नारी की आस्था का प्रतीक है अलौकिक त्योहार करवा चौथ

सम्मान के लिए नारी सर्वस्व बलिदान के लिए तैयार रहती है. अपने पति के तनिक से अहित की आशंका से भी उसका मन परेशान हो जाता है, करवा चौथ का त्योहार उसकी उसी आस्था का सम्बल है, जिसे स्वीकार कर वह अपने रिश्ते को मजबूत डोर से पकड़े रहना चाहती है.

Source: News18Hindi Last updated on: October 24, 2021, 6:00 AM IST
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नारी की आस्था का प्रतीक है अलौकिक त्योहार करवा चौथ

प्रेम, विश्वास और आस्था का प्रतीक है करवा चौथ. सुहागिनों की खुशियों, अरमानों व अलौकिक दिव्य अनुभूतियों की कसौटी का त्योहार है करवा चौथ, भारतीय नारियों के लिए इस त्योहार का विशेष महत्व है. अखण्ड सौभाग्य का, मन के विश्वास का, अदम्य सहनशक्ति व स्नेह के धागों का त्योहार है करवा चौथ. इस त्योहार के आने से ही नारी की सोलह श्रृंगार की छवि सामने आ जाती है, अनुपम, अद्वितीय रुप में श्रृंगार की प्रतिमा बनी नारी भारतीय संस्कृति को अपने में समेटे भारत के गुण-गौरव गाथा को बयान करती नजर आती है.


खनकती चूड़ियां, मेहंदी सजे हाथ, दमकती बिंदिया, सिंदूरभरी मांग, गले में मंगलसूत्र, घुंघरु बजती पायल पहने नारी ना केवल रुप सौंदर्य की प्रतिमा है, बल्कि संपूर्ण नारित्व की परिभाषा लगती है. प्राचीन नारियां तो करवा चौथ की परंपरा परिपाटी को पूर्णतः मानती ही है, आधुनिकता के आवरण में लिपटी नारियों के लिए भी इस त्योहार की गरिमा कम नहीं है. अपने जीवन साथी के लिए निराहार व्रत रखकर यम से भी लौटा लाने की अद्भुत शक्ति को अपने ऑचल में समेटे नारी किसी दिव्यता की परछाई सी ही दृष्टिगोचर होती है.


पति की दीर्घायु के लिए निर्जल व्रत रखना नारी के प्रेम व सहनशक्ति का ही परिचायक है. सदियों की परंपरा को निभाती नारी हर युग में इस त्योहार की गरिमा को संभालने में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती है, पति को ही जीवन का आधार मानने वाली नारी हमेशा पति के सुख में ही अपना सुख देखती है. पढ़ी-लिखी कामकाजी महिला हो या घरेलू पति के साथ अपने गठबंधन को मजबूत और सशक्त ही बनाये रखना चाहती है. अपने प्यारे से रिश्ते के प्रति महिलाएं सदैव से ही वफादार रही हैं और भावनात्मक रुप से हर रिश्ते को निभाती भी हैं.


नारी का अस्तित्व पुरुष के बिना नहीं है, ये तो नहीं कहा जा सकता, पर पुरुष और नारी एक दूसरे के बिना अधूरे ही हैं, यह सत्य ही है. एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव ही गृहस्थ जीवन की सफलतम कड़ी है और इस कड़ी को मजबूती  से जोड़े रखने का त्योहार है करवा चौथ, जो परम्रागत भी है और आध्यात्मिक भी, नारी जीवन का अनुपम उपहार है करवा चौथ. वैसे अपने जीवन साथी के जीवन के मंगल के लिए उसे किसी त्योहार की आवश्यकता नहीं, हर दिन अपने दांपत्‍य जीवन की मंगल कामना हेतु वह किसी न किसी अनुष्ठान व भक्तिभाव में रत रहती है, हर दिन अपने सुहाग के लिए ईश्वर से प्रार्थना, अर्चना करती है.


करवा चौथ यदि उस परमात्मा के निकट जाकर जीवन को खुशियों से भर देने का त्योहार है, तो ये त्योहार हर सुहागिन के लिए ईश्वर का वरदान है. करवा चौथ के व्रत की जैसी श्रद्धा सदियों से चली आ रही है वह आज भी कायम है, बल्कि यूं कहिये पारंपरिक प्रारुप आधुनिकता की लड़ियों में पिरोकर और भी निखर गया है, रिश्तों की मिठास का ये त्योहार हर घर की खुशियां बनाए रखे, यही इस त्योहार का संदेश भी है. हमारी भारतीय संस्कृति समय-समय पर हमें यही समझाती है कि ये भारत की धरती है और ये त्योहार इस मिट्टी की मर्यादा हैं, जो हम सभी को एकता के सूत्र में पिरोये रहते हैं, हमें प्रेम की डोर में बांधे रहते हैं.


नारी को यदि अपना मूल्यांकन करना हो तो वह पुरुष की तुलना में स्वयं को कम नहीं आंकती, पर यदि प्रश्न उसकी आस्था का हो तो वह पति को परमेश्वर मानने से भी पीछे नहीं हटती. उसका पति उसके लिए इष्ट है, परमात्मा है, ये भावना सदैव ही उसके अंदर में छिपी रहती है, पर नारी को अपने सम्मान की भी सबसे अपेक्षा होती है, थोड़े से सम्मान के लिए वह सर्वस्व बलिदान के लिए तैयार रहती है. अपने पति के तनिक से अहित की आशंका से भी उसका मन परेशान हो जाता है, करवा चौथ का त्योहार उसकी उसी आस्था का सम्बल है, जिसे स्वीकार कर वह अपने रिश्ते को मजबूत डोर से पकड़े रहना चाहती है.


यह सही है नारी सर्वशक्तिमान है पर उसका साहस उसका पति है. वह गृहस्वामिनी है पर उसका स्वामी उसका पति है. वह घर की आधार है पर उसका अवलम्ब उसका पति है और यह अवलम्ब सदा ही बना रहे इस हेतु करवा चौथ के व्रत के प्रति वह मन से जुड़ी रहती है. इस त्योहार की किसी रीति, किसी भी परंपरा का वह खण्डन नहीं करती, यह त्योहार उसे पुरुष की दृष्टि में छोटा नहीं करता, वरन उसकी पतिव्रता भक्ति को, उसके आत्मसंयम व आत्मसन्तुष्टि को दर्शाता है. हर दिन के उत्साह से भी ज्यादा उत्साहित करवा चौथ का दिन नारी की आत्मा के सौन्दर्य को भी उजागर कर देता है.


प्राण-प्रण से पति के लिए करवा चौथ का व्रत रखना नारी की आत्मिक सोच और खुशी है, समाज के द्वारा थोपी गई मजबूरी नहीं, वह किसी दवाब में आकर यह व्रत नही करती, बल्कि अलौकिक और अद्वितीय इस दिन को नारी और दिनों से भी ज्यादा खूबसूरत बना लेना चाहती है. वह विलक्षण रुप में अपने रिश्ते को सहेजकर रख लेना चाहती है, आइने की सी पारदर्शिता प्रकट करता यह त्योहार नारी के उदार व स्नेहिल प्रेम का प्रतीक है. क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर बैठे श्री विष्णु भगवान की प्रिया मां लक्ष्मी देवी जो सारे संसार को अपनी ज्योति से प्रदीप्त करती हैं, वह भी अपने पति के चरणों में बैठी दिखाई देती हैं.


भगवान राम के साथ मां सीता वन-वन भटकी पर उनका साथ नहीं छोड़ा, पार्वती मां ने अपने पति शिव के अपमान पर अपने प्राण त्याग दिये, मन्दोदरी की खुशी अपने पति के चरणों में ही थी. देवत्व भाव रखने वाली नारियां भी जब पति से प्रेम रखने वाली हैं तो मानव रुप में जन्मी नारियों के लिए तो पति निश्चित रुप से उनका सर्वस्व है, फिर उसकी दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रखना किसी दिव्यता से कम नहीं. पति से श्रेष्ठ कुछ नहीं. इतिहास साक्षी है कि जब भी नारियों ने कोई संकल्प लिया है, यम के द्वार से भी अपने पति को लौटा लाई हैं, सावित्री इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं.


करवा चौथ का व्रत हमेशा से अपनी गरिमा के कारण संसार में प्रसिद्ध है और रहेगा. चन्द्र की झलक के लिए करवे के जल की महत्ता को स्वीकार कर, निराहार रहकर पति की दीर्घायु की कामना करना हर नारी की प्राथमिकता होती है. ईश्वर करवा चौथ के त्योहार की गरिमा को सदा बनाये रखे.


(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
ब्लॉगर के बारे में
रेखा गर्ग

रेखा गर्गलेखक

समसामयिक विषयों पर लेखन. शिक्षा, साहित्य और सामाजिक मामलों में खास दिलचस्पी. कविता-कहानियां भी लिखती हैं.

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First published: October 24, 2021, 6:00 AM IST
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