जोशीमठ का दर्द: आपदाओं को हमने दिया है आमंत्रण

जोशीमठ जो आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि है और गेटवे ऑफ हिमालय है, आज संकट के दौर से गुजर रहा है. मनुष्य की लालची प्रवृति कि वह पैसों के कारण कुछ भी करने को तैयार है. प्रकृति समय-समय पर जगा रही है पर मनुष्य मान नहीं रहा है. सभी को सचेत होने की जरुरत है. आवश्यकता से अधिक निर्माण कार्य बंद करें. पहाड़ों से उनका सौंदर्य ना छीने. उन्हें दर्द ना दें नहीं तो वे आपको कहीं का नहीं छोड़ेंगें.

Source: News18Hindi Last updated on: January 17, 2023, 8:29 pm IST
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जोशीमठ का दर्द: आपदाओं को हमने दिया है आमंत्रण
जोशीमठ में रहने वालों की पीड़ा बांटने वाला कोई नहीं है.

प्रकृति से खूबसूरती हमें वरदान रुप में मिली है. पहाड़ों का नैसर्गिक सौंदर्य, सुरम्य दृश्य. मनोहर वातावरण और हरियाली सबके मन को अनायास अपनी ओर आकर्षित करती है. अपने दैनिक जीवन में तनिक अवकाश मिलते ही हम पहाड़ों की ओर घूमने निकल पड़ते हैं. वहां के दृश्यों को अपने साथ कैमरे में कैद भी कर लाते हैं. पहाड़ों से पता नहीं हमें कैसा लगाव होता है हम खिचें चले जाते हैं. वहां के स्थलों को हमने अपने जीवन की खुशियों का केंद्र बना रखा है. कुछ दिन रहकर वहां की यादों से अपने को तरोताजा करते हुए पुनः पुनः पहाड़ों की ओर आकर्षित होते हैं.


पहाड़ हमारे संरक्षक हैं. हमारे पहरेदार है. शांति का प्रतीक होते हैं. अपने स्थाईत्व से हमें अडिग बने रहने की प्रेरणा देते हैं. अध्यात्म का पर्याय हैं. यहां केवल पिकनिक के ही लिए नहीं ईश्वर के दर्शन के लिए भी लोग बहुत दूर-दूर से चलकर आते हैं. अपनी आस्था का परिचय भी देते हैं. किंतु नादान प्राणी अपने स्वार्थ के लिए ही मनुष्य ने उन पर प्रहार करने शुरु कर दिए. काफी समय से पहाड़ों को तोड़कर रास्ते बनाए जा रहें हैं. उन्हें खोखला किया जा रहा है. अपने विकास, मनोरंजन और उन्नति की खातिर प्रकृति के दामन को कांटों से भर दिया है. उसको घायल किया है. उसे दर्द दिया है. जिससे प्रकृति भी कराह उठी है और अनेक रुपों में मनुष्य को दंड देने लगी है. कभी बाढ़, कभी भूकंप, कभी कोरोना जैसी महामारी बनकर हमारे सामने आ रही है.


जोशीमठ जो आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि है और गेटवे ऑफ हिमालय है, बद्रीनाथ जाने का मार्ग भी है, आज संकट के दौर से गुजर रहा है. मिट्टी और मलबे के ढ़ेर पर बसे जोशीमठ का अस्तित्व हमेशा से ही संकट में था. मिट्टी की प्रवृति अस्थाई होती है. उस पर निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए था पर चेतावनी के बाद भी निर्माण कार्य होता रहा. लोग अपने घर बनाते रहे हर योजना, परियोजना फलीभूत होती रही. वह पिकनिक और पर्यटन का स्थान बन गया होटल, अस्पताल, घर, हर साधन निर्मित होते रहे पर आज सड़कों, घरों की चौड़ी होती दरारों से समूचे जोशीमठ के लोगों का जीवन खतरे मे पड़ गया है. इस असामयिक आपदा ने समस्त जोशीमठ के लोगों के साथ पूरे भारत के लोगों को आशंकित कर दिया है. जमीन के अंदर पानी का रिसाव जमीन को खोखला कर रहा है.


विकास की योजनाओं ने मनुष्यों को जहां हमेशा उत्साहित रखा है, वहीं प्रकृति से खिलवाड़ करने का नतीजा भी वह भोग रहा है. धरती का सीना हर पल छलनी हो रहा है. मनुष्य की लालची प्रवृति कि वह पैसों के कारण कुछ भी करने को तैयार है. प्रकृति समय-समय पर जगा रही है पर मनुष्य मान नहीं रहा है. पहाड़ों को काटना, चट्टानों को तोड़ना, रास्ते निकालना, पहाड़ों के नीचे सुरंगों का निर्माण, सब कुछ विकास के नाम पर हो रहा है जो विनाश का भी कारण है. पहाड़ दरक रहे हैं. भूस्खलन हो रहें हैं. पर जब तक प्रकृति दंड नहीं देती मनुष्य नहीं मानता. आज जोशीमठ के लोगों पर आई इस विपदा का कोई हल निकलता नहीं दिखता. आज जोशीमठ को बचाना चुनौती हो गया है. जिन इमारतों का निर्माण हुआ था उन्हें ही गिराने की नौबत आ गई है. लोगों को अपने आशियानों को छोड़ना पड़ रहा है, जो बहुत कष्टकारी है. अपने घरोंदों के विनाश को देखना और उन्हें छोड़कर जाना कितना मुश्किल है, ये कोई इन लोगों के दिल से पूछे. इनकी आत्मा क्षुब्ध है.


अपनी जड़ों को छोड़ना बेहद कष्टकारी है. जहां बचपन व्यतीत हुआ, जहां पढ़े-बढ़े, जहां अरमानों को दिशा मिली वो सब कुछ छीन जाना इतना सहज नहीं होता. लोग अपने घरों को छोड़ने के लिए आंदोलन पर उतर आते हैं पर ये बेचारे क्या करें जिन्हें प्रकृति की मार पड़ी हो? ये कैसे संतोष करें? इनकी आंखों के आंसू और दिल का दर्द अपने घरों में बैठे हर हिंदुस्तानी को व्याकुल कर रहा है. घर हमारे जीवन की मजबूत नींव होते हैं. मनुष्य की जिंदगी भर की कमाई होते हैं. उनकी खुशियों, ख्वाइशों और इच्छाओं की पूंजी होते है पर जोशीमठ के लोगों पर आई यह आपदा उनके अरमानों पर ग्रहण लगा गई है. नव निर्माण से विकास होता है पर यहां निर्माण कार्य से, विकास से विनाश की संभावनाएं बढ़ गई हैं. लोगों की हंसती-खेलती जिंदगी दुःख के सागर में डूब गई है. जोशीमठ की जमीन की सतह पर अत्यधिक पानी का रिसाव हो रहा है. बहते पानी की आवाज सुनाई भी देती है पर उसका सिरा कहां है ज्ञात नहीं हो रहा है. इस आशंका से घरों के कमजोर पड़ने और टूटने की वजह से सभी लोगों में डर का माहौल है. घरों को गिराना भी चिह्नित कर लिया गया है.


लोग कहां जाएं दुविधा है. उनके जीवन की दिशा का निर्धारण करने का निर्णय लेने की शीघ्रातिशीघ्र आवश्यकता है. इतने सुंदर शहर का ऐसा अंत वास्तव में प्रकृति की मार ही है. क्या इसका अंत हो जाएगा? लोगों की इच्छाओं का गला घुट जाएगा? पैसे वालों ने तो खूब कमाई कर ली पर जिन्होंने जिंदगी भर की कमाई लगा दी वो कहां जाएंगें? आज जोशीमठ में पानी का रिसाव ही नहीं आंखों से भी दरिया बह रहे हैं. दोनों में ही डूब जाने का डर है. आपदाओं के बवंडर में घिर जाने पर यहां के लोगों की कराह का क्या होगा नहीं पता पर आसमां का दिल भी छलनी है. कुछ ने हथोड़ों से पहाड़ों को तोड़ा. कुछ के लिए पहाड़ मनोरंजन का साधन बने पर जोशीमठ में रहने वालों के हिस्से में जो पीड़ा आई है वो बांटने वाला कोई नहीं.


अब सभी को सचेत होने की जरुरत है. आवश्यकता से अधिक निर्माण कार्य बंद करें. पहाड़ों से उनका सौंदर्य ना छीने. उन्हें दर्द ना दें नहीं तो वे आपको कहीं का नहीं छोड़ेंगें. अचल हैं पर चलायमान हो गए. शून्य में खड़ें हैं पर दंड दे गए. उनका मूक प्रहार काफी घायल कर गया. मानव जाति को रुला गया. सबक लेने की जरुरत है विकास के नाम पर धरती को बंजर मत बनाओ. उसकी उर्वरा शक्ति को नष्ट मत करो वरना एक दिन वह भी कहीं टूट कर ना बिखर जाए. पहाड़ों का और धरती का प्राकृतिक अस्तित्व बना रहने दें वरना ये हमारा अस्तित्व समाप्त कर देंगें.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
ब्लॉगर के बारे में
रेखा गर्ग

रेखा गर्गलेखक

समसामयिक विषयों पर लेखन. शिक्षा, साहित्य और सामाजिक मामलों में खास दिलचस्पी. कविता-कहानियां भी लिखती हैं.

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First published: January 17, 2023, 8:29 pm IST
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