगोचर होती है, पर अड़कर उसकी अनिवार्यता को सिद्ध करने के लिए युद्ध जैसी परिस्थिति उत्पन्न कर देना, असंतुलन का माहौल बना देना समस्यात्मक प्रश्न है और समस्या से बचने के लिए हल खोजे जातें हैं, कठोर कदम उठाए ही जाते है.

Source: News18Hindi Last updated on: March 1, 2022, 11:11 am IST
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पहनावा आपकी सोच पर निर्भर है

जीवन व्यक्ति का अपना होता है और उसकी सोच, उसकी विचारधारा का मालिक वह स्वयं होता है. जीवन में उसे क्या करना है, क्या नहीं करना? क्या खाना है, क्या नहीं खाना? क्या पहनना है, क्या नहीं पहनना? यह उसकी अपनी सोच पर है. हमारी सोच के दायरे ही निश्चित करते हैं कि हमें किससे खुशी मिलती है, किससे नहीं. पहनावा चाहे किसी भी तरह का हो झगड़े का विषय नहीं होना चाहिए.


हर व्यक्ति स्वतन्त्र है स्वयं की इच्छा के अनुसार जीवन व्यतीत करने के लिए, लेकिन बीते कुछ दिनों में हिजाब का विवाद देश की एकता और अखण्डता को चोट पहुंचा रहा है. विकास की बुलन्दियों को छूती हुई इक्कीसवीं सदी के आज के दौर में अचानक से ये हिजाब विवाद क्‍यों गहरा गया, इस प्रकार की विचारधारा क्‍यों प्रकाश में आई.


भारत जैसा देश जिसे समस्याओं से निबटने में, जूझने में ही अपनी शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है, बार-बार विकास की राह पर बढ़ता हुआ पिछड़ जाता है. किसी भी संप्रदाय में किसी भी परिवार में जो भी परंपरा है वो उनकी निजी है. सामाजिक क्षेत्र में और घरेलू स्तर पर भी वे कुछ भी करने के लिए अपना निर्णय लेने में समर्थ हैं, लेकिन शैक्षणिक संस्थाओं को ऐसे विवादों से दूर ही रखना चाहिए.


विद्यालय शिक्षा देने के लिए होते हैं. एकता, समानता, समभाव, समरुपता इनकी पहचान है. ये छात्र-छात्राओं को शिक्षित कर आगे बढ़ने में मदद करते हैं. यहां ज्ञान की बातें होती हैं, अनुशासन का मर्यादित भाव होता है, जो भी नियम हैं सबके लिए एक जैसे होते हैं. किसी समुदाय विशेष की अपनी पहचान की यहां कोई गुंजाइश नहीं होती. स्कूल हों, कालेज हों या विश्वविद्यालय यहां हर बच्चा शिक्षक की नजर में भारतीय है, विद्यालय परिसर में जाति उसकी पहचान नहीं.

यहां हिजाब पहनकर आने से क्‍यूं इस मानसिकता का परिचय कराया जाए, जिसकी जरुरत ही नहीं है. आधुनिकता या पिछड़ापन हमारी सोच की ही देन है. यूनिफार्म का मतलब ही समानता है और ये समानता हर स्तर की होती है. ना कोई गरीब है, ना अमीर. ना हिन्दू है, ना मुस्लिम. विद्यालय में शिक्षा के द्वार सबके लिए समान रुप से खुले हैं. यहां विद्यार्जन करना ही मुख्य उद्देश्य हो, पहनावा नहीं.


व्यक्तिगत रुचियों या पाबंदियों का कोई महत्व ही नहीं है. समय पर रुकावट पैदा करने वाली अनेक परंपराओं से बाहर आकर, बेढ़ियों को तोड़ते हुए शिक्षित होकर समाज में बेटियां बढ़ी हैं. हिजाब पहनने की आवश्यकता उन्हें यदि महसूस होती है तो वे अवश्य पहने पर विद्यालय इनसे अछूते रहने चाहिए. हर युग में कोई ना कोई सघंर्ष को जन्म देने वाली समस्या सामने आ ही जाती है.


पहनावा सोच का है, मस्तिष्क की उपज है. यह भी सच है कि सादगी और सम्मान की परिभाषा सरल शब्दों में पहनावे से दृष्टिगोचर होती है, पर अड़कर उसकी अनिवार्यता को सिद्ध करने के लिए युद्ध जैसी परिस्थिति उत्पन्न कर देना, असंतुलन का माहौल बना देना समस्यात्मक प्रश्न है और समस्या से बचने के लिए हल खोजे जातें हैं, कठोर कदम उठाए ही जाते है.


जब-जब भी किसी युग में क्रांति हुई है, उसका विरोध और खंडन हुआ है, लेकिन सफल कदमों की आशातीत पूर्णता भी हुई है. हिजाब मुद्दा किसलिए, क्‍यूं उठाया गया, यह विचारणीय है. हिजाब से बेटियों को सुरक्षा देने का भाव रखने वालों को ये भी ध्यान रखना होगा कि किसी भी प्रकार से उनका शोषण ना हो, पारिवारिक दृष्टिकोण से भी वे सम्मान की अधिकारिणी रहें.

पुरुष प्रधान समाज में नारी को बराबरी का स्थान मिले, हिजाब के पहनावे में बांधकर आगे बढ़ने के अवसर ना बंद कर दिए जाएं. विद्यालय में हिजाब की अनुमति स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए. टकराव के बाद हिजाब विवाद ने अब हिंसा का रुप लेना शुरु कर दिया है. छोटी सी बात पर लोग मरने-मारने से भी नहीं डर रहे. सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट कर वाहनो में भी आग लगाने जैसा निंदनीय काम कर रहे हैं.


ऐसी अराजकता से क्या हासिल होगा. किसी भी बात का विरोध प्रकट करने के लिए देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना स्वयं को ही चोट देना है. हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है. ये सच है कि इस्लाम में परदा अनिवार्य है, जिस्म को छुपाकर रखना है, पर मुद्दा बना कर देश की अखण्डता पर आंच नहीं आने देना है.


सभी अपने-अपने धर्म की बातों को मानने में अनुशासित रहें, उसके लिए हिंसा पर उतारु ना हों. धर्म के लिए किसी को जान से मार देना तो किसी शास्त्र में नहीं लिखा. ऐसी उग्रता किस काम की. यदि हिजाब पर प्रतिबंध महिलाओं के अधिकारों का हनन है तो महिलाओं को हर वो हक मिलना चाहिए, जो पुरुषों को है.


इक्कीसवी सदी का खूबसूरत पर्यावरण पुरातन कट्टरवादी विचारधारा से प्रभावित हो रहा है. आगे बढ़ने की दौड़ में क्‍यूं परदे की सीमा रेखा खींची जाए. लेकिन, संविधान में सबको मनपसंद लिबास पहनने का अधिकार है, किसी के अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए. सबको समान हक मिलना चाहिए. मुस्लिम धर्म के ही कई लोगों ने कहा है कि विद्यालय समानता के स्तर पर चलते हैं, वहां हिजाब की लड़ाई नहीं लड़ी जानी चाहिए.

जब भी कोई मसला तूल पकड़ता है, अपने ही लोग विरोध में खड़े हो जाते हैं. तभी तो बाहरी शक्तियां अपना जोर आजमाने लगती हैं. हमारे देश के मामले, जिनसे हमें खुद ही जूझना है, जिनका निबटारा करना है, ऐसे में किसी भी बाहरी देशों की राय या उनका दखल स्वीकार्य नहीं. विभिन्न देशों में क्या भारत की राय से कार्यों को अंजाम दिया जाता है, जो बाहरी ताकतें हमारे मामलों में अपनी राय देने को एकजुट हो जाते है.


भारतीय संस्कृति में नारी सदा से ही वन्दनीय रही है. सभी धर्मों के लोगों को सबके पहनावे का सम्मान करना चाहिए. अपनी आवाज बुलंद करने के लिए दूसरे धर्म के पहनावे पर एतराज नहीं करना चाहिए. लेकिन, विद्यालय परिसर में हिन्दुस्तानी भाई-बहन शिक्षा ग्रहण करने आते हैं. परदा वहां की व्यवस्था का अंग नहीं.


विद्यालय के नियम अलग हैं, उन पर निर्णायक ही निर्णय करें. स्वयं अराजकता या अव्यवस्था का माहौल ना बनाएं. लड़-झगड़ कर देश की नीव को खोखला ना करें. प्रगति की सोचें, शिक्षा की बात करें और विद्यालयों की गरिमा कायम रखें, इससे ही देश खुशहाल होगा.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
रेखा गर्ग

रेखा गर्गलेखक

समसामयिक विषयों पर लेखन. शिक्षा, साहित्य और सामाजिक मामलों में खास दिलचस्पी. कविता-कहानियां भी लिखती हैं.

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First published: March 1, 2022, 11:11 am IST